पाकिस्तानी पंजाब पर खालिस्तानियों की चुप्पी क्यों?

Summary :

विदेशी धरती पर बैठकर खालिस्तानी राग अलापने वाले गुरपतवंत सिंह पन्नू या उनके जैसे अनेक ऐसे लोग हैं जो इस मूवमेंट को चला रहे हैं और अक्सर इनका केन्द्र भारतीय पंजाब पर रहता है जिसे यह खालिस्तान बनाने के ख्वाब स्वयं भी देखते हैं और युवा पीढ़ी को गुमराह कर उन्हें भी ऐसा करने के लिए उकसाते हैं, जबकि असल सच्चाई यह है कि न तो कोई भी भारतीय सिख कभी खालिस्तान का समर्थक रहा है और न रह सकता है क्यांेकि भारत का हर नागरिक भले ही वह किसी भी धर्म से सम्बन्ध रखता हो उसके लिए देश पहले…

विदेशी धरती पर बैठकर खालिस्तानी राग अलापने वाले गुरपतवंत सिंह पन्नू या उनके जैसे अनेक ऐसे लोग हैं जो इस मूवमेंट को चला रहे हैं और अक्सर इनका केन्द्र भारतीय पंजाब पर रहता है जिसे यह खालिस्तान बनाने के ख्वाब स्वयं भी देखते हैं और युवा पीढ़ी को गुमराह कर उन्हें भी ऐसा करने के लिए उकसाते हैं, जबकि असल सच्चाई यह है कि न तो कोई भी भारतीय सिख कभी खालिस्तान का समर्थक रहा है और न रह सकता है क्यांेकि भारत का हर नागरिक भले ही वह किसी भी धर्म से सम्बन्ध रखता हो उसके लिए देश पहले है। सिखों ने अगर खालिस्तान लेना होता तो देश के बंटवारे के समय ही जब अंग्रेजी हकूमत ने हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा किया, उसी समय ले लिया होता, मगर नहीं क्योंकि सिख समुदाय का हिन्दू धर्म के लोगों के साथ नाखून-मांस का रिश्ता है जिसे कोई अलग नहीं कर सकता। दोनों ही समुदाय भले अलग हो मगर इनके जन्म से लेकर मृत्यु तक सभी रीति-रिवाज एक जैसे ही हैं। यहां एक बात और हैरानी वाली है कि आज तक इन खालिस्तानियों के द्वारा पाकिस्तान में जो पंजाब है उसके प्रति कभी कुछ नहीं कहा, जबकि देखा जाए तो पाकिस्तानी पंजाब में इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थल मौजूद हैं। सिखों का सबसे पवित्र ननकाणा साहिब जहां गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ वह एेतिहासिक स्थल पाकिस्तान में है। इतना ही नहीं भारतीय पंजाब से कई अधिक एेतिहासिक तीर्थस्थल पाकिस्तान में हैं जिनमें खालिस्तान समर्थक दिलचस्पी लेते हुए नज़र नहीं आते या यह कहा जाए कि उनके प्रति वह कभी रुचि नहीं दिखा सकते, क्योंकि पाकिस्तानी समर्थन के बिना खालिस्तानियों का आंदोलन खत्म हो जाएगा। वह शुरू से ही, पाकिस्तानी समर्थन पर निर्भर रहे हैं।
सिनेमा के माध्यम से खालिस्तानी गतिविधियों को बढ़ावा: पाकिस्तान में यह देखा जा रहा है कि सिनेमा का उपयोग भारत-विरोधी गतिविधियों, विशेष रूप से खालिस्तान से जुड़ी गतिविधियों को तेज करने के एक उपकरण के रूप में लगातार बढ़ रहा है, जो लोग भारत में प्रतिबंधों के कारण खालिस्तान का प्रचार करने वाली फिल्में या गीत बनाने में कठिनाई महसूस करते हैं, वह इस स्थिति का पूरा लाभ उठाते दिखाई देते हैं। वह पाकिस्तान जाते हैं, बिना किसी रोक-टोक के अपनी गतिविधियां करते हैं और फिर उस सामग्री को सोशल मीडिया पर वायरल कर देते हैं।
अपनी आंतरिक विफलताओं का सामना करने के बजाय, पाकिस्तानी राज्य लगातार भारत-विरोधी कथानकों पर निर्भर होता जा रहा है। इसी उद्देश्य से राज्य-समर्थित मीडिया हाउसों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, यूट्यूबर्स और फिल्म निर्माताओं को सक्रिय किया जा रहा है ताकि सांस्कृतिक उत्पादन के माध्यम से ध्यान भटकाया जा सके और जनमत को प्रभावित किया जा सके। किसी भी स्थिति में, सिनेमा का हथियारीकरण कोई नई घटना नहीं है। दशकों से पाकिस्तानी फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों में सिख पात्रों, विशेषकर सिख महिलाओं, को अत्यंत संकीर्ण और गहराई से विवादास्पद दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है।
वेयरियम (1981) जैसी फिल्में इस बात के लिए याद की जाती हैं कि उनमें एक सिख महिला के भावनात्मक झुकाव को एक मुस्लिम पुरुष नायक की ओर इस तरह दिखाया गया है, जिससे परोक्ष रूप से इस्लाम और मुस्लिम संस्कृति को श्रेष्ठ और अधिक आकर्षक प्रस्तुत किया जाता है। पंजाबान (2003), जो एक पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुष और एक भारतीय सिख महिला के बीच सीमा-पार प्रेम कहानी पर केंद्रित है, को भी इस धारणा पर आधारित होने के कारण आलोचना का सामना करना पड़ा कि सिख महिलाएं भावनात्मक या आध्यात्मिक रूप से इस्लाम और मुस्लिम पाकिस्तान की ओर आकर्षित होती हैं।
पाकिस्तानी सिनेमा का उपयोग भारत-विरोधी कथानकों को मजबूत करने और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धार्मिक प्रतीकों के शोषण हेतु किया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि ऐसी रणनीतियां पवित्र स्थलों की मर्यादा को क्षीण करती हैं, विरासत के राजनीतिकरण को सामान्य बनाती हैं और कला व धर्म को राज्य सत्ता के उपकरण में बदल देती हैं। इसकी कीमत सरकारें नहीं, बल्कि वे समुदाय चुकाते हैं जिनकी पहचान को बार-बार हथियाया और विकृत किया जाता है, इसलिए सभी सिख संगठनों को इस मुद्दे का संज्ञान लेना चाहिए और इसे रोकने के लिए अभियान शुरू करने चाहिए, अन्यथा भविष्य में सिख समुदाय को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
दरबार साहिब की मर्यादा किससे भंग हुई? : श्री दरबार साहिब जो कि सिख समुदाय का सबसे पवित्र धार्मिक स्थल है और आज देश ही नहीं विदेश से भी अगर कोई सैलानी भारत आता है तो वह श्री दरबार के दर्शनों के लिए जरूर जाता है। इनमें ज्यादातर श्रद्धालु गैर सिख रहते हैं जिन्हें सिख मर्यादा की जानकारी नहीं रहती जिसके चलते कई बार मर्यादा भंग होने के आसार रहते हैं, मगर यह जिम्मेवारी वहां तैनात शिरोमणि कमेटी के सेवादारों की बनती है कि वह आने श्रद्धालुओं खासकर गैर सिखों को मर्यादा के प्रति जागरूक करें, वहीं कुछ शरारती अनसर इसका लाभ उठाकर जानबूझ कर श्री दरबार साहिब की पवित्रता भंग करने की फिराक मंे रहते हैं और हैरानी इस बात की है कि वह अक्सर अपने कृत्य को अंजाम देकर निकल जाते हैं, मगर उनके खिलाफ सेवादारों के द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की जाती है। जिसका पुख्ता प्रमाण हाल ही में देखने को मिला जब एक मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति ने सरोवर में न सिर्फ हाथ-पैर धोए, बल्कि मुंह में हाथ डालकर वही पानी बाहर निकालकर कुल्ला भी किया और वीडियो में साफ दिख रहा है कि वह हाथ उठाकर किस प्रकार सिख समाज को चैलेंज करके गया। ऐसा करने में उसे काफी समय लगा होगा मगर क्या इस दौरान किसी सेवादार या संगत का भी उस पर ध्यान नहीं गया। अक्सर देखने में आता है जब किसी महिला के सिर से थोड़ी सी भी चुनरी सरक जाए या फिर सैलानी फोन से अपने या अपने पारिवारिक सदस्यों की फोटो ही क्यों न ले रहे हों तो सेवादारों के साथ-साथ संगत के लोग भी उन्हंे तुरन्त रोकर नसीहत देने बैठ जाते हैं, पर इस मुस्लिम लड़के को न तो रोका गया और न ही आज तक इसके खिलाफ शिरोमणि कमेटी या किसी प्रमाणित सिख जत्थेबंदी ने कोई प्राथमिकी दर्ज करवाई है वहीं दूसरी ओर 2024 में योगा दिवस के मौके पर एक हिन्दू लड़की के योगा करने पर खूब हौ-हल्ला हुआ। सभी इसे मर्यादा का उल्लंघन बता रहे थे, पर आज इतना सब होने के बाद वह भी चुप्पी साधे हुए हैं जो कई सवालों को जन्म देता है।
अजयपाल सिंह बंगा की ट्रम्प टीम में उपस्थिति : विश्व बैंक समूह के भारतीय-अमेरिकी अध्यक्ष अजयपाल सिंह बंगा को ग़ज़ा संघर्ष को समाप्त करने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापक योजना के तहत गठित नए “शांति बोर्ड” में नियुक्त किया गया। यह उच्च-स्तरीय कार्यकारी बोर्ड संघर्षाेत्तर चरण में ग़ज़ा के अस्थायी शासन, पुनर्निर्माण और स्थिरीकरण की निगरानी करेगा। सात विशिष्ट सदस्यों में से एक के रूप में अजय बंगा की नियुक्ति न केवल वित्त और विकास के क्षेत्र में उनकी वैश्विक प्रतिष्ठा को दर्शाती है, बल्कि विश्वभर के सिखों के लिए उपलब्धि का प्रतीक भी है। पूणे के छोटे से गांव में जन्मे अजयपाल सिंह बंगा, जालंधर (पंजाब) से ताल्लुक रखने वाले एक पंजाबी सिख सैनी परिवार से हैं। उनकी जीवन-यात्रा सिख मूल्यों, कठोर परिश्रम, सेवा और दृढ़ता का जीवंत उदाहरण है। उनके पिता, लेफ्टिनेंट जनरल हरभजन सिंह बंगा, भारतीय सेना के एक सम्मानित अधिकारी थे, जिन्होंने कम उम्र से ही उनमें अनुशासन और वैश्विक दृष्टिकोण विकसित किया। बंगा अपनी सिख पहचान को गर्व से बनाए रखते हैं और अक्सर आस्था के प्रतीक के रूप में पगड़ी पहने दिखाई देते हैं, भले ही वे अंतर्राष्ट्रीय सत्ता के गलियारों में सक्रिय हों।

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