प्रयागराज की गरिमा

Summary :

प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान मौनी अमास्या के स्नान पर ज्योतिष मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को स्नान करने से रोकने पर जो बवाल मचा वह प्रयागराज की गरिमा के पूरी तरह से विपरीत है। प्रयागराज को लेकर सभी साधु-संतों और समाज में चिंतन भी है और गहरी चिंता भी, क्योंकि प्रयागराज की गरिमा को इस तरह की घटनाओं से ठेस पहुंची। आरोप लगाया जा रहा है कि पुलिस ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के समर्थकों को पीटा। शंकराचार्य के रथ को रोका गया। शंकराचार्य ने इसे संतों का अपमान बताते हुए धरने पर बैठने का फैसला…

प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान मौनी अमास्या के स्नान पर ज्योतिष मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को स्नान करने से रोकने पर जो बवाल मचा वह प्रयागराज की गरिमा के पूरी तरह से विपरीत है। प्रयागराज को लेकर सभी साधु-संतों और समाज में चिंतन भी है और गहरी चिंता भी, क्योंकि प्रयागराज की गरिमा को इस तरह की घटनाओं से ठेस पहुंची। आरोप लगाया जा रहा है कि पुलिस ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के समर्थकों को पीटा। शंकराचार्य के रथ को रोका गया। शंकराचार्य ने इसे संतों का अपमान बताते हुए धरने पर बैठने का फैसला किया और इसे धर्म से जुड़ी लड़ाई यानि धर्मयुद्ध घोषित कर दिया। इसी बीच माघ मेला प्रशासन ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस भेजकर उनके शंकराचार्य होने पर सवाल उठा दिए। माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को भेजे नोटिस में पूछा है कि उन्होंने अपने नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ क्यों लगाया है? मेला प्राधिकरण के नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन एक मामले का उल्लेख है। मेला प्रशासन का कहना है कि अभी तक इस मामले में कोई आदेश पारित नहीं हुआ है, ऐसे में कोई भी धर्माचार्य ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य के रूप में पट्टाभिषेक नहीं हो सकता। बावजूद इसके स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मेला क्षेत्र में लगे शिविर के बोर्ड पर अपने नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ अंकित किया है।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को उनके गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद शंकराचार्य बनाया गया था। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का 99 साल की आयु में लंबी बीमारी के बाद 11 सितंबर 2022 को निधन हो गया था। उन्होंने मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर के झोतेश्वर स्थित परमहंसी गंगा आश्रम में अंतिम सांस ली थी। उनको समाधि देने से पहले ही उनके उत्तराधिकारियों के नाम का ऐलान कर दिया गया था। स्वामी स्वरूपानंद की वसीयत के आधार पर उनके निजी सचिव और शिष्य सुबोद्धानंद महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ बद्रीनाथ और स्वामी सदानंद को द्वारका शारदा पीठ की गद्दी सौंपी थी। यह घोषणा शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के पार्थिव शरीर के सामने की गई थी। सनातन परंपरा में इन मठों के प्रमुखों को ही शंकराचार्य कहा जाता है।
बाद में उन्हें शंकराचार्य बनाए जाने को लेकर विवाद हो गया, क्योंकि संन्यासी अखाड़े ने उन्हें शंकराचार्य मानने से इंकार कर दिया था, तब से मामला सुप्रीम कोर्ट में लम्बित हैै। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने माघ मेला प्रशासन को नोटिस का जवाब देते हुए कहा है कि उनके शंकराचार्य होने को लेकर कोई विवाद नहीं है। उन्होंने अपने जवाब में पूरी कानूनी प्रक्रिया का ब्यौरा दिया है। उन्होंने अपने वकील के माध्यम से कानूनी नोटिस भेजा है कि अगर प्रशासन ने नोटिस को 24 घंटे के भीतर वापिस नहीं लिया तो वह कानूनी कार्यवाही करेंगे। इस पूरे विवाद को लेकर संत समाज बंट गया है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके समर्थकों का कहना है कि सरकार, प्रशासन या भारत के राष्ट्रपति को भी यह अधिकार नहीं है कि वह तय करे कि कौन शंकराचार्य है। शंकराचार्य का निर्णय संत समाज और शंकराचार्य ही करेंगे। दूसरी तरफ उनको शंकराचार्य स्वाकीर नहीं करने वाले संत अपनी अलग भाषा बोल रहे हैं। सवाल यह भी है कि 2025 के महाकुम्भ में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य के रूप में मान्यता दी गई थी तब द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती और श्रृंगेरी मठ के शंकराचार्य विधुशेखर भारती और ज्योतिष मठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने एक साथ महाकुम्भ में स्नान किया था। माघ मेले के दौरान ऐसा क्या हुआ कि उनको नो​िटस भेजकर विवाद को हवा दी गई है। विपक्ष कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने भी इस पर सवाल खड़े किए हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि गुरु-शिष्य की एक अखंड परम्परा होती है, जिसके तहत शंकराचार्य चुने जाते हैं लेकिन अब तो शंकराचार्य को कागज देकर यह पूछा जा रहा है कि आप हैं कौन? स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कई बार अपनी मुखरता और बयानों के कारण विवादों में रहे हैं। वेदांत, पुराण आैर ज्योतिष शास्त्र में भी विशेषज्ञता प्राप्त एक विद्वान के रूप में प्रसिद्ध स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने राम मंदिर को अधूरा बताते हुए प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल होने से इंकार कर दिया था। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनाने के दौरान उन्होंने दर्जनों पुराने मंदिरों को तोड़े जाने का ​िवरोध किया था। उन्होंने गौमांस के निर्यात पर कई बार सरकार से तीखे सवाल भी किए थे।
अब ऐसा अचानक क्या हो गया जो उन्हें स्नान करने से भी रोक दिया गया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी सनातन का ध्वज लेकर हिन्दुत्व का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। वे गौरक्षा के लिए सक्रिय हैं। उनका दावा है कि 12 सितम्बर, 2022 को उनका पट्टाभिषेक हो चुका है इस​िलए कोर्ट का आदेश कोई मायने नहीं रखता। उनकी नियुक्ति वसीयत के मुताबिक हुई है। इस विवाद को लेकर अब जमकर सियासत हो रही है। प्रशासन को इस विवाद को सूझबूझ से सुलझाना चाहिए आैर उन्हें सम्मानपूर्वक स्नान की अनुमति देनी चाहिए। भारतीय संस्कृति में संतों के अपमान के लिए कोई जगह नहीं है। धार्मिक आस्था को आघात पहुंचाने की भी कोशिश नहीं होनी चाहिए। इससे धर्म की हानि होती है आैर लोगों की आस्था खंडित होती है। प्रशासन को शंकराचार्य विवाद में न पड़कर प्रयागराज की गरिमा बहाल करनी चाहिए।

Aditya Chopra

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