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वो अपना घर छोड़कर क्यों जा रहे हैं ?

लोग मुझसे पूछते हैं कि आप कब जा रहे हो? अभी तक आप गए नहीं? मैं बस मुस्कुरा देता हूं, कहता हूं…ये बातें मैं सात-आठ साल से सुन रहा हूं। आज तक जहां था वहीं हूं, कल का ईश्वर जाने…अल्लाह जाने, मुझे कुछ मालूम नहीं। लोग फिर पलटकर यह सवाल भी पूछ लेते हैं कि बाकी लोग क्यों जा रहे हैं? यह सवाल वाकई बहुत गंभीर है, इस पर विचार करना वक्त की जरूरत है लेकिन जिन्हें विचार करना चाहिए क्या वे विचार कर रहे हैं? शायद नहीं। क्योंकि हालात कुछ ऐसे हैं जैसे पहले राजा-महाराजा जो कह देते थे…वही कायदा बन जाता था। सवाल करने का तो कोई सवाल ही नहीं है।
कहने को तो यह भी कहा जा रहा है कि कई लोग डर के कारण उधर जा रहे हैं, मुझे पता नहीं कितने लोग डर के कारण उधर गए हैं लेकिन मुझे लगता है कि अपना घर छोड़कर जाने के दो कारण हो सकते हैं। एक तो जहां पर हैं वहां उन्हें लगता है कि हमारा भविष्य नहीं है, हम जिन कारणों से राजनीति में आए मेरी वो आशा, आकांक्षा और राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती, इसलिए हम जा रहे हैं। यह कितनी गंभीर बात है कि महाराष्ट्र से अशोक चव्हाण जैसा बड़ा व्यक्ति कांग्रेस छोड़ कर चला गया। या प्रफुल्ल पटेल राष्ट्रवादी कांग्रेस से चले गए।
दूसरा कारण यह हो सकता है कि जिन कामों के लिए राजनीति में गए वो काम पूरे होने की कोई उम्मीद न बची हो। सभी लोग राजनीति में पैसा कमाने के लिए नहीं आते। वो तो कुछ लोगों ने अपनी हरकतों से राजनीति को बदनाम किया अन्यथा लोग यह चाहत लेकर राजनीति में आते हैं कि हमारे क्षेत्र और हमारे राज्य का विकास होगा। हम विकसित भारत के अंग बनेंगे। राजनीति में काम करने से ही वजूद बना रहता है, आखिर विकास तो करना ही होगा, लोगों की समस्याओं का समाधान निकालना ही होगा। यदि इसमें शंका पैदा हो जाए तो फिर कोई व्यक्ति पार्टी में कैसे टिके? कम से कम कोई बात तो सुनने वाला होना चाहिए, कोई तो हालात पर विचार करने वाला होना चाहिए। लेकिन यहां तो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को घर छोड़कर जाने वालों की कोई फिक्र ही नहीं है, क्यों गुलाम नबी आजाद चले गए? पूर्वोत्तर में कांग्रेस की बड़ी ताकत रहे हिमंत बिस्वा सरमा क्यों चले गए? क्यों आर.पी.एन. सिंह या कृपाशंकर सिंह चले गए? क्यों आनंद शर्मा या मणिशंकर अय्यर, सचिन पायलट जैसे लोग हाशिए पर पड़े हुए हैं? कमलनाथ तो जाते-जाते इसलिए रुक गए क्योंकि सोनिया गांधी ने उन्हें फोन किया और कमलनाथ के अतीत को लेकर भाजपा में विरोध हो गया।
क्या किसी ने यह जानने-समझने की कोई सार्थक कोशिश की कि ज्योतिरादित्य सिंधिया क्यों चले गए या जितिन प्रसाद या फिर मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस को अलविदा क्यों कह दिया? ये तो सब राहुल गांधी की किचन कैबिनेट के लोग थे, हमउम्र थे क्या इन लोगों को ऐसा नहीं लगा होगा कि यहां तो दस साल तक कुछ होने की संभावना नहीं है और दस साल में तो हम बूढ़े हो जाएंगे। सब लोगों की किस्मत ऐसी कहां होती है कि कल भी युवा थे, आज भी युवा हैं और कल भी युवा रहेंगे।
अब तो सोनिया गांधी ने सारा दायित्व राहुल गांधी को दे दिया है। राहुल गांधी खूब मेहनत कर रहे हैं। उन्होंने दायित्व पार्टी नेताओं को सौंप रखा है लेकिन वो नेता क्या कर रहे हैं? राहुल गांधी की यात्राओं के बीच कहीं जीत मिल गई तो श्रेय मिल गया लेकिन हकीकत तो यही है कि जहां जीत मिली है वहां स्थानीय नेताओं का प्रभामंडल काम आया है। तेलंगाना में ए. रेवंत रेड्डी ने एक मिलियनेयर मुख्यमंत्री को हरा दिया तो वो उनकी ताकत थी। अन्यथा कांग्रेस में तो झगड़ा लगाओ और मजे लो की नीति चल रही है। गोवा और मध्य प्रदेश तो जीत कर भी हार गए ना, सरकार गंवा दी।
चलिए, देर से ही सही कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुए, मल्लिकार्जुन खड़गे अच्छे व्यक्ति हैं लेकिन उम्र सक्रियता को निश्चय ही प्रभावित करती है। आकर्षण और ऊर्जा बनाए रखने के लिए नई हवा को संगठन में प्रवाहित करने की जरूरत होती है। अगली पीढ़ी को कमान देनी ही होती है, क्या इस बात की कहीं चर्चा है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस कहां है? पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ कैसा व्यवहार किया? हरियाणा में हुड्डा से कैसा बर्ताव कर रहे हैं, तमिलनाडु तो हाथ से गया ही, गढ़ रहे कर्नाटक में भाजपा ने सेंध लगा दी।
महात्मा गांधी और सरदार पटेल की जन्मभूमि गुजरात से लेकर ओडिशा तक में कांग्रेस ध्वस्त है, और हां, हकीकत यह भी है कि लोग भाजपा से मोहित नहीं हैं बल्कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के विकास के एजेंडे से प्रभावित होकर साथ जा रहे हैं लेकिन कांग्रेस को ऐसा नहीं लग रहा है। विचारों की बात बिल्कुल छोड़ दीजिए क्योंकि विचार तो अब सिर्फ दिखावे के रह गए हैं। हां कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा व सुप्रिया श्रीनेत जैसे नेताओं को मोर्चा संभाले देखता हूंं तो उम्मीद की किरण दिखती है लेकिन उन्हें संसद में पहुंचने का मौका भी तो मिलना चाहिए। यहां तो टांग खींचने का चलन बढ़ गया है। कांग्रेस के विचारों को हर मोर्चे पर पूरी मजबूती के साथ डिफेंड करने वाला अभिषेक मनु सिंघवी जैसा विद्वान राज्यसभा चुनाव हार जाता है, इससे ज्यादा गंभीर बात क्या हो सकती है? इससे जाहिर होता है कि कांग्रेस का चुनाव मैनेजमेंट कैसे काम कर रहा है। आज नीतीश कुमार फिर भाजपा के साथ हैं तो इसमें क्या कांग्रेस दोषी नहीं है? अब कहां है इंडिया गठबंधन? आपने वाकओवर दे दिया है, आप कहते रहिए कि आई लव माई इंडिया और वो आपको चारों खाने चित करते रहेंगे, मौजूदा वक्त का सच यही है।

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