क्यों है भारत हिंदू-मुस्लिम एकता का स्वर्ग!

अंतरधर्म सद्भाव आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि दो पंक्तियों में भारत की अंतरधर्म सद्भाव, समरसता और समभाव से प्रेरित सभ्यता को पेश किया जाए तो अफजल मंगलौरी का यह कहना सही होगा, “मुझ को सुकून मिलता है मेरी आज़ान से, यह देश सुरक्षित है गीता के ज्ञान से !”
अगर भारत रत्न, बिस्मिल्लाह खां ने अपने शहनाई वादन द्वारा बनारस से गंगा मैया के किनारे सुबह-ए-बनारस से शुरूआत की तो लता मंगेशकर ने, “बेकस पे करम कीजिए सरकार-ए-मदीना”, गाया। ऐसे ही शकील बदायूनी ने भी भजन “हरि दर्शन को मन तरपत है” लिखा, जिसे, मुहम्मद रफ़ी ने सुरों में स्वर दे कर और नौशाद ने म्यूजिक में बांध कर भारत की आत्मा का दर्शन कराया। यदि महा कवि तुलसी दास ने मस्जिद में बैठ कर महाकाव्य की रचना की तो बेगम अख्तर ने मंदिरों में भजन और ठुमरी का गायन किया। यही सदियों से हमारी गंगा जमुनी तहज़ीब है। यदि एक ओर दिल्ली की शाहजहानी मस्जिद है तो तिरुपति बालाजी मंदिर भी है और अगर पुणे का शनिवारवाड़ा है तो दूसरी ओर दिल्ली का लाल क़िला भी है। चांदनी चौक में यदि दिगंबर जैन लाल मंदिर, गौरी शंकर मंदिर, आर्य समाज मंदिर, गुरुद्वारा सीसगंज साहब और जैन स्थानक हैं तो उसी सड़क पर सेंट्रल बैपटिस्ट चर्च और सुनहरी मस्जिद व फतेहपुरी मस्जिद भी हैं।
क्या सुनहरा संगम है, जो दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। भारत माता की जय! भारत में अंतरधर्म सद्भाव कोई आदर्श मात्र नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है जिसे हमें अपने व्यवहार, शिक्षा और सामाजिक जीवन में निरंतर मजबूत करना चाहिए। भारत को “हिंदू-मुस्लिम एकता का स्वर्ग” कहना केवल एक भावनात्मक कथन नहीं, बल्कि हमारी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक सच्चाई का सार है। सदियों से इस देश में विभिन्न धर्मों, भाषाओं और परंपराओं के लोग मिल-जुलकर रहते आए हैं। विशेष रूप से हिंदू और मुस्लिम समुदायों की साझा विरासत ने भारत की पहचान को अद्वितीय बनाया है। भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब इस एकता का सबसे सुंदर उदाहरण है।
यहां दीवाली की रोशनी में मुस्लिम भी खुशी मनाते हैं और ईद के मौके पर हिंदू भाईचारे के साथ गले मिलते हैं। धर्म का मूल उद्देश्य मानवता और नैतिकता का विकास है, न कि विभाजन। जब हम धर्म के मूल संदेश-प्रेम, करुणा और सह-अस्तित्व को समझेंगे तभी सच्चा अंतरधर्म सद्भाव स्थापित हो सकेगा। यह परंपरा केवल त्यौहारों तक सीमित नहीं है, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी झलकती है, चाहे वह पड़ोस की साझी खुशियां हों या मुश्किल समय में एक-दूसरे का सहारा बनना। इतिहास के पन्नों में भी हमें अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां हिंदू-मुस्लिम एकता ने देश को मजबूती दी। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में दोनों समुदायों ने मिलकर अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। इसी तरह स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे नेताओं ने एकता और भाईचारे का संदेश दिया। अगर बच्चों को बचपन से ही सहिष्णुता, आपसी सम्मान और भाईचारे के संस्कार दिए जाएं तो समाज में नफरत की कोई जगह नहीं रहेगी। भारतीय संस्कृति में यह समन्वय साहित्य, संगीत और कला में भी स्पष्ट दिखाई देता है।
कबीर और रहीम जैसे संत-कवियों ने धर्म से ऊपर उठकर मानवता का संदेश दिया। उनके दोहे और रचनाएं आज भी हमें एकता का मार्ग दिखाते हैं। हालांकि समय-समय पर कुछ ताकतें इस एकता को कमजोर करने की कोशिश करती हैं लेकिन भारत की जनता ने हमेशा आपसी प्रेम और सौहार्द को प्राथमिकता दी है। हमें यह समझना होगा कि देश की असली ताकत उसकी विविधता में एकता है। अंत में, यह कहना उचित होगा कि भारत सचमुच हिंदू-मुस्लिम एकता का स्वर्ग है।
यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इस विरासत को सहेजें और आने वाली पीढ़ियों तक प्रेम, सम्मान और भाईचारे का यह संदेश पहुंचाएं, कुछ इस प्रकार से, अमीर खुसरो की पंक्तियों में: “धर्म मेरा इस्लाम है, देश हिंदुस्तान, वज़ू करूं अजमेर में, काशी में अशनान, चाहे गीता बांचिए, या पढ़िए कुरान तेरा मेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान!”

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