भारत में ग्लोबल वार्मिंग का असर अब साफ नजर आने लगा है। अभी मार्च माह की शुरूआत ही हुई है और गर्मी ने अभी से ही अपने रिकॉर्ड तोड़ना शुरू कर दिया है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार मार्च के महीने में ही पसीने छूटने की मुख्य वजह तापमान में अचानक हुई बढ़ौतरी है। मौसम के ताजा आंकड़ों के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में अधिकतम तापमान लगभग 36 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। यह तापमान इस समय के लिए सामान्य से अधिक माना जा रहा है।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी तेज गर्मी मार्च के शुरुआती दिनों में कम ही देखने को मिलती है। ऐसे में यह भी कहा जा रहा है कि पिछले कई दशकों में मार्च के दौरान इतनी गर्मी कम ही दर्ज की गई है। कई लोग इसे पिछले करीब 50 वर्षों में सबसे ज्यादा गर्म मार्च की शुरुआत में से एक मान रहे हैं। हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन का असर मौसम पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
इसी वजह से मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है और गर्मी पहले की तुलना में जल्दी शुरू हो रही है। इसका असर यह है कि अब तापमान तेजी से बढ़ रहा है और गर्म दिनों की संख्या भी बढ़ रही है। कभी-कभी लू की अवधि भी पहले से अधिक लंबी हो जाती है। पिछले कुछ वर्षों में देश के कई शहरों ने गर्मी के पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। कुछ स्थानों पर तापमान 48 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया है।
यदि यह स्थिति बनी रहती है तो आने वाले वर्षों में गर्मी और भी तीव्र हो सकती है। भारत की पारंपरिक पहचान उसके विविध ऋतु-चक्र से रही है, लेकिन अब यह चक्र पूरी तरह से टूट चुका है। ’’सेंटर फार साइंस एंड एनवायरनमेंट’’ (सीएसई) एवं ’’डाउन टू अर्थ’’ की नई रिपोर्ट’’ इंडिया क्लाइमेट 2025’’ ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है जहां ’’चरम मौसम’’ कोई अपवाद नहीं बल्कि रोजमर्रा की हकीकत बन गया है।
सीएसई ने मौसम विभाग, गृह मंत्रालय के आपदा प्रबंधन विभाग एवं विभिन्न राज्यों की एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर विश्लेषण किया है। साथ ही साल 2022 से सितंबर 2025 तक लगभग 1500 दिनों की भारत की मौसम संबंधी आपदाओं का एक नया नक्शा तैयार किया है। अध्ययन का सबसे चौंकाने वाला निष्कर्ष यह है कि भारत में ऋतुओं का आपस में विलय हो रहा है। सर्दी, गर्मी और वर्षा के बीच की स्पष्ट रेखाएं अब धुंधली पड़ चुकी हैं। आंकड़े बताते हैं कि साल 2025 के पहले नौ महीनों (जनवरी से सितंबर) के दौरान देश ने लगभग 99 प्रतिशत दिन चरम मौसम की मार झेली है।
इसका मतलब है कि इन 273 दिनों में से शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो, जब भारत के किसी न किसी हिस्से में भारी वर्षा, लू, ओलावृष्टि या चक्रवात जैसी आपदा न आई हो। उत्तर प्रदेश में भी गर्मी का असर तेजी से बढ़ने लगा है। तीन साल बाद मार्च के पहले सप्ताह में ही तापमान 35 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि इस महीने तापमान 40 डिग्री तक पहुंच सकता है।
2025 में, मार्च के पहले सप्ताह के दौरान, उत्तर प्रदेश के अधिकांश शहरों में दिन का तापमान 29 से 31 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज किया गया, जबकि रात का तापमान लगभग 14 से 19 डिग्री सेल्सियस के बीच रहा। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 1 मार्च 2026 को दिन का अधिकतम तापमान 32.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया जो पिछले तीन वर्षों में मार्च की शुरुआत का उच्चतम तापमान है।
इससे पहले 2023 में 1 मार्च को दर्ज किया गया अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस था। मौसम विज्ञानियों के अनुसार, मार्च की शुरुआत में इतना अधिक तापमान इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में गर्मी तेजी से बढ़ सकती है। जाहिर है मौसम के मिजाज में आ रहे इस असामान्य बदलाव का हमारे जीवन और आजीविका पर गहरा प्रभाव आने वाले दिनों में नजर आएगा, जिसको लेकर देशव्यापी चर्चा जारी है। विशेषकर उत्तर भारत के कृषि क्षेत्र में इसके नकारात्मक आर्थिक परिणामों को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है।
वास्तव में मौसमी बदलाव फलों के नाजुक जैविक चक्र को बाधित कर रहा है, जिसके चलते उपज में भारी नुक्सान के साथ-साथ गुणवत्ता में गिरावट की आशंका व्यक्त की जा रही है।
कृषि वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मार्च का महीना किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। तापमान में वृद्धि से रबी की फसलों, विशेषकर गेहूं पर असर पड़ेगा। गर्मी के कारण अनाज का पूर्ण विकास नहीं हो पाएगा जिससे पैदावार कम होगी। गर्म हवाओं से सरसों, चना और मटर जैसी फसलों को नुक्सान हो सकता है। बढ़ते तापमान के कारण खेतों की मिट्टी जल्दी सूख जाती है। इससे सिंचाई की लागत बढ़ जाती है और फसलों पर दबाव पड़ता है।
चिंता की बात यह भी है कि हिमाचल प्रदेश के सेब के बागों में कम होती ठंडक से उत्पादकता में गिरावट देखी जा रही है। इससे बचने के लिए अनुकूलन उपायों में जलवायु अनुरूप बागवानी पद्धतियों को अपनाने और दीर्घकाल में सेब पट्टी को ऊंचे क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की जरूरत होगी।
आवश्यकता होगी कि हम सूखा-सहिष्णु फसलों को अपनाएं। कम जल के बेहतर उपयोग के प्रयास हों। मौसम के बदलने के दौरान बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर असर पड़ता है जिससे उन्हें श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा अधिक हो जाता है। सुबह-शाम की ठंडी हवा, धूल-मिट्टी और प्रदूषण भी बच्चों में एलर्जी और अस्थमा की समस्या को बढ़ा रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को लेकर इस मौसम में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। उन्हें ठंडी चीजें जैसे आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक देने से परहेज करें, उन्हें धूल और धुएं से बचाकर रखें। इसके साथ ही बच्चों को मौसम के अनुसार कपड़े पहनाना भी जरूरी है।
कई स्टडी के द्वारा यह साफ हुआ है कि भारत में ग्रीष्म ऋतु में आने वाले लू के दिनों की संख्या 1980 के बाद से दोगुनी से भी अधिक हो गई है। हमारे देश में तीव्र शहरीकरण, सघन निर्माण और हरित क्षेत्रों के लगातार जारी क्षरण के चलते भी तापमान में वृद्धि हुई है। ऐसे में बढ़ते तापमान से उत्पन्न जल व ऊर्जा संकट से निपटने के लिए तत्काल कारगर योजनाओं की जरूरत है।
इसके साथ ही शीत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु में तेजी से होने वाले परिवर्तन के इस नये असामान्य परिदृश्य के लिए नागरिकों की जिम्मेदारियों और कर्त्तव्यों के लिए भी एक नया चार्टर बनाने की आवश्यकता होगी। सरकारों की तैयारियों को लेकर भी स्पष्ट रीति-नीति का निर्धारण जरूरी है। निस्संदेह, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के निस्तारण के लिए रणनीतियों को लेकर सहभागी दृष्टिकोण प्रभावकारी हो सकता है। आने वाले समय में मौसम की चरम स्थितियां घातक साबित हो सकती हैं, जिनका मुकाबला मौजूदा अपर्याप्त प्रशासनिक योजनाओं के जरिये संभव न होगा।
इसके लिए कारगर रणनीतियां बनाने की जरूरत होगी। हमें बिजली की अनुमानित मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को कम करना होगा। समय-समय पर स्वास्थ्य संबंधी परामर्श जारी करने तथा प्रभावी उपचार की उपलब्धता भी जरूरी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हमें बिजली और पानी की बर्बादी पर रोक लगाने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे। वहीं आने वाले वर्षों में मौसम चक्र में आने वाला यह बदलाव और तेज होने का अनुमान है। अगर समय रहते उससे बचाव के उपाय नहीं किए गए तो खेती, पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें कई गुना बढ़ जाएंगी।


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