यूपी के 8 जिलों के नाम बदले जाएंगे?

Summary :

‘क्या तुझसे मेरी बस इतनी थी कैफियत और वाक़फ़ियत कि आज नामों के भीड़ में खो गई है जैसे मेरी शख्सियत’ अगले ही वर्ष मार्च में यूपी में विधानसभा चुनाव होने हैं, यूपी सरकार को भलीभांति इस बात का इल्म है कि यह चुनाव कांटे की टक्कर का चुनाव होने वाला है, सपा भी इस चुनाव में पूरा दम-खम लगाएगी, सो सरकार ने अभी से नए चुनावी पैंतरे आजमाने शुरू कर दिए हैं। पिछले दिनों सरकार ने यूपी के 8 जिलों के नाम बदलने का एक प्रस्ताव केंद्र को भेजा था, पर कुछ कारणों से केंद्र को यह प्रस्ताव रास…

‘क्या तुझसे मेरी बस इतनी थी कैफियत और वाक़फ़ियत
कि आज नामों के भीड़ में खो गई है जैसे मेरी शख्सियत’
अगले ही वर्ष मार्च में यूपी में विधानसभा चुनाव होने हैं, यूपी सरकार को भलीभांति इस बात का इल्म है कि यह चुनाव कांटे की टक्कर का चुनाव होने वाला है, सपा भी इस चुनाव में पूरा दम-खम लगाएगी, सो सरकार ने अभी से नए चुनावी पैंतरे आजमाने शुरू कर दिए हैं। पिछले दिनों सरकार ने यूपी के 8 जिलों के नाम बदलने का एक प्रस्ताव केंद्र को भेजा था, पर कुछ कारणों से केंद्र को यह प्रस्ताव रास नहीं आया है। बलरामपुर का नाम अटल बिहारी वाजपेयी के नाम करने, बस्ती का नाम भाजपा व संघ के सीनियर नेता माधव प्रसाद त्रिपाठी के नाम और बुलंदशहर का नाम भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के नाम रखने का प्रस्ताव भेजा गया था। सूत्रों की मानें तो मूलतः यह परिकल्पना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है जिसे योगी आगे ले जाना चाहते हैं। संघ चाहता है कि मायावती ने जिस तरह ‘हीरो और आयकन’ के नामों को महिमामंडित करते यूपी के जिलों के नए नाम रखे थे, मसलन सावित्री बाई फूले नगर, गौतमबुद्ध नगर आदि भाजपा सरकार भी इसी परंपरा को आत्मसात करते हुए आगे बढ़े। पर केंद्र की नौकरशाही को यूपी सरकार का यह प्रस्ताव रास नहीं आया है, इनका मानना है कि ‘राज्य सरकार को अपनी सोच का दायरा बढ़ाते हुए इसे व्यापकता में सोचना होगा,’ केंद्र की नौकरशाही ने जैसे अपनी ओर से राज्य सरकार को कुछ नामों के सुझाव भी दिए हैं, जैसे 1857 के सैनिक विद्रोह को आधार बनाकर कानपुर का नाम क्रांति नगर किया जा सकता है, झांसी का नाम लक्शमीबाई नगर रखा जा सकता है। फिलहाल यह पूरा मामला ही अधर में अटक गया लगता है।
जब अभिषेक को लगा शॉक : 2011 में एक नई राजनीति का उद्घोष और एक थकी हुई जड़ वाम व्यवस्था को ध्वस्त करने के संकल्प के साथ ममता बनर्जी पश्चिम-बंगाल में सत्ता में आई तो लोगों को एक नई आशावादी राजनीति की आस बंध गई थी, पर पिछले पंद्रह सालों के तृणमूल शासनकाल में ममता भी आंदोलन से मशीन बनती चली गई, लोकतांत्रिक भरोसा भी पहले की तरह चरमराने लगा था और कई मायनों ये तृणमूल सरकार भी अपनी पूर्ववर्ती वाम सरकार की ही प्रतिबिंब बन गई थी। इस दफे की भगवा आंधी में जब ममता का किला ध्वस्त हो गया, उनके विधायकों की संख्या 213 से घटकर इस बार जब महज़ 80 रह गई तो पार्टी नियंताओं को भी नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा। पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजे आने के ठीक एक रोज बाद अभिषेक बनर्जी ने अपने चुने हुए विधायकों और तमाम जिला अध्यक्षाें की एक अहम ‘जूम मीटिंग’ बुलाई। जब यह ऑनलाइन मीटिंग शुरू हुई तो चार जिलाध्यक्ष नदारद थे, पर उन्होंने अभिषेक को मैसेज भेज दिया कि ’इतने मैराथन चुनाव प्रक्रिया से जूझने के बाद वे थक गए हैं, सो छुट्टियां मनाने परिवार के साथ वे बाहर आ गए हैं, नेटवर्क की समस्या है, जहां वे इस वक्त हैं सो वे जूम कॉल में शामिल नहीं हो पा रहे।’ यहां तक तो बात ठीक थी जब अभिषेक ने गौर फर्माया कि चुने हुए 80 में से सिर्फ 69 विधायक ही उनकी जूम मीटिंग से जुड़े हैं, बाकी 11 का अता-पता नहीं तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। पर उनके साथ बैठक में मौजूद एक सीनियर टीएमसी नेता ने अभिषेक को शांत कराते हुए कहा-’कोई बात नहीं अभी कैडर को थोड़ा सांस लेने दो, अभी बड़ी लड़ाई लड़कर आए हैं, आगे और भी भीषण लड़ाईयां लड़नी हैं, अभी भाला उठाना ठीक नहीं, हम विरोधियों पर हमला तब बोलेंगे जब यह भाजपा सरकार गलती करेगी।’ अभिषेक को मौजूदा हालात और नई राजनीति की थोड़ी समझ आ गई।
राहुल को अपने लिए गोपाल की तलाश : राहुल गांधी के आंख, नाक, कान रहे केसी वेणुगोपाल की क्या यह विदाई की बेला है, वे लंबे समय से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में बतौर महासचिव कार्यरत हैं, पहली दफे उन्हें यह जिम्मेदारी अप्रैल 2017 में मिली थी जब इन्हें पार्टी महासचिव बनाया गया था और कर्नाटक का प्रभारी भी। इसके बाद राहुल गांधी की पहल पर इन्हें संगठन की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई, और आज इतने वर्षों बाद भी वे संगठन महासचिव के पद पर बहाल हैं। अब दो कारणों से उनकी यहां से रुखसती की खबरों को बल मिल रहे हैं एक तो कांग्रेस संगठन का पुनर्गठन लंबे समय से लंबित है, अब खबरें आ रही हैं कि कांग्रेस संगठन को जल्द ही नया चेहरा-मोहरा प्रदान किया जाएगा, शायद यही वजह है कि अब वेणुगोपाल के उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हो गई है।
फिलहाल इस रेस में तीन नाम चल रहे हैं, सोनिया की पसंद के तौर पर अशोक गहलोत का नाम सबसे आगे है, वरिष्ठता के आधार पर कमलनाथ भी इस रेस में लगातार बने हुए हैं, वहीं राहुल की पसंद की बात करें तो वे अपनी ओर से भंवर जितेंद्र सिंह का नाम आगे बढ़ा रहे हैं। केसी वेणुगोपाल का नाम केरलम में अगले मुख्यमंत्री के तौर पर भी चल रहा है, वे केरलम के अल्लापुरा से विधानसभा सीट से 1996, 2001 और 2006 में विधायक भी रह चुके हैं, पर केरलम की स्थानीय कांग्रेसी राजनीति में केसी को चाहने वालों की कतार कोई इतनी लंबी नहीं।
केरलम के कांग्रेसी नेताओं व कार्यकर्ताओं की आम शिकायत रही है कि ‘दिल्ली में केसी अक्सर उनकी पहुंच से दूर रहते हैं, उनसे मिलने का वक्त ले पाना भी खासा मुश्किल है, क्योंकि वे पूरे समय गांधी परिवार के साए में आंकठ डूबे रहते हैं।’ वहीं राज्य में केसी के विरोधी गुट वी.डी. सतीशन गुट के नेताओं का कहना है कि इनका यानी केसी का स्टेट पॉलिटिक्स में आखिरकार योगदान ही क्या है?’ वहीं दिल्ली में पांच साल से ज्यादा वक्त तक संगठन महासचिव पद की जिम्मेदारी निभाते केसी ने अपने पूर्ववर्त्तियों के मुकाबले इस पद के प्रोफाइल और कार्यशैली को ही पूरी तरह बदल दिया है, इनके पूर्ववर्त्तियों ने इस पद पर रहते एक ‘ट्रबल शूटर’ की तरह काम किया, वहीं केसी ने खुद को राहुल गांधी के साए के तौर पर बदल लिया, वे राहुल के आगे-पीछे डोलने वाले नेताओं में ही शुमार होकर रह गए। अब पार्टी को इस पद पर एक संकटमोचक नेता की आवश्यकता है, जो हर विकट परिस्थितियों में पार्टी को उबार सके, शायद इसीलिए फिलवक्त सोनिया की नज़र इस पद के लिए केवल और केवल अशोक गहलोत पर टिकी है।
एनटीपीसी चेयरमेन का सफर  : पिछले दस वर्षों से एनटीपीसी के चेयरमैन और मैनजिंग डायरेक्टर के पद पर काबिज रहने वाले गुरदीप सिंह एक और बड़ी छलांग लगाने जा रहे हैं, सूत्र बताते हैं कि वे प्रधानमंत्री के सलाहकार के तौर पर जल्द ही पीएमओ में तरुण कपूर की जगह ले सकते हैं। जहां उन्हें ‘एनर्जी और इंफ्रा सेक्टर’ देखने की एक अहम जिम्मेदारी मिल सकती है। सनद रहे कि गुरदीप 2016 से ही लगातार एनटीपीसी में इस शीर्ष पद पर बने हुए हैं। गुरदीप को ऊर्जा सेक्टर में 35 वर्षों से ज्यादा का लंबा अनुभव रहा है, उन्होंने इसी संस्था में 1987 में बतौर इंजीनियर अपना कैरियर शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने एनर्जी सेक्टर की कई बड़ी कंपनियों मसलन पॉवर जेन, सीईएससी, आईडीएफसी आदि में काम किया है। पिछले ही वर्ष 31 जुलाई 2025 को इन्हें एनटीपीसी में 1 अगस्त 2026 तक यानी एक वर्ष का सेवा विस्तार मिला है। अब उनके उत्तराधिकारी की तलाश में पॉवर मंत्रालय ने ‘सर्च कम सेलेक्शन कमेटी’ का गठन किया है, ऐसी कमेटी का गठन तब किया जाता है जब पीईएसबी किसी योग्य उम्मीदवार का चयन अपने बलबूते नहीं कर पाती। सूत्रों की मानें तो एनटीपीसी चेयरमैन के लिए बीते एक वर्ष में कम से कम 12 उम्मीदवारों के इंटरव्यू हुए हैं, पर इनमें से किसी को भी इस पद के काबिल नहीं पाया गया।
…और अंत में : इस दफे के बंगाल चुनाव के नतीजे जैसे ही सामने आए, दीदी से मिलने कोलकाता जाने से पूर्व अखिलेश ने कोई चालीस-पैंतालिस मिनट फोन पर ममता बनर्जी से बात की और उनसे जानना चाहा कि ‘आखिर इस बार के चुनाव में उनसे और उनके रणनीतिकारों से चूक कहां हो गई?’ दीदी ने छूटते ही अखिलेश से कहा-’इन आईपैक वालों ने मुझे मूर्ख बनाया, वे आखिरी समय तक कहते रहे कि हम जीत रहे हैं, उनकी सीटों को लेकर अंतिम रिपोर्ट भी 190 सीटें हैं, वे कह रहे थे चाहे हालात कितने भी प्रतिकूल हो हम कम से कम इतनी सीटें तो जीत ही रहे हैं। मेरी भवानीपुर सीट को लेकर भी उन्होंने हमेशा कहा यहां कोई दिक्कत नहीं, पहले बताते तो मैं सीट बदलने की तो सोच ही सकती थी, नतीजों के बाद ये कहने लगे कि हम ‘एसआईआर’ के इम्पैक्ट को ठीक से मेजर नहीं कर पाए, इनका सारा ध्यान हमसे पैसे खींचने में था।’ दीदी की बातों को अखिलेश के मन पर गहरा असर हुआ, फोन रखते ही जो उन्होंने पहला निर्णय लिया कि वे अपना काम आईपैक को नहीं देंगे। इसके बाद ही सपा की आईपैक से संबंध विच्छेद की घोषणा हो गई।

त्रिदीब रमण