मातृ दिवस… ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी

Summary :

आज मातृ दिवस के इस पावन अवसर पर मैं संसार की प्रत्येक मां को नमन करती हूं। मां केवल एक शब्द नहीं है, मां भावना है, एक शक्ति है, एक त्याग है, एक तपस्या है। कहते हैं न जहां ईश्वर नहीं पहुंच सकते वहां मां पहुंचती है। इसलिए शायद ईश्वर ने मां को बनाया है। एक महिला कभी मां बनकर बच्चों को संस्कार देती है, कभी बहन बनकर प्रेम देती है, कभी पत्नी बनकर परिवार को सम्भालती है और कभी बेटी बनकर घर में खुशियां लाती है। समय के साथ-साथ मां सुपर वूमन भी बन जाती है। सुपर वूमन कैसी…

आज मातृ दिवस के इस पावन अवसर पर मैं संसार की प्रत्येक मां को नमन करती हूं। मां केवल एक शब्द नहीं है, मां भावना है, एक शक्ति है, एक त्याग है, एक तपस्या है। कहते हैं न जहां ईश्वर नहीं पहुंच सकते वहां मां पहुंचती है। इसलिए शायद ईश्वर ने मां को बनाया है।
एक महिला कभी मां बनकर बच्चों को संस्कार देती है, कभी बहन बनकर प्रेम देती है, कभी पत्नी बनकर परिवार को सम्भालती है और कभी बेटी बनकर घर में खुशियां लाती है। समय के साथ-साथ मां सुपर वूमन भी बन जाती है।
सुपर वूमन कैसी होती है, जो अपने आंसू छिपाकर परिवार को मुस्कान देती है, जो थकने के बाद भी बच्चों का भविष्य बनाती है। जो अपने सपनों के साथ-साथ परिवार के सपनों को भी पूरा करती है, वही असली सुपर वूमन होती है। मातृ दिवस सम्मान का ही नहीं बल्कि हमें मां को अवसर और सहयोग भी देना होगा। यदि एक महिला के रूप में मां का सम्मान होता है तो परिवार मजबूत होता है। परिवार मजबूत होता है तो समाज मजबूत होता है। जब समाज मजबूत होता तो राष्ट्र भी मजबूत होता है। मां ममता है, मां शक्ति है, मां जीवन की सच्ची भक्ति है। जिस घर में मां का सम्मान होता है तो वह घर सच्चे अर्थों में भगवान का घर है। जब घर में बैठी मां को पूजा जाता है तो उसका दर्जा देवी मां जैसा हो जाता है तथा वह प्रसन्न हो जाती है। इसलिए घर में बैठी मां को प्रसन्न रखना ही सबसे बड़ी पूजा है। संस्कार, नैतिकता और नई पीढ़ी के कर्त्तव्य सब मां को समर्पित हैं और रहेंगे भी। मातृ दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि माँ के प्रति सम्मान, प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर है। संसार में माँ का स्थान सबसे ऊँचा माना गया है। वह केवल जन्म देने वाली नहीं होती, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली प्रथम गुरु भी होती है। बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर और पहली शिक्षिका उसकी माँ होती है। इसलिए भारतीय संस्कृति में “मातृ देवो भवः” कहा गया है, अर्थात् माँ को देवता के समान सम्मान देना चाहिए लेकिन यह भी सच है कि आज के आधुनिक युग में जहाँ तकनीक और भौतिकता तेजी से बढ़ रही है, वहीं पारिवारिक संस्कार और नैतिक मूल्य धीरे-धीरे कमजोर होते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे समय में मातृ दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारी संस्कृति, नैतिकता और जीवन के मूल मूल्य माँ से ही प्रारम्भ होते हैं। नई पीढ़ी को यदि संस्कारी, जिम्मेदार और नैतिक बनाना है, तो उन्हें माँ के महत्व को समझाना अत्यंत आवश्यक है।
बदलते समय में आज की नई पीढ़ी सोशल मीडिया, मोबाइल और आधुनिक जीवनशैली में इतनी व्यस्त हो गई है कि परिवार के साथ समय बिताना कम हो गया है। कई बच्चे अपने माता-पिता, विशेषकर माँ के त्याग और संघर्ष को समझ नहीं पाते। वे सफलता और धन को ही जीवन का मुख्य उद्देश्य मान लेते हैं। यही कारण है कि समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास दिखाई देता है। मातृ दिवस केवल उपहार देने का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन का अवसर है कि क्या हम अपनी माँ का सम्मान करते हैं, क्या हम उनके प्रति अपने कर्तव्यों को निभा रहे हैं, और क्या हम उनके संस्कारों को अपने जीवन में उतार रहे हैं।
हमारे इतिहास तथा भारतीय संस्कृति में मां को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है। भगवान श्रीराम ने माता कौशल्या का सम्मान किया, भगवान श्रीकृष्ण ने माता यशोदा के स्नेह को सर्वोपरि माना, और छत्रपति शिवाजी महाराज के चरित्र निर्माण में माता जीजाबाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि महान व्यक्तित्वों के पीछे उनकी माताओं के श्रेष्ठ संस्कार होते हैं। आज कई वृद्ध माताएँ अकेलेपन का जीवन जी रही हैं क्योंकि उनके बच्चे अपने जीवन में इतने व्यस्त हो गए हैं कि उनके पास माँ के लिए समय नहीं है। यह स्थिति हमारी संस्कृति और नैतिकता के लिए चिंता का विषय है। मेरा मानना है कि विद्यालयों और परिवारों को भी बच्चों में नैतिक शिक्षा और पारिवारिक मूल्यों का विकास करना चाहिए। बच्चों को बचपन से ही सिखाना चाहिए कि माता-पिता का सम्मान करना जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। यदि नई पीढ़ी में अच्छे संस्कार होंगे, तो समाज और राष्ट्र दोनों मजबूत बनेंगे। सच तो यही है कि नई पीढ़ी यदि अपनी माँ से मिले संस्कारों को अपनाएगी, तो समाज में नैतिकता, मानवता और सद्भावना का विकास होगा। यही सच्चे अर्थों में मातृ दिवस का उद्देश्य है।

Kiran Chopra