संसद सत्र में महिला आरक्षण

Summary :

आज से संसद का सावन (मानसून) सत्र शुरू हो रहा है और देशवासियों को अपेक्षा है कि इस छोटे से सत्र में उनकी व देश की बड़ी समस्याओं पर उनके चुने हुए जनप्रतिनिधि गंभीर चर्चा करके सर्वमान्य हल पर पहुंचेंगे। हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने बहुत गहन अध्ययन करके आजाद भारत के लिए संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली का चयन 20वीं सदी कि वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए इसलिए किया था जिससे गणतान्त्रिक भारत में आम आदमी की सीधी भागीदारी सत्ता में इस प्रकार हो सके कि उसकी आवाज हर हालत में सत्ता की कुर्सी संभाले लोगों तक पहुंच सके। इसीलिए संसदीय प्रणाली…

आज से संसद का सावन (मानसून) सत्र शुरू हो रहा है और देशवासियों को अपेक्षा है कि इस छोटे से सत्र में उनकी व देश की बड़ी समस्याओं पर उनके चुने हुए जनप्रतिनिधि गंभीर चर्चा करके सर्वमान्य हल पर पहुंचेंगे। हमारे स्वतन्त्रता सेनानियों ने बहुत गहन अध्ययन करके आजाद भारत के लिए संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली का चयन 20वीं सदी कि वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए इसलिए किया था जिससे गणतान्त्रिक भारत में आम आदमी की सीधी भागीदारी सत्ता में इस प्रकार हो सके कि उसकी आवाज हर हालत में सत्ता की कुर्सी संभाले लोगों तक पहुंच सके। इसीलिए संसदीय प्रणाली में सत्ता व प्रतिपक्ष के लोगों की शासन चलाने में बराबर की भागीदारी मानी जाती है क्योंकि दोनों ही पक्षों का चुनाव आम मतदाता अपने वोट के माध्यम से करता है और दोनों ही पक्ष जनता के प्रतिनिधि कहलाते हैं। बेशक प्रत्यक्ष चुने हुए सदन लोकसभा में बहुमत प्राप्त राजनीतिक दल या विभिन्न दलों के गठबन्धन के बहुमत का शासन होता है मगर विपक्षी आसन पर बैठे प्रतिनिधियों को भी सत्ता पक्ष के हर निर्णय में दखल देने का बराबर का अधिकार होता है जिसकी वजह से सरकार के हर विधेयक पर संसद में खुल कर बहस होती है जिससे उसमें विपक्ष की आवाज भी शामिल हो सके। मगर हम पिछले तीन दशकों से देख रहे हैं कि सरकारी विधेयक संसद में बहुमत के आधार पर भारी शोर-शराबे के बीच पारित हो रहे हैं।
मोदी सरकार से पहले मनमोहन सरकार के दौरान भी बहुत से विधेयक शोर-शराबे में पारित होते रहे जिससे संसद की प्रासंगिकता पर कई तरह के सवाल खड़े हुए। लोकतन्त्र में यह बहुत गंभीर मसला है जिस तरफ हर राजनीतिक दल को ध्यान देना होगा क्योंकि अब संसद का सत्र साल भर में केवल 50 दिनों तक सिमटता जा रहा है। कहां तो हम आजादी के बाद 150 दिनों का लक्ष्य लेकर चले थे और कहां यह बाद में 100 दिन के लक्ष्य से भी नीचे खिसक कर केवल 50 या 55 दिनों तक आ गया है। इससे जनता के मन में आशंकाएं अपने जनप्रतिनिधियों के प्रति नकारात्मक रूप में जन्म लेती हैं और पूरी प्रणाली की तरफ उबाऊ भाव पैदा करती हैं। अतः इस 21वीं सदी के प्रारम्भ में तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. के.आर. नारायणन का यह कथन याद रखा जाना चाहिए कि ‘लोकतन्त्र ने हमें नहीं बल्कि हमने लोकतन्त्र को फेल किया है’। यह बताता है कि किस प्रकार हमने उस संसदीय प्रणाली को हास्यास्पद बना दिया है जिसका भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र कहा जाता है परन्तु हमें निराश होने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि पिछले 78 वर्षों में कई एेसे अवसर आये हैं जब इसी संसद में बैठे हुए प्रतिनिधियों ने वक्त की नजाकत को देखते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश की है।
मेरा दृढ़ मत है कि आज भी संसद में मौजूद एेसे लोगों की कमी नहीं है। चाहे वह नेहरू-इन्दिरा काल के महाविद्वान स्व. हीरेन मुखर्जी से लेकर डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक जैसे नेता हों या एस.एम. द्विवेदी से लेकर डाॅ. राम मनोहर लोहिया जैसे नेता हों या स्व. प्रणव मुखर्जी से लेकर अरुण जैतली और शरद यादव तक जैसे जनप्रतिनिधि हों सभी ने सत्ता या विपक्ष में रहते हुए भारत के आम आदमी की जिज्ञासाओं और भावनाओं का समयोचित प्रतिनिधित्व किया और दुनिया में भारत की संसदीय प्रणाली का सम्मान बढ़ाया। इस सिलसिले में मुझे 2008 का भारत रत्न स्व. प्रणव मुखर्जी का विदेश मन्त्री की हैसियत से भारत-अमेरिकी परमाणु करार पर दिया गया वह वक्तव्य याद आ रहा है जब उन्होंने इस मुद्दे पर भाजपा व कम्युनिस्टों के विरोध को देखते हुए लोकसभा में कहा था कि ‘हमें खुद पर विश्वास होना चाहिए। जनता ने हमें यहां चुन कर भेजा है। हम जो भी कर रहे हैं वह देश की आने वाली पीढि़यों के उज्जवल भविष्य को देखते हुए कर रहे हैं। इसलिए खुद पर विश्वास रखते हुए देश हित में हम यह करार कर रहे हैं’। वर्तमान में लगभग एेसी ही परिस्थियां 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर देश में बनी हुई हैं। इस विधेयक से देश में लोकसभा चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन का रास्ता खुलेगा जिससे महिला आरक्षण के लिए स्थान बनेगा। वैसे संविधान के अनुसार हर दस वर्ष बाद जनगणना के बाद विधानसभा व लोकसभा चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन होना चाहिए परन्तु परिसीमन के मुद्दे को पिछली इन्दिरा सरकार के बाद बनी केन्द्र सरकारों के कार्यकालों से ही अगले 25 वर्षों के लिए टाला गया है परन्तु अब महिला आरक्षण पर देश के सभी राजनीतिक दलों में मतैक्य कायम हो जाने के बाद इस मुद्दे को आगे के लिए टालना उचित नहीं होगा।
जरा सोचिये कि 1996 से यह मसला लटका आ रहा है जो कि 2010 में जाकर आधा-अधूरा रह गया क्योंकि उस समय मनमोहन सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक को राज्यसभा में विपक्षी पार्टियों भाजपा व कम्युनिस्टों की मदद से इसे दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दिया था मगर यह विधेयक लोकसभा में नहीं आ सका। 2014 में केन्द्र में मोदी सरकार गठित होने के बावजूद यह विधेयक संसद में नहीं लाया गया मगर अपने दूसरे कार्यकाल में श्री नरेन्द्र मोदी 2023 में इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पारित कराने में कामयाब हो गये लेकिन इसकी शर्त यह थी कि पहले जनगणना होगी उसके बाद चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन होगा और तब जाकर महिला प्रत्याशियों के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण होगा। इस काम में कम से कम दस वर्षों का समय लगता अतः मोदी सरकार ने सोचा कि 2011 की जनगणना के आधार पर महिला सीटों का आरक्षण लोकसभा में कुल 50 प्रतिशत सीटें बढ़ा कर किया जाये जिसके लिए नये महिला आरक्षण विधेयक की जरूरत होगी और यह संविधान संशोधन विधेयक होगा। अतः केन्द्र की भाजपा सरकार संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जुटाने का जुगाड़ कर रही है। इस क्रम में कई विपक्षी दल टूट रहे हैं और कई दल विपक्षी गठबन्धन के साथ नये समीकरण इस प्रकार बैठा रहे हैं कि मतदान के समय वे विधेयक के पक्ष में खड़े नजर आयें।
मैं यहां संसद में राजनीतिक दलों की संख्या के गणित में नहीं उलझ रहा हूं बल्कि केवल सैद्धान्तिक पक्ष की बात कर रहा हूं। विपक्षी दल इस तोड़-फोड़ व जोड़-तोड़ को अनैतिक बता रहे हैं जबकि भाजपा राष्ट्रहित व महिला सशक्तीकरण के लिए अपनी प्रतिबद्धता जता रही है। अतः अब देशवासियों को ही यह सोचना है कि देश हित किस में है और भाजपा को अपने ऊपर विश्वास है कि नहीं !

Aditya Chopra

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