भारतीय दंड संहिता से न्याय संहिता तक व्यापक बदलाव

Summary :

न्याय संहिता के अंतर्गत बहुत से काननू में बदलाव के साथ उन्हें हटा भी दिया गया।बहुत से कानून ब्रिटिश हुकूमत के समय से चले आ रहे थे तो कुछ को बदलते समय के अनुसार बदला गया। जहा एक ओर कुछ कानून खत्म किए गए तो वही दूसरी ओर कुछ नियमों में सख़्ती बढ़ी दी गई है। जिसमे ठग जैसे पुराने कानून से लेकर आत्म हत्या के प्रयास जैसे संगीन आरोपों में बड़े बदलाव किए गए। आज की इस रिपोर्ट में हम आपको न्याय संहिता के अंतर्गत आने वाले नए बदलावों के विषय में बताएंगे। भारतीय न्याय संहिता विधेयक, 2023 भारतीय…

न्याय संहिता के अंतर्गत बहुत से काननू में बदलाव के साथ उन्हें हटा भी दिया गया।बहुत से कानून ब्रिटिश हुकूमत के समय से चले आ रहे थे तो कुछ को बदलते समय के अनुसार बदला गया। जहा एक ओर कुछ कानून खत्म किए गए तो वही दूसरी ओर कुछ नियमों में सख़्ती बढ़ी दी गई है। जिसमे ठग जैसे पुराने कानून से लेकर आत्म हत्या के प्रयास जैसे संगीन आरोपों में बड़े बदलाव किए गए। आज की इस रिपोर्ट में हम आपको न्याय संहिता के अंतर्गत आने वाले नए बदलावों के विषय में बताएंगे। भारतीय न्याय संहिता विधेयक, 2023 भारतीय दंड संहिता से कई महत्वपूर्ण बदलाव करता है।

शादी का झांसा

बीएनएस ने खंड 69 पेश किया जो शादी के वादा करके मुकरने वाले को अपराध से निपटने के लिए प्रतीत होता है। कोई भी धोके से या बिना किसी वजह से महिला से शादी करने का वचन देकर यौन संबंध बनाता है , ऐसे संबंध बलात्कार के अपराध वाले वर्ग में नहीं आते है। तो उसे दोनों में से किसी भी तरह के कारावास से दंडित किया जाएगा। इस जुर्म में सजा को साल दस तक बढ़ाया जा सकता है और हर्जाना भी लगाया जा सकता है। प्रावधान में कहा गया है कि ”धोखाधड़ी वाले तरीकों” में रोजगार या पदोन्नति का झूठा वादा, प्रलोभन या पहचान छिपाकर शादी करने का झूठा वादा शामिल होगा।

मॉब लिंचिंग

भारतीय न्याय संहिता के प्रावधान अनुसार मॉब लिंचिंग और घृणा – अपराध हत्याओं से जुड़े अपराधों को संहताबद्ध करते हैं। ऐसे मामलों में जब पांच या उससे ज्यादा व्यक्तियों की भीड़ जाति ,रंग , समुदाय वयक्तिगत विश्वास जैसे मुद्दों के आधार पर हत्या करती है। प्रावधान के अनुसार कारावास से लेकर मृत्यु तक की सज़ा है। पहले संस्करण में न्यूनतम सात साल की सज़ा का प्रस्ताव था, लेकिन इसे हत्या के बराबर लाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में केंद्र से लिंचिंग के लिए एक अलग कानून पर विचार करने को कहा था।

संगठित अपराध

पहली बार संगठित अपराध से निपटने को सामान्य आपराधिक कानून के दायरे में लाया गया है। संगठित अपराध सिंडिकेट्स या गिरोहों द्वारा आपराधिक गतिविधियों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए कई विशेष राज्य विधान हैं, जिनमें से सबसे लोकप्रिय महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1999 है। ये विशेष कानून निगरानी की व्यापक शक्तियां निर्धारित करते हैं और साक्ष्य और प्रक्रिया के मानकों में ढील देते हैं। राज्य का पक्ष, जो सामान्य आपराधिक कानून में नहीं पाया जाता है। नए कानून में संगठित अपराध करने के प्रयास और संगठित अपराध करने के लिए सजा एक ही है, लेकिन कथित अपराध के कारण मौत हुई है या नहीं, इसके आधार पर अंतर किया गया है। मृत्यु से जुड़े मामलों के लिए, सजा आजीवन कारावास से लेकर मृत्यु तक होती है, लेकिन जहां कोई मृत्यु शामिल नहीं है, वहां पांच साल की अनिवार्य न्यूनतम सजा निर्धारित की जाती है, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।

आतंकवाद

कड़े गैरकानूनी अत्याचार निवारण अधिनियम से “आतंकवादी गतिविधियों” को परिभाषित करने में भाषा के बड़े हिस्से को आयात करते हुए, बीएनएस आतंकवाद को सामान्य आपराधिक कानून के दायरे में लाता है। नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बैंगलोर के एक विश्लेषण के अनुसार , “आतंकवादी” की परिभाषा फिलीपींस के आतंकवाद विरोधी अधिनियम, 2020 से ली गई है। महत्वपूर्ण रूप से, यूएपीए की तुलना में बीएनएस में आतंकी वित्तपोषण से जुड़े अपराध व्यापक हैं।

आत्महत्या का प्रयास

बीएनएस ने एक नया प्रावधान पेश किया है जो “किसी भी लोक सेवक को उसके आधिकारिक कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए मजबूर करने या रोकने के इरादे से आत्महत्या करने का प्रयास करने वाले को” अपराधी मानता है, और जेल की सजा का प्रावधान करता है जिसे सामुदायिक सेवा के साथ एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है। विरोध प्रदर्शन के दौरान आत्मदाह और भूख हड़ताल को रोकने के लिए इस प्रावधान को लागू किया जा सकता है।

अप्राकृतिक यौन अपराध

भारतीय दंड संहिता की धारा 377, जो अन्य “अप्राकृतिक” यौन गतिविधियों के बीच समलैंगिकता को अपराध मानती थी, को बीएनएस के तहत निरस्त कर दिया गया है। हालाँकि, धारा 377 को पूरी तरह हटा दिए जाने से चिंताएँ बढ़ गई हैं, क्योंकि यह प्रावधान अभी भी गैर-सहमति वाले यौन कृत्यों से निपटने में मददगार है, खासकर जब बलात्कार कानूनों में लैंगिक भेदभाव जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इस प्रावधान को केवल इस हद तक असंवैधानिक करार दिया कि इसने सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध घोषित कर दिया।

राजद्रोह

जब संहिताओं को पहली बार अगस्त में लोकसभा में पेश किया गया था, तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि राजद्रोह पर कानून निरस्त कर दिया गया है। हालाँकि, बीएनएस अपराध को एक नए नाम के तहत और व्यापक परिभाषा के साथ पेश करता है। ‘राजद्रोह’ से ‘देशद्रोह’ नाम बदलने के अलावा, नया प्रावधान वित्तीय साधनों के माध्यम से “विध्वंसक गतिविधियों” और “अलगाववादी गतिविधियों की भावनाओं” को प्रोत्साहित करने वाले कृत्यों को व्यापक सहायता प्रदान करता है।

Desk Team