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दक्षिण कोरिया समेत दुनिया में गिर रहा फर्टिलिटी रेट, क्यों इसने वैज्ञानिकों की बढ़ाई चिंता?

why fertility rate is decreasing in the south korea india japan

दक्षिण कोरिया में प्रजनन दर अब तक के सबसे निचलने स्तर पर पहुंच गई है। प्रजनन दर यानी फर्टिलिटी रेट का मतलब है, उस जगह की जनसंख्या में एक महिला द्वारा उसके जीवनकाल में पैदा होने वाले बच्चों की औसत संख्या। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के आंकड़े बताते हैं कि 2022 में यहां प्रजनन दर 0.78 थी, जो 2023 में घटकर 0.72 पहुंच गई है। यह आकड़े किसी के लिए भी डरा देने वाले हैं।

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रिपोर्टस के मुताबिक, दक्षिण कोरिया की तमाम सरकारों ने इस समस्या से निपटने के लिए काफी रकम भी खर्च की है। लगभग 379 खरब कोरियाई वोन या फिर 226 अरब डॉलर। जिन जोड़ों के बच्चे होते हैं, उन पर दक्षिण कोरिया की सरकार नक़दी की बरसात कर देती है। बच्चों वाले जोड़ों को दी जाने वाली दूसरी रियायतों में अस्पताल के बिल और यहां तक कि आईवीएफ के इलाज में मदद भी शामिल है। हालांकि, ये रक़म सिर्फ़ शादी-शुदा जोड़ों को दी जाती है।

यही नहीं एक दक्षिण कोरियाई कंपनी ने इस समस्या से निपटने के लिए अपने कर्मचारियों के लिए एक पॉलिसी लेकर आई। कंपनी ने अपने कर्मचारियों को बच्चे पैदा करने के लिए 75,000 डॉलर (लगभग 62 लाख रुपये) तक की बड़ी रकम दे रही है, जिससे देश में प्रजनन दर बढ़ सके। ‘द कोरिया हेराल्ड’ के अनुसार, अंडरवियर कंपनी सैंगबैंगवूल का कहना है, वह कर्मचारियों को उनके पहले बच्चे के लिए 22,400 डॉलर (18 लाख), दूसरे बच्चे के लिए 22,400 डॉलर (18 लाख) और तीसरे बच्चे के लिए 30,000 डॉलर (25 लाख) देगी। कंपनी का यह फैसला कम होते फर्टिलिटी रेट के डराने देने वाले आकड़ों को देखते हुए लिया गया है।

हालांकि यह हाल केवल दक्षिण कोरिया का ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों का है। फर्टिलीटी रेट गिरने के सामने आते मामले समाज के लिए चिंता का विषय है।

जापान, चीन, भारत का हाल

जापान, चीन और भारत में भी कम प्रजनन दर खतरे की घंटी है। जापान में युवाओं से ज्यादा बुजुर्गों की संख्या है। लगातार 8 साल से यह दर अपने सबसे निचले स्तर पर है। यह आंकड़ा 2022 की तुलना में 5.1 फीसदी कम रहा।

चीन जो जनसंख्या के मामले में दूसरे नंबर पर है भी गिरते फर्टिलीटी रेट के घेरे में है। 2022 में चीन की आबादी 1.4118 अरब थी, यह 2021 की तुलना में 8,50,000 कम थी। यहां प्रति एक हजार लोगों के बीच बच्चों की जन्म दर मात्र 6.77 रह गई है।

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भारत भले ही दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश क्यों न बन गया हो लेकिन यहां भी खतरे की घंटी कई राज्यों में देखी गई हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे कहता है कि भारत में कुल प्रजनन दर 2.2 से गिरकर 2.0 तक पहुंच गई है। केवल बिहार, यूपी, मेघालय, मणिपुर, और झारखंड ऐसे राज्य हैं, जहां प्रजनन दर 2.1 से ज्‍यादा है।

फर्टिलिटी रेट गिरने की क्या है वजह?

कम प्रजनन दर के पीछे कोई एक कारण नहीं बल्कि कई कारण है। विशेषज्ञ कहते हैं, महिलाएं अब पहले से ज्यादा शिक्षित हुई हैं। वो अब सिर्फ एक हाउस वाइफ नहीं रहीं। वो इंडिपेंडेंट होकर फैसले ले रही हैं कि उन्हें कब मां बनना है। जॉब सेक्टर में महिलाओं के लिए मौके बढ़ रहे हैं। इसका असर भी दिख रहा है। इसके अलावा बढ़ती महंगाई ने भी फैमिली को कंट्रोल करने का दबाव बढ़ाया है।

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लाइफस्टाइल फैक्टर जैसे- खानपान, वजन और एक्सरसाइज भी इस पर असर डाल रहे हैं। वहीं, स्मोकिंग, अधिक उम्र में मां बनने का चलन, ड्रग का इस्तेमाल, बढ़ती बीमारियों के कारण ली जाने वाली दवाएं, कैफीन भी प्रजनन क्षमता पर असर डाल रही हैं।

इसके अलावा आज के युवाओं का फोकस करियर पर है। कॅरियर बनाने की चाहत का असर मैरिड लाइफ पर पड़ रहा है। अधिक उम्र में फैमिली प्लानिंग के लिए कदम उठाए जाए रहे हैं। इस तरह कई फैक्टर फर्टिलिटी रेट पर असर डाल रहे हैं।

गिरती प्रजनन दर क्यों है खतरा?

दुनिया के कई देशों में गिरता फर्टिलीटी रेट चिंता का विषय है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कम पैदा होते बच्चों से समाज पर बड़ा प्रभाव पड़ना तय है। गिरती प्रजनन दर का मतलब है कि सदी के अंत तक लगभग हर देश की आबादी कम हो सकती है। वहीं, देश युवा होन के बजाये बुढ़ा होता जाएगा, क्योंकि एक समय पर बच्चों की प्रजनन दर में गिरावट आएगी तो देश में ज्यादा आबादी बुजुर्गों की होगी।

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वहीं, प्रजनन दर का गिरना खासकर दुनिया के उन देशों के लिए खतरा है, जो अर्थव्यवस्था के मामले में सबसे आगे रहे हैं। तेजी से बूढ़ी होती आबादी और गिरती प्रजनन दर का यह ट्रेंड आने वाले एक से दो दशक में असर दिखा सकता है। अगर यही ट्रेंड चलता रहा तो देश में कामगार लोगों की संख्या घटेगी और सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा।

युवाओं की संख्याा में कमी आएगी और देश विकास की रफ्तार में पीछे छूटेगा।आखिर में कहा जाए तो अर्थव्यवस्था को अपने लेवल पर बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।

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