“जब पत्नी के तप से राक्षस पति का हुआ उद्धार…” कामदा एकादशी पर इस अद्भुत कथा के बिना अधूरी है आपकी पूजा

Summary :

Kamada Ekadashi Vrat Katha: आज कामदा एकादशी का पावन पर्व है। इस दिन श्रद्धालु नियम-निष्ठा के साथ उपवास रखते हैं और जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति कामदा एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा से करता है, उसके जीवन के बड़े से बड़े पापों का नाश हो जाता है। जैसा कि इसके नाम ‘कामदा’ से स्पष्ट है, यह एकादशी मन की सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली मानी गई है। पूजा का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। यहां पर कामदा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा दी गई है। Kamada…

Kamada Ekadashi Vrat Katha: आज कामदा एकादशी का पावन पर्व है। इस दिन श्रद्धालु नियम-निष्ठा के साथ उपवास रखते हैं और जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति कामदा एकादशी का व्रत पूरी निष्ठा से करता है, उसके जीवन के बड़े से बड़े पापों का नाश हो जाता है। जैसा कि इसके नाम ‘कामदा’ से स्पष्ट है, यह एकादशी मन की सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली मानी गई है। पूजा का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए। यहां पर कामदा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा दी गई है।

Kamada Ekadashi Vrat Katha: कामदा एकादशी की व्रत कथा

Kamada Ekadashi Vrat Katha
Kamada Ekadashi Vrat Katha (Source: Social Media)
कथा के अनुसार, प्राचीन काल की बात है, भोगीपुर नामक नगर में राजा पुण्डरीक का शासन हुआ करता था। उसी राज्य में ललित और ललिता नाम का एक गंधर्व जोड़ा रहता था, जिनमें अटूट प्रेम था। ललित राजा के दरबार में गायक था। एक बार जब वह राजदरबार में संगीत की प्रस्तुति दे रहा था, तब गाते-गाते उसका मन अपनी पत्नी की यादों में खो गया। इस एकाग्रता की कमी के कारण उसके गायन का सुर बिगड़ गया।

ललित की इस चूक को राजा पुण्डरीक ने अपना अनादर समझा और क्रोध के वश में आकर उसे भयानक राक्षस बन जाने का श्राप दे दिया। श्राप मिलते ही ललित का स्वरूप विकराल और डरावना हो गया और वह मांसाहारी बन गया। अपने पति की ऐसी दुर्दशा देखकर ललिता अत्यंत दुखी हुई, किंतु उसने साथ नहीं छोड़ा। वह निरंतर अपने पति को इस कष्ट से मुक्ति दिलाने का मार्ग खोजने लगी।एक दिन भटकते हुए ललित जंगल की ओर निकल गया और ललिता भी उसके पीछे-पीछे चल दी। वहां उन्हें श्रृंगी ऋषि का आश्रम दिखाई दिया।

ललिता ने ऋषि के चरणों में प्रणाम कर अपनी व्यथा सुनाई और पति को श्रापमुक्त करने की प्रार्थना की। ऋषि ने दया भाव दिखाते हुए उसे कामदा एकादशी के व्रत की महिमा बताई और उसे पूर्ण विधि से यह उपवास करने का परामर्श दिया।

ऋषि के निर्देशानुसार ललिता ने पूरी श्रद्धा के साथ कामदा एकादशी का व्रत किया और द्वादशी के दिन नियमपूर्वक इसका समापन किया। उसने अपने व्रत से प्राप्त पुण्य फल को अपने पति को समर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रताप से ललित का राक्षसी रूप समाप्त हो गया और वह पुनः अपने दिव्य गंधर्व स्वरूप में लौट आया।

Khushi Srivastava

खुशी श्रीवास्तव मीडिया इंडस्ट्री में करीब 3 साल का अनुभव रखती हैं। वायरल कंटेंट, लाइफस्टाइल, हेल्थ और वास्तु शास्त्र टिप्स पर प्रमुखता से काम किया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज से मास्टर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई के बाद पहली बार पत्रकारिता के श्रेत्र में कदम रखा। इसके बाद अमर उजाला प्रिंट (प्रयागराज) में इंटर्नशिप की। फिलहाल खुशी, पंजाब केसरी दिल्ली के डिजिटल प्लैटफॉर्म के लिए कंटेंट राइटिंग का काम करती हैं।