Kamada Ekadashi Vrat Katha: कामदा एकादशी की व्रत कथा

ललित की इस चूक को राजा पुण्डरीक ने अपना अनादर समझा और क्रोध के वश में आकर उसे भयानक राक्षस बन जाने का श्राप दे दिया। श्राप मिलते ही ललित का स्वरूप विकराल और डरावना हो गया और वह मांसाहारी बन गया। अपने पति की ऐसी दुर्दशा देखकर ललिता अत्यंत दुखी हुई, किंतु उसने साथ नहीं छोड़ा। वह निरंतर अपने पति को इस कष्ट से मुक्ति दिलाने का मार्ग खोजने लगी।एक दिन भटकते हुए ललित जंगल की ओर निकल गया और ललिता भी उसके पीछे-पीछे चल दी। वहां उन्हें श्रृंगी ऋषि का आश्रम दिखाई दिया।
ललिता ने ऋषि के चरणों में प्रणाम कर अपनी व्यथा सुनाई और पति को श्रापमुक्त करने की प्रार्थना की। ऋषि ने दया भाव दिखाते हुए उसे कामदा एकादशी के व्रत की महिमा बताई और उसे पूर्ण विधि से यह उपवास करने का परामर्श दिया।
ऋषि के निर्देशानुसार ललिता ने पूरी श्रद्धा के साथ कामदा एकादशी का व्रत किया और द्वादशी के दिन नियमपूर्वक इसका समापन किया। उसने अपने व्रत से प्राप्त पुण्य फल को अपने पति को समर्पित कर दिया। इस पुण्य के प्रताप से ललित का राक्षसी रूप समाप्त हो गया और वह पुनः अपने दिव्य गंधर्व स्वरूप में लौट आया।


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