वाराणसी, 25 जनवरी (आईएएनएस)। कालाजार के उपचार में ऐतिहासिक योगदान देने वाले बीएचयू के प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल को पद्मश्री सम्मान देने की घोषणा की गई है। पुरस्कार की घोषणा के बाद प्रोफेसर अग्रवाल ने आईएएनएस से बात करते हुए भारत सरकार का आभार जताया।
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर घोषित पद्म सम्मानों में बीएचयू के दो प्रोफेसरों को स्थान मिला है, जिसमें श्याम सुंदर अग्रवाल का नाम भी शामिल है। प्रो. अग्रवाल ने भारतीय कालाजार उपचार में लिपिड आधारित लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी की एकल खुराक विकसित की, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने मान्यता दी और जिसे भारत के कालाजार नियंत्रण कार्यक्रम में अपनाया गया।
उन्होंने कालाजार के लिए मल्टी ड्रग थेरेपी का सफल परीक्षण किया, जिसे डब्ल्यूएचओ ने भी अनुमोदित किया है। पेरेमोमाइसिन और मिल्टेफोसीन के संयोजन का उपयोग आज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर किया जा रहा है। इसके साथ ही मिल्टेफोसीन जैसी प्रभावी दवा के विकास और आरके-39 स्ट्रिप जांच के प्रथम परीक्षण का श्रेय भी उन्हें जाता है।
श्याम सुंदर अग्रवाल ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, “मैं खुद को यूनिक नहीं मानता, बल्कि एक साधारण इंसान हूं। मैं बिहार, मुजफ्फरपुर से आता हूं। वहां पर कालाजार का प्रकोप बहुत ज्यादा था। लाखों की संख्या में इसके मरीज होते थे, जिनमें हजारों की मौत होती थी। इन मरीजों के पास पैसा नहीं होता था, और रोग का पता लगने में ही 3-4 सप्ताह लग जाते थे, जो काफी खर्चीला था। 80 के दशक में इस बीमारी का पता लगाने में ही 400 से 500 रुपए लगते थे।
मुझे लगा कि मैं इस क्षेत्र में कुछ कर सकता हूं। इसलिए हमने एक टेस्ट ईजाद किया, जिसका मैंने टेस्ट किया। इसके बाद दुनिया में पहली बार हमने दिखाया कि कालाजार और इससे संबंधित बीमारी की डायग्नोसिस में हफ्तों और महीनों का समय लगता था, जो 10 मिनट में होने लगी। यह इस सफलता का पहला कदम था।
कालाजर की बीमारी में उपयोग होने वाली दवाओं की हालत बहुत खराब थी। 100 मरीजों का इलाज होता था, तो उसमें से 35-36 मरीज ही ठीक होते थे, जिनमें से 12-15 मरीज मर जाते थे। उस समय बीमारी में इस्तेमाल होने वाली दवा काम करना बंद कर दी थी। उस समय हमने बताया कि सिर्फ एक-तिहाई मरीज ही दवा से ठीक हो रहे हैं। इसके बाद 1990 के आस-पास सरकार ने कालाजार कंट्रोल प्रोग्राम निकाला था, जो सफल नहीं हो पाया। फिर दवा बदली गई। मैं भी उसपर हुई मीटिंग का हिस्सा था।
इसके बाद कालाजार की दवाओं पर कई सारे शोध हुए। 2002 में एक बड़ा शोध हुआ, जिसे मैं लीड कर रहा था। करीब-करीब 300 मरीजों पर शोध हुआ था, जिसमें 94 प्रतिशत एक्यूरेट थी, लेकिन दवा मुंह से खाने वाली थी। दवा को एक महीने लेना पड़ता था और उसकी भी अपनी कुछ परेशानी थी। इस क्षेत्र में मेरा करीब 38 साल का अनुभव रहा।
–आईएएनएस
एससीएच/डीकेपी
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