राज्यसभा में सोमवार को कांग्रेस सदस्य दिग्विजय सिंह ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि वह जल संबंधी विभिन्न कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में काफी पीछे है और राशि रहने के बावजूद खर्च नहीं कर पा रही है। हालांकि सत्ता पक्ष ने इसका प्रतिवाद किया और कहा कि सरकार के प्रयासों का असर गांव-गांव में दिखने लगा है। जल शक्ति मंत्रालय के कामकाज पर सदन में हुई चर्चा में भाग लेते हुए सिंह ने कहा कि इस मंत्रालय की स्थायी समिति की रिपोर्टें ही स्थिति स्पष्ट कर रही हैं।
उन्होंने विभिन्न रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि पूंजी होने के बाद भी सरकार राशि खर्च नहीं कर पा रही है। सिंह ने कहा कि विभिन्न कार्यक्रमों में सरकार की देनदारी बढ़ती जा रही है और राशि होने के बाद भी कर्ज बढ़ रहा है। उन्होंने दावा किया कि जल संबंधी 99 कार्यक्रमों में से 44 ही पूरे हो सके हैं और निगरानी की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। उन्होंने सरकार से जल नीति बनाने की मांग करते हुए कहा कि 1987 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने जल नीति तैयार की थी और फिर 2012 में संप्रग सरकार के कार्यकाल में इसमें संशोधन किया गया था।
सिंह ने 2024 तक हर घर तक नल से पानी पहुंचाने के कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि इसकी गति काफी धीमी है। उन्होंने कहा कि सरकार को गरीबों और अन्य जरूरतमंद लोगों को योजना में प्राथमिकता देनी चाहिए। इस क्रम में उन्होंने टैंकर माफिया का भी जिक्र किया जो योजना में बाधा डालते हैं। सिंह ने बारिश के पानी के संचयन और भूमिगत जल के पुनर्भरण की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि नए भवनों के निर्माण के लिए अनुमति देते समय बारिश के पानी के संचयन को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
भाजपा के गोपाल नारायण सिंह ने कांग्रेस सदस्य सिंह का प्रतिवाद करते हुए कहा कि यह कहना सही नहीं है कि सरकार आवंटित राशि खर्च नहीं कर पा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार का प्रयास सब लोगों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का है और किए गए प्रयासों का असर गांव गांव तक दिखने लगा है। उन्होंने कहा कि कई गांवों में यह काम पूरा हो चुका है और शेष गांवों में भी जल्दी ही इसके पूरा होने की उम्मीद है।
उन्होंने कहा कि जल शक्ति मंत्रालय विभिन्न कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए प्रयासरत है और कोरोना संकट के बाद भी परियोजनाओं के लिए आवंटित राशि में कोई कमी नहीं आयी है। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली सरकार यमुना नदी की सफाई के लिए प्रयासरत नहीं है लेकिन दोष केंद्र सरकार पर ही मढ़ा जाता है।


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