गुरबाणी में साधना और सेवा का संतुलन ही शिष्यत्व का सार: स्वामी निरंजनानंद सरस्वती

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मुंगेर, 8 अगस्त (आईएएनएस)। बिहार के मुंगेर स्थित संन्यास पीठ के पादुका दर्शन परिसर में आयोजित दो दिवसीय चातुर्मास कार्यक्रम शनिवार को आध्यात्मिक वातावरण और गुरबाणी की स्वर-लहरियों के बीच संपन्न हुआ। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से आए सिख रागी जत्थे ने दो दिनों तक शबद-कीर्तन की प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं को गुरु-वाणी, सिमरन और सेवा की आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ा। कार्यक्रम के दौरान पूरा परिसर ‘वाहेगुरु’ के जाप और गुरबाणी के मधुर स्वरों से गुंजायमान रहा। इस अवसर पर परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि गुरबाणी भारतीय संस्कृति की जीवंत परंपरा और आध्यात्मिक धरोहर है। भारतीय संस्कृति में किसी सिद्धांत…

मुंगेर, 8 अगस्त (आईएएनएस)। बिहार के मुंगेर स्थित संन्यास पीठ के पादुका दर्शन परिसर में आयोजित दो दिवसीय चातुर्मास कार्यक्रम शनिवार को आध्यात्मिक वातावरण और गुरबाणी की स्वर-लहरियों के बीच संपन्न हुआ। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से आए सिख रागी जत्थे ने दो दिनों तक शबद-कीर्तन की प्रस्तुति देकर श्रद्धालुओं को गुरु-वाणी, सिमरन और सेवा की आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ा।

कार्यक्रम के दौरान पूरा परिसर ‘वाहेगुरु’ के जाप और गुरबाणी के मधुर स्वरों से गुंजायमान रहा। इस अवसर पर परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि गुरबाणी भारतीय संस्कृति की जीवंत परंपरा और आध्यात्मिक धरोहर है। भारतीय संस्कृति में किसी सिद्धांत का महत्व तभी है, जब वह साधना और सेवा के रूप में व्यक्ति के जीवन में उतरता है।

उन्होंने कहा कि गुरु सदियों से मनुष्य को धर्म और आत्मबोध की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते आए हैं। गुरु के मार्ग पर चलने से जीवन में शांति और संतुलन आता है, जबकि गुरु-वाणी से विमुख होने पर व्यक्ति और समाज दोनों में असंतुलन पैदा होता है। परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि शिष्यत्व का अर्थ केवल गुरु से दीक्षा लेना नहीं है, बल्कि गुरु के संदेश को अपने जीवन में उतारना ही वास्तविक शिष्यत्व है। सेवा और साधना के बीच संतुलन स्थापित करना शिष्य-तत्व का मूल है।

उन्होंने कहा कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा अनेक धाराओं और समुदायों से मिलकर बनी है। पंजाब ने गुरु-परंपरा के संदेश को अपने सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में गहराई से धारण किया है। गुरु नानक देव से गुरु गोविंद सिंह तक की परंपरा ने भारतीय चिंतन को सेवा, समता, साहस और मानवीय करुणा का व्यापक संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि गुरु ग्रंथ साहिब में निहित गुरु-वाणी मनुष्य को बाहरी आडंबर से अधिक अपने भीतर की यात्रा के लिए प्रेरित करती है। सिमरन और सेवा इस आध्यात्मिक परंपरा के प्रमुख आधार हैं। इन दोनों को जीवन में अपनाने वाला व्यक्ति आत्मिक शांति और सच्चे धर्म के करीब पहुंचता है।

कार्यक्रम में राजनांदगांव से आए रागी जत्थे के सरदार भूपेंद्र सिंह, सरदार जसपाल सिंह और सरदार सतबीर सिंह ने शबद-कीर्तन प्रस्तुत किया। श्रद्धालु गुरबाणी के शब्दों को राग और स्वर के साथ सुनकर आध्यात्मिक भाव में डूबे रहे। स्वामी शिवध्यानम ने कहा कि शबद-कीर्तन सिख आध्यात्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्र वाणी का संगीत के साथ गायन भक्ति की अभिव्यक्ति के साथ-साथ चेतना, करुणा और आत्मबोध जगाने का माध्यम भी है।

दो दिनों तक चले आयोजन में मुंगेर के श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का समापन साधना और सेवा के संदेश के साथ हुआ। आयोजन ने यह संदेश दिया कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की शक्ति उसकी विविधता में है और विभिन्न परंपराओं के बीच संवाद मानवीय एकता को मजबूत करता है।

–आईएएनएस

एमएनपी/एएसएच

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