फेरीवालों के मुद्दे पर शिवसेना (यूबीटी) ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन, कहा-सत्ता का मुखौटा उतर गया है

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मुंबई, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से अवैध हॉकर्स (अनधिकृत फेरीवालों) का मुद्दा उठा है। शिवसेना (यूबीटी) ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के जरिए राज्य सरकार पर जमकर निशाना साधा है। पार्टी का कहना है कि बॉम्बे हाईकोर्ट की कड़ी फटकार ने सरकार की नाकामी को पूरी तरह उजागर कर दिया है। शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने अनधिकृत फेरीवालों के मुद्दे पर बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी को लेकर कहा है कि अदालत ने सत्ता में बैठे लोगों की राजनीतिक इच्छाशक्ति के मुखौटे को उतार दिया है। पार्टी ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में कहा कि सवाल ये…

मुंबई, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर से अवैध हॉकर्स (अनधिकृत फेरीवालों) का मुद्दा उठा है। शिवसेना (यूबीटी) ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के जरिए राज्य सरकार पर जमकर निशाना साधा है। पार्टी का कहना है कि बॉम्बे हाईकोर्ट की कड़ी फटकार ने सरकार की नाकामी को पूरी तरह उजागर कर दिया है।

शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने अनधिकृत फेरीवालों के मुद्दे पर बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी को लेकर कहा है कि अदालत ने सत्ता में बैठे लोगों की राजनीतिक इच्छाशक्ति के मुखौटे को उतार दिया है।

पार्टी ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में कहा कि सवाल ये है कि जिनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति केवल सत्ता और उससे मिलने वाले धन से तय होती है और जिनकी ताकत सिर्फ राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ जागती है, क्या वे इस न्यायिक खुलासे से शर्म महसूस करेंगे?”

संपादकीय में कहा गया कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को अनधिकृत फेरीवालों की बढ़ती समस्या पर कड़ी फटकार लगाई है और इसे सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी बताया है। अदालत ने कहा कि अधिकारियों को अपने ही कानूनों और अधिकारों की जानकारी न होने पर शर्म आनी चाहिए।यह टिप्पणी मुंबई में अनधिकृत फेरीवालों द्वारा किए जा रहे अतिक्रमण से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई थी। अदालत ने कहा कि यह समस्या अब राज्य के सभी बड़े और छोटे शहरों में नागरिकों के लिए गंभीर परेशानी बन चुकी है।

संपादकीय में कहा गया कि फेरीवालों, उनके अतिक्रमण और इससे नागरिकों को हो रही परेशानी के साथ-साथ प्रशासन और नेताओं की उदासीनता केवल मुंबई ही नहीं, बल्कि पूरे राज्य में गंभीर समस्या बन चुकी है।

लेख के अनुसार, जिन लोगों की जिम्मेदारी फेरीवालों को हटाने और पैदल चलने वालों को राहत देने की है, वे चुप हैं। जबकि वास्तव में कानून मौजूद हैं और सरकार के पास कार्रवाई की शक्ति भी है, लेकिन इन शक्तियों का उपयोग नहीं किया जाता।

अदालत ने एक लगातार चल रहे चक्र की ओर इशारा किया है, जिसमें राज्य सरकार, नगर निगम और पुलिस एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते हैं। इस भ्रष्ट त्रिकोण को फुटपाथों को खाली कराने में विफलता का मुख्य कारण बताया गया।

लेख में प्रशासन पर आरोप लगाया गया कि कभी-कभार दिखावटी कार्रवाई होती है, लेकिन जल्द ही स्थिति पहले जैसी हो जाती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अगर वास्तव में कानूनी शक्तियों का उपयोग किया गया तो सत्ता से जुड़े हितों को नुकसान पहुंचेगा और उनका गठजोड़ टूट जाएगा। इसी कारण, अदालत की बार-बार फटकार के बावजूद सरकार फेरीवालों के मुद्दे पर जानबूझकर चुप्पी साधे हुए है।

संपादकीय में यह भी कहा गया कि सरकार ने कोर्ट को बताया कि अधिकृत हॉकर्स के लिए ‘वेंडिंग कमेटी’ बनाने में सात महीने लगेंगे, और उसके लागू होने में एक महीना और लगेगा। इस पर भी शिवसेना (यूबीटी) ने तीखी टिप्पणी की है।

पार्टी ने सवाल उठाया कि क्या सत्ता, पैसा और राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने में व्यस्त यह सरकार इस सार्वजनिक फटकार के बाद भी कोई आत्ममंथन करेगी? ‘सामना’ के मुताबिक, कोर्ट की टिप्पणी यह दिखाती है कि सरकार की लापरवाही सिर्फ हॉकर्स के मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य में शासन की व्यापक विफलता को भी दर्शाती है।

–आईएएनएस

वीकेयू/वीसी

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