शिवगंगा, 9 अगस्त (आईएएनएस)। कांग्रेस सांसद कार्ति पी. चिदंबरम ने रविवार को प्रस्तावित परिसीमन के तहत लोकसभा की संख्या बढ़ाने के खिलाफ आगाह किया। उन्होंने तर्क दिया कि सीटों का आनुपातिक विस्तार तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे अधिक आबादी वाले राज्यों के बीच संसदीय प्रतिनिधित्व में संख्यात्मक अंतर को और बढ़ा सकता है।
शिवगंगा में बोलते हुए चिदंबरम ने कहा कि मौजूदा 543 सदस्यीय लोकसभा में सांसदों को बहसों में भाग लेने के सीमित अवसर मिलते हैं, और इसकी संख्या में वृद्धि से संसदीय कार्यप्रणाली में सुधार होना जरूरी नहीं है।
अपनी चिंताओं को स्पष्ट करते हुए शिवगंगा सांसद ने बताया कि तमिलनाडु और पुडुचेरी में मिलाकर वर्तमान में 40 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में 80 हैं। उन्होंने कहा कि यदि निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या में समान रूप से 50 प्रतिशत की वृद्धि की जाती है, तो तमिलनाडु और पुडुचेरी में लगभग 60 सीटें होंगी जबकि उत्तर प्रदेश में बढ़कर 120 हो जाएंगी।
चिदंबरम ने कहा कि यद्यपि दोनों के बीच सीटों का अनुपात अपरिवर्तित रहेगा, लेकिन संख्यात्मक अंतर वर्तमान 40 सीटों से बढ़कर 60 हो जाएगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संसदीय लोकतंत्र में पूर्ण संख्याएं भी महत्वपूर्ण होती हैं।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा शनिवार को चेन्नई में सांसदों की बैठक बुलाए जाने के एक दिन बाद उनकी यह टिप्पणी आई है। इस बैठक में प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया के प्रभावों पर चर्चा की गई और राज्य के संसदीय प्रतिनिधित्व की रक्षा के लिए एक आम सहमति बनाने का प्रयास किया गया।
बैठक में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई कि यदि लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो तमिलनाडु संसद में अपना सापेक्षिक प्रभाव खो सकता है। बैठक में उपस्थित लोगों ने तर्क दिया कि तमिलनाडु जैसे राज्यों को उनके सापेक्षिक प्रतिनिधित्व में कमी करके दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
परिसीमन का मुद्दा तमिलनाडु में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चिंता का विषय बन गया है, और विभिन्न दलों ने चेतावनी दी है कि जनसंख्या आधारित पुनर्वितरण से अधिक आबादी वाले उत्तरी राज्यों की संसदीय शक्ति में काफी वृद्धि हो सकती है।
दक्षिणी राज्यों ने बार-बार तर्क दिया है कि संसदीय सीटों के भावी आवंटन का निर्णय करते समय जनसांख्यिकीय प्रदर्शन और जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में मिली सफलता को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
चिदंबरम के हस्तक्षेप ने इस बहस में एक नया आयाम जोड़ दिया है, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या लोकसभा का कुल आकार बढ़ाने मात्र से तमिलनाडु के हितों की पर्याप्त रूप से रक्षा हो पाएगी।
उन्होंने तर्क दिया कि मौजूदा आनुपातिक अनुपात को बनाए रखने मात्र से समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं होगा, क्योंकि अधिक आबादी वाले राज्यों को अधिक संख्यात्मक लाभ मिलने से संसद में पूर्ण संख्या के आधार पर निर्णय लेते समय गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
–आईएएनएस
एमएस/
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