केरल चुनाव में मुकाबला इस बार दिलचस्प, 883 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला करेंगे 27 लाख मतदाता

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तिरुवनंतपुरम, 8 अप्रैल (आईएएनएस)। केरल की 140 विधानसभा सीटों पर मतदान शुरू होने में कुछ समय ही बचा है। इस प्रक्रिया का विशाल पैमाना इसकी जटिलता और महत्व दोनों को रेखांकित करता है। केरल में 883 उम्मीदवार मैदान में हैं, यानी प्रति सीट औसतन छह से सात प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। हालांकि, बागी और निर्दलीय उम्मीदवारों के शामिल होने से कई निर्वाचन क्षेत्र चुनावी मैदान में बदल गए हैं। मतदाताओं की संख्या 27 लाख है, जो 30,000 से अधिक मतदान केंद्रों में फैले हुए हैं। इससे भारत के सबसे राजनीतिक रूप से सक्रिय राज्यों में से एक में…

तिरुवनंतपुरम, 8 अप्रैल (आईएएनएस)। केरल की 140 विधानसभा सीटों पर मतदान शुरू होने में कुछ समय ही बचा है। इस प्रक्रिया का विशाल पैमाना इसकी जटिलता और महत्व दोनों को रेखांकित करता है। केरल में 883 उम्मीदवार मैदान में हैं, यानी प्रति सीट औसतन छह से सात प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। हालांकि, बागी और निर्दलीय उम्मीदवारों के शामिल होने से कई निर्वाचन क्षेत्र चुनावी मैदान में बदल गए हैं।

मतदाताओं की संख्या 27 लाख है, जो 30,000 से अधिक मतदान केंद्रों में फैले हुए हैं। इससे भारत के सबसे राजनीतिक रूप से सक्रिय राज्यों में से एक में भारी मतदान की संभावना है।

मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) ने 2021 में सत्ता बरकरार रखकर राजनीतिक परंपरा को बदल दिया था और राज्य में लंबे समय से चली आ रही बारी-बारी से सरकारों की परंपरा को तोड़ दिया था। यह बदलाव मौजूदा चुनाव को भी प्रभावित कर रहा है।

हालांकि, एक दशक तक सत्ता में रहने से स्वाभाविक रूप से दबाव भी आते हैं। जमीनी हकीकत में सत्ताधारी दल के खिलाफ कोई जनमानस नहीं दिख रहा, बल्कि असंतोष के छोटे-छोटे केंद्र नजर आ रहे हैं। यह एक तरह का सूक्ष्म सत्ता-विरोधी आंदोलन है, जो नेतृत्व की बजाय स्थानीय प्रतिनिधियों पर अधिक केंद्रित है।

एलडीएफ निरंतरता, कल्याणकारी योजनाओं के वितरण और एक अनुशासित संगठनात्मक नेटवर्क पर भरोसा जता रहा है और तर्क दे रहा है कि उनके खिलाफ कोई व्यापक आक्रोश नहीं है।

वहीं दूसरी ओर, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) इसी परिदृश्य को अलग तरह से देख रहा है और स्थानीय असंतोष से प्रेरित होकर धीरे-धीरे होने वाले सत्ता परिवर्तन और अपने पारंपरिक समर्थन आधार को मजबूत करने पर दांव लगा रहा है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह चुनाव सरकार बनाने से ज़्यादा अपनी प्रासंगिकता बढ़ाने का मुद्दा है।

कड़े मुकाबले वाले माहौल में वोटों में मामूली बदलाव भी कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में जीत के द्वार खोल सकता है। केरल में हमेशा की तरह, असली अनिश्चितता मतदाता भागीदारी पर निर्भर करती है। जहां मतदान प्रतिशत ऐतिहासिक रूप से 70 से 80 प्रतिशत के बीच रहता है, वहीं मामूली सा बदलाव भी कई सीटों पर नतीजों को निर्णायक रूप से बदल सकता है।

यह चुनाव किसी एक लहर से तय नहीं होगा, बल्कि सूक्ष्म अंतर और बिखरे हुए संकेतों से तय होगा। जैसे-जैसे मतदाता मतदान केंद्रों में कदम रखेंगे, केरल का फैसला संभवतः किसी एक व्यापक कहानी से नहीं, बल्कि राज्य भर में चल रही सैकड़ों छोटी-छोटी लड़ाइयों से निकलेगा।

तीनों मोर्चों को पता है कि उनका भविष्य इस बात पर अधिक निर्भर करेगा कि मुस्लिम और ईसाई सहित अल्पसंख्यक समुदाय, जो मिलकर लगभग 42 प्रतिशत हैं, किस ओर रुख करते हैं। यह 2024 के लोकसभा चुनावों और दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में स्पष्ट रूप से देखा गया था।

सुरक्षा व्यवस्था कड़ी बनी हुई है क्योंकि 30,000 से अधिक बूथों में से लगभग 2,500 बूथों को संवेदनशील घोषित किया गया है और केंद्रीय बलों और तमिलनाडु पुलिस की इकाइयों को पूरे राज्य में तैनात किया गया है।

–आईएएनएस

ओपी/एएस

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