तिरुवनंतपुरम, 15 सितंबर (आईएएनएस)। केरल में बिजली का संकट वीडी सतीशन सरकार के लिए पहली बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक चुनौती बन गया है। लगातार हो रही बिजली कटौती को लेकर वामपंथी विपक्ष ने सरकार पर हमला तेज कर दिया है और मौजूदा स्थिति की तुलना पिछले एक दशक से कर रहा है, जब केरल में निर्धारित बिजली कटौती से आमतौर पर लोगों को जूझना नहीं पड़ता था।
बिजली मंत्री सनी जोसेफ ने मंगलवार को माना कि एनटीपीसी से करीब 30 रुपए प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदने पर अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इससे हालात को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई है।
मंत्री ने कहा कि इतनी महंगी बिजली खरीदने से राज्य पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा और इसके लिए कैबिनेट की मंजूरी लेनी होगी। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि मौजूदा बिजली कटौती कब तक चलेगी। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि सरकार संकट को जल्द से जल्द सुलझाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है।
सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा इस कमी को नई सरकार की नाकामी के तौर पर पेश कर रहा है। उनका कहना है कि पिनाराई विजयन सरकार के 10 साल के कार्यकाल में रोजाना होने वाली बिजली कटौती लगभग गायब हो गई थी।
मौजूदा सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती यह है कि अब बिजली की उपलब्धता के आंकड़ों से ज्यादा आम लोग सीधे तौर पर इस कमी का असर झेल रहे हैं। बिजली क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि इस संकट को सिर्फ कम समय में बिजली खरीदने में नाकामी के तौर पर नहीं देखना चाहिए।
इंजीनियरिंग फिजिसिस्ट और बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञ केएस मनोज ने कहा कि इस कमी ने केरल की बिजली व्यवस्था की गहरी कमजोरी को सामने ला दिया है। इसमें बाहरी बिजली पर निर्भरता, खरीद की लागत में उतार-चढ़ाव और मजबूत लंबी अवधि की योजना का न होना शामिल है।
केएस मनोज ने कहा, “फिलहाल सवाल सिस्टम को चालू रखने की लागत का है। अगर 300 मेगावाट बिजली लगातार 30 रुपए प्रति यूनिट की दर से खरीदी जाती है तो सिर्फ बिजली का बिल ही एक दिन में करीब 2.16 करोड़ रुपए और 30 दिनों में लगभग 65 करोड़ रुपए बैठेगा। हालांकि असली खर्च खरीदी गई बिजली की मात्रा, अवधि और अनुबंध की शर्तों पर निर्भर करेगा।”
उन्होंने कहा कि केएसईबी को पावर सिस्टम मैनेजमेंट में माहिर पूर्णकालिक प्रोफेशनल चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर की जरूरत है। यह बहस आईएएस बनाम टेक्नोक्रेट की नहीं होनी चाहिए, बल्कि जो भी इस संस्था का मुखिया हो, उसके पास तकनीकी ज्ञान, प्रबंधन क्षमता, जवाबदेही और निरंतरता होनी चाहिए ताकि वह बिजली खरीद, उत्पादन, ट्रांसमिशन और बाजार से जुड़े फैसले ले सके।
इस संकट ने केरल की लंबी अवधि की बिजली रणनीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। राज्य को मांग में बढ़ोतरी, जलविद्युत की उपलब्धता, नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, ऊर्जा भंडारण और राष्ट्रीय स्तर पर बिजली कमी की संभावना को ध्यान में रखते हुए 15 से 20 साल की एकीकृत योजना की जरूरत है।
विशेषज्ञ के मुताबिक, अब ध्यान सिर्फ उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर नहीं, बल्कि पीक डिमांड के समय पक्की और लचीली बिजली सुनिश्चित करने पर होना चाहिए। हाइड्रो और पंप स्टोरेज क्षमता, बैटरी स्टोरेज, नवीकरणीय उत्पादन, डिमांड रिस्पॉन्स और विविध खरीद पोर्टफोलियो ऐसी रणनीति का हिस्सा होने चाहिए।
इस संकट के कारण पहले किए गए दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौते भी फिर से जांच के दायरे में आ सकते हैं। विशेषज्ञ का तर्क है कि ऐसे समझौतों की समीक्षा राजनीतिक आरोपों के बजाय स्वतंत्र तकनीकी और वित्तीय जांच के जरिए होनी चाहिए।
फिलहाल सतीशन सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यही है कि जब तक आपूर्ति स्थिर नहीं होती, विपक्ष बिजली कटौती को प्रशासनिक विफलता के तौर पर पेश करता रहेगा। सरकार को यह भी बताना होगा कि जिस राज्य में 10 साल तक लगभग कोई कटौती नहीं हुई, वह अब इतनी बड़ी कमी का सामना क्यों कर रहा है कि उसे 30 रुपए प्रति यूनिट की महंगी बिजली खरीदने पर विचार करना पड़ रहा है।
–आईएएनएस
वीकेयू/वीसी
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