सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो केस के दोषियों की याचिका पर गुजरात और महाराष्ट्र से जवाब मांगा

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नई दिल्ली, 17 मार्च (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बिलकिस बानो गैंगरेप मामले के दो दोषियों की याचिका पर नोटिस जारी किया। यह मामला 2002 के गोधरा-बाद के दंगों से जुड़ा है। दोषियों ने 2017 के बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा गया था। जस्टिस राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई की बेंच ने बिपिनचंद्र कनैलाल जोशी उर्फ ​​लाला डॉक्टर और प्रदीप रमनलाल मोधिया द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) पर गुजरात और महाराष्ट्र सरकारों से जवाब मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई 5 मई को होगी।…

नई दिल्ली, 17 मार्च (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बिलकिस बानो गैंगरेप मामले के दो दोषियों की याचिका पर नोटिस जारी किया। यह मामला 2002 के गोधरा-बाद के दंगों से जुड़ा है। दोषियों ने 2017 के बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा गया था।

जस्टिस राजेश बिंदल और विजय बिश्नोई की बेंच ने बिपिनचंद्र कनैलाल जोशी उर्फ ​​लाला डॉक्टर और प्रदीप रमनलाल मोधिया द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) पर गुजरात और महाराष्ट्र सरकारों से जवाब मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई 5 मई को होगी।

याचिकाकर्ताओं ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 4 मई, 2017 के फैसले को चुनौती दी है। इस फैसले में ट्रायल कोर्ट द्वारा बिलकिस बानो के साथ हुए गैंगरेप और उनके परिवार के सदस्यों की हत्या के मामले में 11 आरोपियों को दी गई सजा और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा गया था।

अपने विस्तृत फैसले में, बॉम्बे हाई कोर्ट ने न केवल मुख्य आरोपियों की सज़ा को बरकरार रखा, बल्कि कुछ पुलिस अधिकारियों और मेडिकल अधिकारियों पर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा, “इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि वे न केवल पोस्टमॉर्टम करने में लापरवाही बरत रहे थे, बल्कि जानबूझकर जानकारी छिपाकर महत्वपूर्ण तथ्यों को दबा रहे थे।”

बॉम्बे हाई कोर्ट ने आगे कहा कि पुलिस और मेडिकल अधिकारियों के ये कृत्य ‘तथ्यों को छिपाने की एक ऐसी कड़ी बनाते हैं, जिससे अपराधियों को बचाने और उन्हें सज़ा से बचाने के इरादे से सबूत मिटाए गए।’

कई अधिकारियों को बरी किए जाने के फैसले को रद्द करते हुए, बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 201 और 218 के तहत दोषी ठहराया, जबकि यह माना कि आईपीसी की धारा 217 के तहत अपराध के तत्व साबित नहीं हुए थे।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने दोषियों द्वारा अपनी सज़ा के खिलाफ दायर अपीलों को खारिज करते हुए कहा, “साथ ही, हम आरोपी नंबर 1, 2 और 4 से 12 पर ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाई गई सज़ा और दोषसिद्धि को बरकरार रखते हैं।”

यह आपराधिक मामला फरवरी 2002 में गोधरा ट्रेन अग्निकांड के बाद गुजरात में भड़की हिंसा से जुड़ा है।

बिलकिस बानो, जो उस समय पांच महीने की गर्भवती थीं, के साथ गैंगरेप किया गया था, और उनके परिवार के कई सदस्यों, जिनमें उनकी तीन साल की बेटी भी शामिल थी, की हत्या कर दी गई थी।

इससे पहले, जनवरी 2024 में, सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार द्वारा 11 दोषियों को दी गई सज़ा में छूट को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने इन आदेशों को ‘घिसे-पिटे और एक जैसे’ बताते हुए उन्हें कानूनी रूप से अमान्य करार दिया था।

कोर्ट ने दोषियों को दो सप्ताह के भीतर जेल अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया था कि गुजरात सरकार के पास सज़ा माफ़ करने का अधिकार क्षेत्र नहीं था, और सुप्रीम कोर्ट का वह पिछला आदेश, जिसमें सजा माफी पर विचार करने की अनुमति दी गई थी, जरूरी तथ्यों को छिपाकर हासिल किया गया था।

निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए, 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दिया था।

2008 में, मुंबई की एक विशेष सीबीआई अदालत ने 11 आरोपियों को दोषी ठहराया और उन्हें सांप्रदायिक दंगों के दौरान सामूहिक बलात्कार और हत्या जैसे अपराधों के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

–आईएएनएस

एससीएच

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