सुप्रीम कोर्ट अपार आईडी के लिए ‘ऑप्ट-आउट’ का विकल्प स्पष्ट करने का सीबीएसई को देगा निर्देश

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नई दिल्ली, 20 जुलाई (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसआई) को निर्देश देगा कि वह ओडिशा हाईकोर्ट के उस फैसले को लागू करे, जिसमें अपार (ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री) आईडी बनाने के लिए सहमति फार्म में साफ तौर पर “ऑप्ट-आउट” (सेवा से बाहर निकलने) का विकल्प देने को कहा गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने संकेत दिया कि यह पक्का करने के लिए उचित निर्देश जारी किए जाएंगे कि अपार स्कीम स्वैच्छिक बनी रहे और माता-पिता की…

नई दिल्ली, 20 जुलाई (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसआई) को निर्देश देगा कि वह ओडिशा हाईकोर्ट के उस फैसले को लागू करे, जिसमें अपार (ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री) आईडी बनाने के लिए सहमति फार्म में साफ तौर पर “ऑप्ट-आउट” (सेवा से बाहर निकलने) का विकल्प देने को कहा गया है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने संकेत दिया कि यह पक्का करने के लिए उचित निर्देश जारी किए जाएंगे कि अपार स्कीम स्वैच्छिक बनी रहे और माता-पिता की सहमति वाले फॉर्म में सहमति न देने का विकल्प साफ तौर पर हो।

सुनवाई के दौरान सीजेआई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, “हम सीबीएसई को निर्देश देंगे कि वह इस फैसले को पूरे देश में लागू करे, क्योंकि ओडिशा हाईकोर्ट के आदेश को मान लिया गया है। हम सीबीएसई को इन मुद्दों की जांच करने का भी निर्देश दे रहे हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सीबीएसई के सर्कुलर मौजूदा कानून डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट, 2023 के अधीन होंगे। इस स्कीम को मौजूदा कानूनी ढांचे के अनुसार ही लागू करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट चार छात्रों के माता-पिता की ओर से दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में अपार आईडी स्कीम और बोर्ड परीक्षा रजिस्ट्रेशन के लिए अपार आईडी जरूरी करने के सीबीएसई के फैसले की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुईं वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने तर्क दिया कि भले ही सरकार अपार को एक स्वैच्छिक योजना बताती है लेकिन यह आधार से जुड़ी हुई है और असल में अपार आईडी पाने के लिए छात्रों को आधार लेने के लिए मजबूर करती है।

यह तर्क देते हुए कि इस जरूरत की वजह से आधार असल में शिक्षा के लिए एक जरूरी शर्त बन जाता है। इंदिरा ने कहा, “शिक्षा का अधिकार कोई टारगेटेड सर्विस नहीं है। शिक्षा का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है। इसलिए, परीक्षा में शामिल होने के लिए किसी बच्चे से आधार और अपार लेने के लिए कहना संविधान के खिलाफ है।”

याचिका में अपार एनरोलमेंट के लिए माता-पिता की सहमति लेते समय डीपीडीपी एक्ट का सख्ती से पालन करने की भी मांग की गई और बच्चों के पर्सनल डेटा को इकट्ठा करने, स्टोर करने और प्रोसेस करने को लेकर चिंता जताई गई।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूछा कि क्या इस मुद्दे पर ओडिशा उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी गई है।

यह सूचित किए जाने पर कि ऐसा नहीं किया गया है, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सीबीएसई को उच्च न्यायालय के निर्देशों को पूरे देश में लागू करने का निर्देश दिया जाएगा।

याचिका में आधार से जुड़े आजीवन शैक्षणिक पहचानकर्ता के रूप में अपार ढांचे को चुनौती दी गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि यह एक केंद्रीकृत डिजिटल संरचना का निर्माण करता है जो छात्रों की दीर्घकालिक ट्रैकिंग और प्रोफाइलिंग में सक्षम है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि यह योजना, हालांकि आधिकारिक तौर पर स्वैच्छिक बताई गई है, स्कूलों और शिक्षा अधिकारियों द्वारा जबरदस्ती लागू की जा रही है और बोर्ड परीक्षा पंजीकरण के लिए अपार को अनिवार्य बनाना संविधान के अनुच्छेद 21 और 21 ए के तहत निजता, शिक्षा और निर्णय लेने की स्वायत्तता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि इस स्कीम को कानूनी आधार नहीं मिला है, यह सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘के.एस. पुट्टास्वामी प्राइवेसी जजमेंट’ में तय किए गए कानूनी वैधता, जरूरत और आनुपातिकता के पैमानों पर खरी नहीं उतरती और आधार से जुड़ी ‘जन्म से करियर तक’ की डिजिटल पहचान बनाकर ‘भूल जाने के अधिकार’ का उल्लंघन करती है।

दिसंबर 2025 में ओडिशा हाई कोर्ट ने कहा था कि हालांकि अधिकारी लगातार यह कहते रहे हैं कि अपार पहल स्वैच्छिक है, लेकिन मॉडल सहमति फॉर्म में यह बात साफ नहीं थी क्योंकि इसमें माता-पिता को शुरुआत में ही सहमति न देने का विकल्प नहीं दिया गया था।

जस्टिस शशिकांत मिश्रा की सिंगल-जज बेंच ने कहा कि साफ तौर पर ‘ऑप्ट-आउट’ (बाहर निकलने) का प्रावधान न होने से स्कीम की स्वैच्छिक प्रकृति कमजोर होती है। उन्होंने कहा कि “मॉडल सहमति फॉर्म की भाषा ठीक नहीं लगती” और अगर अपार को स्वैच्छिक ही रखना है, तो माता-पिता को “अपनी सहमति न देने या इससे पूरी तरह बाहर निकलने” का स्पष्ट विकल्प दिया जाना चाहिए।

इसके बाद हाई कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मॉडल सहमति फॉर्म में बदलाव करें और उसमें ‘ऑप्ट-आउट’ या सहमति न देने का प्रावधान शामिल करें।

–आईएएनएस

ओपी/पीएम

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