नई दिल्ली, 21 मार्च (आईएएनएस)। स्पेस मिशन में माइक्रोग्रैविटी, रेडिएशन जैसी चुनौतियां इम्यून सिस्टम पर भारी पड़ती हैं। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) पर मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों के इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर माइक्रोग्रैविटी का असर समझने के लिए वैज्ञानिक लगातार जांच कर रहे हैं। यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ईएसए) की ‘इम्यून एसे’ में क्रू मेंबर्स के ब्लड सैंपल्स से सेलुलर इम्यून फंक्शन की काफी लंबे समय से निगरानी की जा रही है।
2023 में किए ग्राउंड स्टडीज से पता चला है कि माइक्रोग्रैविटी या अलग-थलग रहने से इन्फेक्शन से लड़ने की क्षमता प्रभावित होती है। ऐसे में एक डिवाइस की मदद से यह टेस्टिंग अब अंतरिक्ष में भी संभव हो गई है, जो पहले सिर्फ धरती पर ही हो पाती थी। इसका नाम ‘इम्यून एसे’ है, जिसका मुख्य उद्देश्य उड़ान के दौरान इम्यून सिस्टम में होने वाले बदलावों को सटीक तरीके से ट्रैक करना है। इस नए कलेक्शन डिवाइस से रिसर्चर्स को ज्यादा साफ डेटा मिल रहा है। नतीजे स्पेस और धरती दोनों जगह इम्यून मॉनिटरिंग के लिए एक उपयोगी टूल बन सकते हैं।
यह जांच लंबे स्पेस मिशन के लिए खासतौर पर महत्वपूर्ण है। अगर इम्यून सिस्टम में बदलाव जल्द पकड़ में आएं तो बीमारियों की शुरुआत को रोककर अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। माइक्रोग्रैविटी इम्यून सेल्स में ऐसे बदलाव लाती है, जो उम्र बढ़ने या इम्यूनोसेनेसेंस जैसे लगते हैं, लेकिन ये प्रक्रिया बहुत तेजी से होती है। इससे उन सेल्स पर असर पड़ता है, जो ऊतकों की मरम्मत और रिजेनरेशन में मदद करते हैं। ‘इम्यूनोसेनेसेंस’ जांच इसी पर फोकस कर रही है कि क्या उड़ान के बाद यह बदलाव ठीक हो जाते हैं।
माइक्रोग्रैविटी को इम्यून एजिंग तेज करने के टूल के रूप में इस्तेमाल करने से स्टेम सेल बायोलॉजी में नई जानकारियां मिल सकती हैं। इससे धरती पर बुजुर्गों के कमजोर इम्यून सिस्टम के लिए बेहतर इलाज विकसित हो सकते हैं। पिछली जांच ‘टी-सेल एक्ट इन एजिंग’ में पहली बार वैज्ञानिकों ने दिखाया कि ग्रैविटी टी-सेल एक्टिवेशन को प्रभावित करती है। टी-सेल्स इम्यून सिस्टम को सही निर्देश देते हैं।
माइक्रोग्रैविटी में कुछ खास जीन डाउन रेगुलेट हो जाते हैं, जिससे सेल रिस्पॉन्स कमजोर पड़ता है। इससे प्रो-इंफ्लेमेटरी रिएक्शन घटता है, हीलिंग धीमी होती है, साइटोकिन्स या सेल कम्युनिकेशन प्रोटीन कम बनते हैं और सेल मल्टीप्लिकेशन की क्षमता घट जाती है। नतीजा इन्फेक्शन से सुरक्षा कमजोर हो जाती है।
एक और महत्वपूर्ण जांच ‘इंटीग्रेटेड इम्यून’ में उड़ान से पहले, दौरान और बाद में ब्लड, यूरिन और लार के सैंपल्स का विश्लेषण किया गया। इससे पता चला कि लंबे मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों को स्किन रैश, सांस की तकलीफ, बोन रिसॉर्प्शन, किडनी स्टोन और इम्यून डिसरेगुलेशन जैसी समस्याएं होती हैं। बिना बेहतर पोषण और दवाओं के ये जोखिम बढ़ सकते हैं।
ईएसए की ‘इम्यूनो’ जांच से पता चला कि टोल-लाइक रिसेप्टर्स (टीएलआर) में उड़ान के बाद बदलाव आते हैं, जो हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग री-अडैप्टेशन दिखाते हैं। इससे स्ट्रेस रिस्पॉन्स और प्रो-इंफ्लेमेटरी स्थिति का संकेत मिलता है। ‘इम्यूनो-2’ जांच ने इसे आगे बढ़ाया। इसमें खून, लार, सांस, बाल के सैंपल्स के साथ ईसीजी, ब्लड ऑक्सीजन, एक्टिविटी और साइकोलॉजिकल टेस्टिंग शामिल है। ये सभी जांच स्पेस में इम्यून सिस्टम के अनुकूलन को समझने में मदद कर रही हैं। इससे लंबे मिशन के लिए दवाएं और नए टूल्स विकसित करने में वैज्ञानिकों को और भी मदद मिलेगी।
–आईएएनएस
एमटी/पीएम
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