मुंबई, 13 अगस्त (आईएएनएस)। शिवसेना प्रवक्ता संजय निरुपम ने छात्रों के विरोध-प्रदर्शन, संसद में विपक्ष के हंगामे, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट में अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (एक्यूआईएस) के कथित संबंध और महाराष्ट्र में ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा के नियम समेत कई मुद्दों पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कांग्रेस और विपक्ष पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया और कहा कि छात्रों के मुद्दों पर राजनीति करने के बजाय सभी राज्यों में प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों की समस्याओं पर समान रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए।
संजय निरुपम ने जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन को लेकर विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाते हुए झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और विपक्ष केंद्र सरकार से छात्र आंदोलनों और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर लगातार सवाल पूछते हैं, लेकिन झारखंड में उनकी सरकार होने के बावजूद वहां प्रदर्शन कर रहे छात्रों की समस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि झारखंड में छात्र पिछले कई सप्ताह से सड़क पर प्रदर्शन और आमरण अनशन कर रहे हैं। छात्रों से बातचीत करने के बजाय उन पर लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया जा रहा है। छात्र चाहे किसी भी वर्ग, क्षेत्र या सामाजिक पृष्ठभूमि से हों, उनके मुद्दों को समान रूप से देखा जाना चाहिए। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले छात्रों के मुद्दे इसलिए ज्यादा उठाए जा रहे हैं क्योंकि उनके प्रदर्शन को केंद्र सरकार के खिलाफ राजनीतिक अभियान के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। झारखंड के गरीब, आदिवासी, पिछड़े वर्ग और सामान्य वर्ग के छात्र भी छात्र ही हैं और उनकी समस्याओं को भी उतनी ही गंभीरता से उठाया जाना चाहिए।
संजय निरुपम ने झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी भर्तियों से जुड़े कथित विवादों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यदि छात्रों की ओर से परीक्षा में गड़बड़ी, सरकारी नौकरियों में अनियमितता या भाई-भतीजावाद जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं, तो सरकार को छात्रों के साथ बैठकर उनके सवालों का जवाब देना चाहिए। उन्होंने छात्रों की ओर से की जा रही सीबीआई जांच की मांग और झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) से जुड़े अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग पर भी विचार करने की बात कही। कांग्रेस से अपील करते हुए उन्होंने कहा कि यदि पार्टी वास्तव में छात्रों के हितों को लेकर गंभीर है तो उसे झारखंड में छात्रों के साथ बैठकर उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट में अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट के कथित संबंधों को नवंबर 2025 में दिल्ली के लाल किले के पास हुए धमाके से जोड़े जाने के सवाल पर भी निरुपम ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट में एक्यूआईएस को अल-कायदा की भारतीय शाखा के तौर पर उल्लेखित किया गया है और रिपोर्ट में नवंबर 2025 में दिल्ली में हुए बड़े बम धमाकों से इसके कथित संबंध का निष्कर्ष सामने आया है।
निरुपम ने इसे आतंकवाद के बदलते स्वरूप का उदाहरण बताते हुए कहा कि अब आतंकवादी गतिविधियों के पीछे ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो सामान्य पेशेवर और पढ़े-लिखे लोगों की तरह दिखाई देते हैं। उन्होंने दावा किया कि कुछ लोग डॉक्टर या विश्वविद्यालयों से जुड़े पेशेवरों की आड़ में उग्रवादी गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से एक्यूआईएस के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने और संगठन से जुड़े नेटवर्क की पूरी तरह जांच कर उसके तार जहां-जहां तक जुड़े हों, वहां तक कार्रवाई करने की मांग की। उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा के लिए ऐसे नेटवर्क को पूरी तरह खत्म करना जरूरी है।
संसद में लगातार हो रहे हंगामे और कामकाज बाधित होने को लेकर भी संजय निरुपम ने विपक्ष पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि संसद का सत्र विपक्ष और सभी सांसदों के लिए सरकार से सवाल पूछने और जनता के मुद्दे उठाने का महत्वपूर्ण अवसर होता है। विपक्ष के पास सरकार की नीतियों की आलोचना करने, सवाल पूछने और किसी गलती पर जवाब मांगने का पूरा अधिकार है। लेकिन संसद की कार्यवाही को लगातार बाधित करने से सरकार से ज्यादा नुकसान देश और आम जनता का होता है। संसद के कामकाज के दिनों की संख्या पहले की तुलना में कम हुई है। ऐसे में उपलब्ध समय का इस्तेमाल बहस और चर्चा के लिए किया जाना चाहिए, न कि लगातार हंगामा करके कार्यवाही रोकने के लिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष ने पहले यह कहा कि जब तक गृह मंत्री सदन में आकर जवाब नहीं देंगे, तब तक संसद नहीं चलने दी जाएगी। लेकिन जब गृह मंत्री ने जवाब देने की इच्छा जताई तो विपक्ष की ओर से उनके इस्तीफे की मांग शुरू कर दी गई। निरुपम ने इसे विपक्ष का गैर-जिम्मेदाराना रवैया बताते हुए कहा कि विपक्ष के पास जनता से जुड़े मुद्दों को सरकार के सामने रखने और सरकार को जवाबदेह बनाने का बड़ा अवसर था, लेकिन हंगामे के कारण वह अवसर गंवा दिया गया। उन्होंने कहा कि संसद की कार्यवाही बाधित होने से सरकारी धन का भी नुकसान होता है और इसका अंतिम असर देश की जनता पर पड़ता है।
महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा के नियम को लेकर संजय निरुपम ने कहा कि शिवसेना की इस मुद्दे पर अपनी स्पष्ट भूमिका रही है और महाराष्ट्र सरकार ने 1 मई से इससे संबंधित एक सरकारी आदेश लागू किया था। इसके तहत मुंबई और महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा तथा टैक्सी चलाने वाले चालकों से मराठी में संवाद करने की अपेक्षा की गई थी। सरकार ने गैर-मराठी भाषी चालकों को मराठी की बोलचाल सीखने के लिए समय दिया और इसके लिए विभिन्न स्थानों पर प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित किए गए।
उन्होंने दावा किया कि बड़ी संख्या में ऑटो चालकों ने इन प्रशिक्षण शिविरों में हिस्सा लिया और मराठी सीखने का प्रयास किया। करीब 1.35 लाख ऑटो चालकों ने बोलचाल की मराठी सीखने का प्रशिक्षण लिया और उन्हें प्रमाणपत्र भी दिए गए। सरकार ने इस अभियान के लिए 15 अगस्त तक की समयसीमा तय की थी। अब 15 अगस्त नजदीक आने के बीच महाराष्ट्र सरकार की ओर से यह आदेश जारी किए जाने की बात सामने आई है कि इसके बाद जो ऑटो चालक मराठी में संवाद नहीं कर पाएंगे, उनके परमिट और लाइसेंस के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
निरुपम ने आगे कहा कि मैंने परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक से कहा कि मराठी सीखने के अभियान को ऑटो चालकों की ओर से अच्छा समर्थन मिला है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं जो किसी कारण से अभी तक भाषा नहीं सीख पाए हों। उन्होंने आग्रह किया कि ऐसे लोगों के परमिट या ड्राइविंग लाइसेंस को तुरंत रद्द करने के बजाय अभियान को कुछ और समय तक जारी रखा जाए। पहले यह पता लगाया जाए कि कितने चालकों ने मराठी सीख ली है और कितने अभी भी सीख नहीं पाए हैं।
निरुपम ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी कारण से भाषा सीखने में पीछे रह गया है, तो उसकी स्थिति को समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि एक-दो लोगों के मराठी में संवाद नहीं कर पाने के आधार पर तुरंत परमिट या लाइसेंस रद्द करना उचित नहीं होगा। उन्होंने सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने और प्रशिक्षण अभियान को आगे बढ़ाने का आग्रह किया।
–आईएएनएस
पीएसके
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