OBC क्रीमी लेयर मामले में SC की सफाई, पुराने सिलेक्शन और नियुक्तियों पर लागू नहीं होगा 11 मार्च का फैसला

Summary :

केंद्र सरकार ने अगस्त में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि यदि 11 मार्च के फैसले को पिछली तिथियों से या जारी प्रक्रियाओं पर लागू किया गया, तो प्रशासनिक स्तर पर भारी अराजकता फैल जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों के माता-पिता की सैलरी के आधार पर क्रीमी लेयर तय करने से जुड़ा उसका 11 मार्च का निर्णय पुरानी नियुक्तियों पर लागू नहीं होगा।

केंद्र सरकार की अर्जी पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि इस फैसले से पुरानी नियुक्तियों और कैडर आवंटन को दोबारा नहीं खोला जाएगा। हालांकि, अदालत ने यह जरूर कहा कि 2025 की सिविल सेवा परीक्षा की जारी चयन प्रक्रिया पर यह निर्णय प्रभावी रहेगा, क्योंकि जब मार्च में फैसला आया था, तब यह प्रक्रिया चल रही थी।

केंद्र सरकार ने जताई थी प्रशासनिक अव्यवस्था की आशंका

दरअसल, केंद्र सरकार ने अगस्त में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि यदि 11 मार्च के फैसले को पिछली तिथियों से या जारी प्रक्रियाओं पर लागू किया गया, तो प्रशासनिक स्तर पर भारी अराजकता फैल जाएगी।

सरकार ने कहा कि PSUs और निजी क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के पदों की तुलना ग्रुप A और ग्रुप B अधिकारियों से करने के लिए कम से कम दो साल का समय चाहिए। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि अगर फैसला भूतप्रभावी तरीके से लागू हुआ, तो कई ऐसे उम्मीदवारों को भी आरक्षण का लाभ मिल जाएगा जिनके माता-पिता की सालाना कमाई 1 करोड़ रुपये से अधिक है।

11 मार्च के फैसले में क्या था खास?

मार्च में सुनाए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें पीएसयू और प्राइवेट नौकरियों में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों को सिर्फ वेतन के आधार पर क्रीमी लेयर से बाहर रखने को गलत माना गया था।

अदालत ने कहा था कि इंदिरा साहनी (1992) मामले के बाद 1993 में जारी ऑफिस मेमोरेंडम और 2004 के स्पष्टीकरण पत्र के तहत पदों के आधार पर वर्गीकरण को प्राथमिकता दी गई थी। सिर्फ सैलरी के आधार पर निजी या पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों को आरक्षण से वंचित करना और सरकारी सेवा के ग्रुप A, B, C या D पदों से उनकी तुलना न करना समानता के अधिकार के खिलाफ है।

अदालत का ताजा रुख और भविष्य का रास्ता

ताजा आदेश में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को अपनी नीति बनाने की पूरी आजादी दी है। पीठ ने कहा कि मार्च का फैसला केवल उन्हीं पक्षों के लिए राहत लेकर आया था जिन्होंने अदालत का रुख किया था। इससे पुरानी वरिष्ठता सूची या नियुक्तियां प्रभावित नहीं होंगी।

सरकार को पदों के समतुल्य निर्धारण के लिए नीतिगत कदम उठाने की छूट देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि 2025 की सिविल सेवा परीक्षा के सेवा आवंटन इस नए सिद्धांत के दायरे में आएंगे।

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Rohit Singh

रोहित सिंह पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। राजनीति, समाज, अंतर्राष्ट्रीय, अपराध और शैक्षणिक लेख लिखने में दिलचस्पी रखते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से पोलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन और जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में पंजाब केसरी दिल्ली में हिन्दी सब-एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं।