Supreme Court on Creamy Layer: सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी 12 मार्च को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी व्यक्ति को क्रीमी लेयर में शामिल करने का फैसला केवल उसकी पारिवारिक आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। सुनवाई के दौरान अदालत की पीठ ने कहा कि क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय व्यक्ति के सामाजिक और पेशेवर दर्जे को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
केवल आय को मानक मानकर फैसला लेना कानून की दृष्टि से सही नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति की स्थिति समझने के लिए उसके पद, सामाजिक स्थिति और पेशे को भी देखना जरूरी है। यदि इन पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया जाए और सिर्फ आय को आधार बनाया जाए तो यह व्यवस्था सामाजिक न्याय के उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाएगी।
Supreme Court on Creamy Layer: क्या है क्रीमी लेयर की अवधारणा?
क्रीमी लेयर का मतलब OBC वर्ग के उन लोगों से है जो आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी मजबूत स्थिति में पहुंच चुके हैं। सरकार की आरक्षण नीति का उद्देश्य समाज के कमजोर और पिछड़े लोगों को आगे बढ़ने का अवसर देना है। इसलिए जो लोग पहले से ही मजबूत स्थिति में हैं, उन्हें इस लाभ से बाहर रखा जाता है। इस अवधारणा की शुरुआत 1992 में हुई थी, जब Indra Sawhney v. Union of India मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था। अदालत ने OBC आरक्षण को वैध ठहराया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि इस वर्ग के संपन्न लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। इसके बाद 1993 में सरकार ने क्रीमी लेयर की पहचान करने के लिए नियम बनाए और उन्हें लागू किया।
क्रीमी लेयर तय करने के मौजूदा नियम
मौजूदा नियमों के अनुसार अगर किसी OBC परिवार की वार्षिक आय 8 लाख रुपये से ज्यादा है, तो उसे क्रीमी लेयर माना जाता है। ऐसे परिवारों के बच्चों को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता। यह आय सीमा आखिरी बार 2017 में बढ़ाई गई थी। उस समय इसे 6 लाख रुपये से बढ़ाकर 8 लाख रुपये किया गया था। हालांकि आय के अलावा कुछ अन्य मानक भी तय किए गए हैं। जैसे कि उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, सेना के उच्च अधिकारियों और बड़े व्यापारियों के बच्चों को भी क्रीमी लेयर में रखा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या हो सकता है असर?
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सरकार पर क्रीमी लेयर से जुड़े नियमों की समीक्षा करने का दबाव बढ़ सकता है। अदालत ने संकेत दिया है कि केवल आय को आधार बनाना सामाजिक न्याय के उद्देश्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। उदाहरण के तौर पर, किसी व्यक्ति की आय कम हो सकती है, लेकिन अगर वह किसी ऊंचे प्रशासनिक पद पर है तो उसकी सामाजिक स्थिति अलग मानी जा सकती है। इसलिए क्रीमी लेयर तय करने के लिए कई पहलुओं को साथ में देखना जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद सरकार भविष्य में क्रीमी लेयर से जुड़े नियमों में बदलाव कर सकती है, ताकि आरक्षण का लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
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