Supreme Court on Prostitution: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई बालिग महिला अपनी इच्छा से सेक्स वर्क करती है, तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सेक्स वर्क करने के आधार पर किसी महिला को गिरफ्तार करना या उसके साथ दुर्व्यवहार करना उचित नहीं है। पुलिस को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी व्यक्ति को धोखा देकर, दबाव डालकर या मजबूर करके देह व्यापार (Voluntary Sex Work) में धकेला जाता है, तो यह गंभीर अपराध है। ऐसे मामलों में इमोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट (ITPA) के तहत कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वेच्छा से किया गया सेक्स वर्क और मानव तस्करी से जुड़ा देह व्यापार दोनों अलग-अलग विषय हैं।
Supreme Court on Prostitution: ITPA कानून में क्या प्रावधान हैं?

Supreme Court on Prostitution (CREDIT-SM)
इमोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट, 1956 का उद्देश्य मानव तस्करी और देह व्यापार से जुड़े अवैध कार्यों को रोकना है। इस कानून के तहत कई गतिविधियों को अपराध माना गया है। कानून की धारा 3 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति या भवन को देह व्यापार के लिए उपलब्ध कराता है या उसका उपयोग करने देता है, तो उसे जेल और जुर्माने की सजा हो सकती है।
धारा 4 में प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति किसी सेक्स वर्कर की आय पर निर्भर रहता है और उससे आर्थिक लाभ उठाता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। धारा 5 के तहत किसी व्यक्ति को बहला-फुसलाकर, दबाव डालकर या जबरदस्ती देह व्यापार में शामिल करना अपराध माना गया है। वहीं धारा ( Section 7 ITPA )7 के अनुसार स्कूल, धार्मिक स्थल या अन्य सार्वजनिक स्थानों के निर्धारित क्षेत्र के भीतर सेक्स वर्क करना कानून का उल्लंघन माना जा सकता है।
Supreme Court Ruling on Prostitution: संविधान के तहत अधिकार

सुप्रीम Court ने पहले भी बुद्धदेव कर्माकर बनाम पश्चिम बंगाल सरकार मामले में सेक्स वर्करों के अधिकारों पर महत्वपूर्ण फैसला दिया था। अदालत ने कहा था कि संविधान का अनुच्छेद 21 सभी नागरिकों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है। यह अधिकार सेक्स वर्करों पर भी समान रूप से लागू होता है।
Rehabilitation of Women in Prostitution: पुलिस के रवैये पर चिंता
कई रिपोर्टों और जांचों में यह बात सामने आई है कि कई बार सेक्स वर्करों के साथ पुलिस का व्यवहार उचित नहीं होता। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की गरिमा और मानवाधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। केवल सेक्स वर्क करने के कारण किसी को परेशान करना या अपमानित करना कानून की भावना के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि यदि कोई बालिग व्यक्ति अपनी इच्छा से सेक्स वर्क कर रहा है और किसी अन्य कानून का उल्लंघन नहीं कर रहा है, तो उसे हिरासत में लेने या सुधार गृह भेजने का कोई औचित्य नहीं है। अदालत ने जोर देकर कहा कि ऐसे लोगों के साथ भी अन्य नागरिकों की तरह सम्मानजनक व्यवहार किया जाना चाहिए।
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