सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार से उस जनहित याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा, जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो और केंद्रीय सतर्कता आयोग को मामलों की समयबद्ध तरीके से जांच करने के लिए दिशा-निर्देश देने की मांग की गई है। यह जनहित याचिका अधिवक्ता मनीष पाठक ने दायर की थी, जिन्होंने सीबीआई के पास 2500 से अधिक मामलों के लंबित होने का मुद्दा उठाया था। पाठक ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सीबीआई की ओर से कोई जवाबी जवाब दाखिल नहीं किया गया है। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि जब शक्तिशाली लोग सत्ता में आते हैं, तो सीबीआई उसी के अनुसार काम करती है।
इससे कई मामलों की जांच में देरी होती है, खासकर अगर वे हाई प्रोफाइल हों और उनमें राजनीति या नौकरशाही के उच्च और शक्तिशाली लोग शामिल हों और इस तरह यह कई सालों या दशकों से लंबित मामलों का कारण बनता है”, याचिकाकर्ता ने प्रस्तुत किया।
प्रस्तुतियाँ सुनने के बाद, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना की अगुवाई वाली पीठ ने केंद्र से 4 सप्ताह के भीतर जनहित याचिका पर जवाब और एक प्रत्युत्तर दाखिल करने को कहा। इसके अलावा, शीर्ष अदालत ने कहा कि वह जुलाई के महीने में मामले की अगली सुनवाई करेगी और जनहित याचिका से निपटने में अदालत की सहायता के लिए एक एमिकस क्यूरी नियुक्त करने पर भी विचार करेगी।
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जनहित याचिका के अनुसार, यह प्रस्तुत किया गया था कि सीबीआई और सीवीसी की ओर से जांच में देरी दिल्ली पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम 1946 या केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) अधिनियम 2013 में दिशानिर्देशों की कमी के कारण है। “इस कारण से एजेंसी की अक्सर कई बार आलोचना भी की गई है याचिका में कहा गया है, “इसने अतीत में कई घोटालों और मामलों को ठीक से नहीं संभाला है। पी.वी. नरसिंह राव, जयललिता, लालू प्रसाद यादव, मायावती और मुलायम सिंह यादव जैसे प्रमुख राजनेताओं की जांच में देरी करने के लिए भी इसकी आलोचना की गई है। इस रणनीति के कारण या तो वे बरी हो जाते हैं या उन पर मुकदमा नहीं चलाया जाता।”


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