यादों में अमला शंकर: नृत्य की वह साधिका, जिसने परंपराओं को तोड़कर रचा इतिहास

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नई दिल्ली, 26 जून (आईएएनएस)। 27 जून सिर्फ तारीख नहीं बल्कि भारतीय नृत्य की उस महान साधिका को याद करने का दिन है, जिसने परंपराओं को तोड़कर अपनी कला से नया इतिहास रचा था। हम बात कर रहे अमला शंकर। यह वही नाम है, जिसने मंच पर सिर्फ कदम नहीं रखे, बल्कि नृत्य को एक साधना, एक सोच और एक जीवनशैली बना दिया। अमला शंकर का जन्म 27 जून 1919 को जेसोर (जो अब बांग्लादेश में है) में हुआ था। उनका परिवार शुरू से ही कला और संस्कृति से जुड़ा हुआ था। उनके पिता अक्षय कुमार नंदी एक प्रगतिशील सोच…

नई दिल्ली, 26 जून (आईएएनएस)। 27 जून सिर्फ तारीख नहीं बल्कि भारतीय नृत्य की उस महान साधिका को याद करने का दिन है, जिसने परंपराओं को तोड़कर अपनी कला से नया इतिहास रचा था। हम बात कर रहे अमला शंकर। यह वही नाम है, जिसने मंच पर सिर्फ कदम नहीं रखे, बल्कि नृत्य को एक साधना, एक सोच और एक जीवनशैली बना दिया।

अमला शंकर का जन्म 27 जून 1919 को जेसोर (जो अब बांग्लादेश में है) में हुआ था। उनका परिवार शुरू से ही कला और संस्कृति से जुड़ा हुआ था। उनके पिता अक्षय कुमार नंदी एक प्रगतिशील सोच रखने वाले व्यक्ति थे। घर का माहौल ऐसा था कि बचपन से ही अमला के भीतर कला के बीज पड़ने लगे। हालांकि, उस समय किसी लड़की का नृत्य की दुनिया में कदम रखना आसान नहीं था लेकिन अमला शंकर ने परंपराओं की सीमाओं को धीरे-धीरे पीछे छोड़ दिया। उनका झुकाव बचपन से ही कला की ओर था और यही झुकाव आगे चलकर उनके जीवन की पहचान बन गया।

1931 में, जब अमला सिर्फ 11 साल की थीं, वे अपने पिता के साथ फ्रांस गईं, जहां उनकी जिंदगी ने एक बड़ा मोड़ लिया। फ्रांस में उनकी मुलाकात भारतीय नृत्य के महान कलाकार उदय शंकर से हुई। यह मुलाकात साधारण नहीं थी। उस समय उदय शंकर यूरोप में भारतीय नृत्य को नई पहचान दिला रहे थे। अमला ने जब उनका नृत्य देखा, तो मानो उनकी दुनिया ही बदल गई। धीरे-धीरे वे उनकी नृत्य मंडली का हिस्सा बन गईं और यहीं से उनके जीवन की असली यात्रा शुरू हुई।

अमला शंकर ने यूरोप के कई देशों में उदय शंकर की नृत्य मंडली के साथ भारतीय नृत्य का परचम लहराया। उस दौर में विदेशी मंचों पर भारतीय कला को पहचान दिलाना आसान नहीं था, लेकिन अमला ने इसे अपने आत्मविश्वास और मेहनत से संभव बनाया। 1939 में अमला शंकर और उदय शंकर का विवाह हुआ। यह दो कला साधकों का मिलन था। दोनों ने मिलकर भारतीय नृत्य को एक नई दिशा दी।

उनकी सबसे प्रसिद्ध फिल्म ‘कल्पना’ 1948 में आई, जिसमें अमला शंकर ने मुख्य भूमिका निभाई थी। यह फिल्म उस समय भले ही व्यावसायिक रूप से सफल नहीं रही, लेकिन आज इसे भारतीय नृत्य और सिनेमा के इतिहास में एक अमूल्य रचना माना जाता है।

अमला शंकर का जीवन बाहर से जितना चमकदार दिखता था, अंदर से उतना ही संघर्षों से भरा था। कला की दुनिया में ऊंचाइयों को छूते हुए भी उनका निजी जीवन कई उतार-चढ़ाव से गुजरा। उदय शंकर के अन्य महिलाओं से संबंध ने उन्हें गहरे भावनात्मक संघर्ष में डाला लेकिन उन्होंने कभी नृत्य का साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने दर्द को भी कला में बदल दिया और मंच को अपनी ताकत बना लिया। समय के साथ जब जीवन ने करवट ली और उनके रास्ते अलग हुए, तब भी अमला शंकर ने हार नहीं मानी। उन्होंने कोलकाता में नृत्य संस्थान की जिम्मेदारी संभाली और वर्षों तक भारतीय नृत्य परंपरा को जीवित रखा। अपने बेटे आनंद की मृत्यु ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया लेकिन इसके बावजूद उन्होंने नृत्य सिखाना बंद नहीं किया।

अमला शंकर को उनके योगदान के लिए कई बड़े सम्मान मिले। 2011 में उन्हें पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ‘बंग विभूषण’ से सम्मानित किया गया। इसके अलावा 2012 में उन्हें ‘संगीत नाटक अकादमी टैगोर रत्न पुरस्कार’ भी मिला।

24 जुलाई 2020 को 101 वर्ष की उम्र में अमला शंकर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके जाने के साथ एक युग का अंत हो गया लेकिन उनकी कला आज भी जीवित है।

–आईएएनएस

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