Test2 भगवान शिव के डमरू के निर्माता है श्रीविश्वकर्मा

Summary :

सभी चारों युगों में भगवान श्रीविश्वकर्माजी ने कई नगर और भवनों का निर्माण किया। उपनिषद और पुराणों में इन्द्रपुरी, वरूणपुरी, यमपुरी और सुदामापुरी जैसे जगतप्रसिद्ध नगरों के निर्माण का श्रैय भगवान श्रीविश्वकर्माजी को ही है। कालचक्र के आधार पर देखें तो सबसे पहले सत्युग में उन्होंने स्वर्गलोक का निर्माण किया। बाद में त्रेतायुग में कुबेरजी की सोने की लंका का निर्माण भी भगवान श्रीविश्वकर्माजी ने ही किया था। द्वापर युग में श्रीकृष्ण के लिए द्वारका का निर्माण किया। कलयुग के आरम्भ में भगवान श्री विश्वकर्माजी ने हस्तिापुर और इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया था। इन्द्रप्रस्थ कला और आश्चर्य का एक बहुत…

सभी चारों युगों में भगवान श्रीविश्वकर्माजी ने कई नगर और भवनों का निर्माण किया। उपनिषद और पुराणों में इन्द्रपुरी, वरूणपुरी, यमपुरी और सुदामापुरी जैसे जगतप्रसिद्ध नगरों के निर्माण का श्रैय भगवान श्रीविश्वकर्माजी को ही है। कालचक्र के आधार पर देखें तो सबसे पहले सत्युग में उन्होंने स्वर्गलोक का निर्माण किया। बाद में त्रेतायुग में कुबेरजी की सोने की लंका का निर्माण भी भगवान श्रीविश्वकर्माजी ने ही किया था। द्वापर युग में श्रीकृष्ण के लिए द्वारका का निर्माण किया। कलयुग के आरम्भ में भगवान श्री विश्वकर्माजी ने हस्तिापुर और इन्द्रप्रस्थ का निर्माण किया था। इन्द्रप्रस्थ कला और आश्चर्य का एक बहुत नायाब उदाहरण था। इसके बारे में आप महाभारत में विस्तार से पढ़ सकते हैं। अस्त्र-शस्त्रों में भगवान श्रीशिव का त्रिशूल, श्रीधर्मराज का कालदण्ड, भगवान श्रीनारायण के अत्यन्त तीव्रगामी सुदर्शन-चक, महर्षि दधिचि की हड्डियों से देवताओं के राजा इन्द्र के वज्र का सृजन भी श्रीविश्वकर्माजी के उन्नत तकनीकी ज्ञान से ही संभव हो पाया। वाद्ययंत्रों में मां शारदा की वीणा और श्रीशिव के डमरू उल्लेखनीय है। इसके अलावा श्रीविश्वकर्माजी ने सुप्रसिद्ध पुष्पक विमान, श्रीशिव के कमण्डल और महारथी कर्ण के कुण्डल आदि का निर्माण और चिकित्सा के क्षेत्र के अनेक यंत्रों का सृजन किया, ऐसा व्याख्यान पुराणों में वर्णित पाया जाता है। आप भगवान श्रीविश्वकर्माजी का शिल्प आज भी श्रीजगन्नाथपुरी की मूर्तियों में देख सकते हैं। मान्यता है कि श्रीविश्वकर्माजी ने ही श्रीजगन्नाथपुरी के मंदिर में स्थित विशाल मूर्तिर्यों का काष्ठ से निर्माण किया था। मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण, सुभद्रा और बलरामजी की दिव्य प्रतिमाएं हैं।

श्रीवृद्धिकारक है श्री विश्वकर्मा
शास्त्रों में यह स्पष्ट लिखा है कि यज्ञ और गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों में श्रीविश्वकर्माजी की पूजा करने से कार्य संपादन में श्रीवृद्धि होती है। निम्न श्लोक देखें –

विवाहदिषु यज्ञषु गृहारामविधायके।
सर्वकर्मसु संपूज्यो विश्वकर्मा इति श्रतुम।

घर के निर्माण के आरम्भ में भी श्री विश्वकर्मा की पूजा से कार्य निर्बाध रूप से संपन्न हो जाता है। श्री विश्वकर्मा सभी संकटों और विपत्तियों को हरने वाले है। इसलिए जिस किसी कार्य में जोखिम होता है उन सभी को आरम्भ करने से पूर्व श्री विश्वकर्मा का मनाए जाने की पुरातन परम्परा चली आ रही है। इसलिए कल-कारखानों में श्री विश्वकर्मा का चित्र अवश्य होता है।

ऋद्धि-सिद्धि है श्री विश्वकर्मा की पुत्रियां

shalu sengar