नाबालिग को बालिग कैदियों संग रखने पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, अब यूपी सरकार देगी ₹5 लाख का हर्जाना

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Agra Jail Case: सुप्रीम कोर्ट ने एक गंभीर मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि नाबालिग को वयस्क(बालिग) कैदियों के साथ जेल में रखना कानून और मानवाधिकार दोनों का उल्लंघन है। यह मामला आगरा की केंद्रीय जेल से जुड़ा है, जहां एक बच्चे को गलत तरीके से वयस्क कैदियों के बीच रखा गया था। जस्टिस  जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि यह बच्चों के अधिकारों की रक्षा में सिस्टम की बड़ी विफलता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब किसी व्यक्ति को नाबालिग घोषित कर दिया…

Agra Jail Case: सुप्रीम कोर्ट ने एक गंभीर मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि नाबालिग को वयस्क(बालिग) कैदियों के साथ जेल में रखना कानून और मानवाधिकार दोनों का उल्लंघन है। यह मामला आगरा की केंद्रीय जेल से जुड़ा है, जहां एक बच्चे को गलत तरीके से वयस्क कैदियों के बीच रखा गया था। जस्टिस  जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि यह बच्चों के अधिकारों की रक्षा में सिस्टम की बड़ी विफलता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब किसी व्यक्ति को नाबालिग घोषित कर दिया गया हो, तब भी उसे वयस्क जेल में रखना बेहद चिंताजनक है।

मीडिया रेपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह की घटना संचार की कमी, लापरवाही और असंवेदनशील रवैये को दर्शाती है। अदालत के अनुसार, यह केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

क्या है पूरा मामला?

घटना के समय आरोपी नाबालिग था, लेकिन इसके बावजूद उसे आगरा की केंद्रीय जेल में वयस्क कैदियों के साथ रखा गया। यह एक गंभीर प्रशासनिक चूक मानी गई। इस मामले के सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया और राज्य सरकार से जवाब मांगा। जांच में यह साफ हुआ कि संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह गलती हुई। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने पीड़ित नाबालिग को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का फैसला किया है। यह कदम उस मानसिक और शारीरिक नुकसान की भरपाई के तौर पर देखा जा रहा है, जो बच्चे को झेलना पड़ा।

Agra Jail Case: नाबालिग को वयस्क जेल में रखना क्यों गलत?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत किसी भी नाबालिग को वयस्क कैदियों के साथ नहीं रखा जा सकता। भारत में बच्चों के लिए अलग सुधार गृह और देखभाल की व्यवस्था की गई है, ताकि उन्हें सुरक्षित माहौल मिल सके और उनका पुनर्वास हो सके।

अदालत ने कहा कि इस तरह की घटना न केवल बाल संरक्षण कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के खिलाफ भी है। बच्चों के साथ इस तरह का व्यवहार उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकता है।

पूरे देश के लिए जारी हुआ SOP

इस मामले को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित रहने के बजाय पूरे देश के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने और उसे सभी राज्यों में लागू करने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने कहा कि यह जरूरी है कि भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न हो। साथ ही, सभी राज्यों को इस SOP का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले पर निगरानी बनाए रखेगी, ताकि आदेशों का सही तरीके से पालन हो।

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Amit Kumar

अमित कुमार पिछले 3 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उन्हें विदेश, बिजनेस, ऑटो, टेक और गैजेट्स से जुड़ी खबरें लिखने का अच्छा अनुभव है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ मास कम्युनिकेशन, आईआईएमसी से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा और उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। पत्रकारिता की शुरुआत उन्होंने वेबसाइट पर लिखने से की। इसके बाद इंडिया डेली न्यूज़ चैनल और न्यूज़ इंडिया 24x7 में हिंदी सब-एडिटर के तौर पर काम किया। वर्तमान में वह पंजाब केसरी, दिल्ली में हिंदी सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं।