Allahabad High Court News: उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि “गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सिर तन से जुदा” जैसा नारा देश की कानून व्यवस्था और भारत की एकता व अखंडता के लिए गंभीर चुनौती है। अदालत के अनुसार, इस तरह के नारे लोगों को हिंसा और विद्रोह के लिए उकसाते हैं, जो किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है।
Bareilly Violence: जमानत याचिका खारिज
यह टिप्पणी बरेली जिले में हुई हिंसा से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई। अदालत ने रिहान नाम के युवक की जमानत याचिका खारिज कर दी। रिहान पर आरोप है कि वह 26 मई 2025 को बिहारीपुर इलाके में हुई हिंसक घटना में शामिल था। यह भीड़ इत्तेफाक मिन्नत काउंसिल (INC) के अध्यक्ष मौलाना तौकीर रजा के आह्वान पर एकत्र हुई थी, जिसमें लगभग 500 लोग शामिल थे।

Allahabad High Court News: हिंसा और पुलिस पर हमला
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, जब पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश की, तो भीड़ ने हिंसक रूप अपना लिया। कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों से लाठियां छीन लीं, उनकी वर्दी फाड़ दी और सार्वजनिक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। इसके अलावा, भीड़ द्वारा पेट्रोल बम फेंके गए, पथराव किया गया और गोलीबारी भी हुई। इस हिंसा में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। मौके से सात लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें रिहान भी शामिल था।
Sar Tan se Juda High Court: बीएनएस की धारा 152 का जिक्र
हाई कोर्ट के जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने कहा कि यह पूरा कृत्य भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 के अंतर्गत आता है। यह धारा उन अपराधों से संबंधित है जो देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालते हैं। अदालत ने माना कि केस डायरी में ऐसे पर्याप्त सबूत हैं, जो यह दिखाते हैं कि आरोपी उस गैरकानूनी और हिंसक सभा का हिस्सा था।

Sar Tan se Juda Slogan News: धार्मिक नारों पर अदालत की टिप्पणी
अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि हर धर्म में नारे लगाए जाते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य ईश्वर के प्रति सम्मान और श्रद्धा दिखाना होता है। उदाहरण के तौर पर इस्लाम में “अल्लाहू अकबर”, सिख धर्म में “जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” और हिंदू धर्म में “जय श्री राम” या “हर हर महादेव” जैसे नारे लगाए जाते हैं।
इस्लाम के सिद्धांतों के भी खिलाफ
कोर्ट ने कहा कि विवादित नारे का न तो कुरान में और न ही किसी अन्य इस्लामी धार्मिक ग्रंथ में कोई उल्लेख है। इसके बावजूद, कई लोग इसके सही अर्थ और परिणाम समझे बिना इसका उपयोग कर रहे हैं, जो समाज के लिए खतरनाक है। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा नारा न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों के भी विपरीत है। इस्लाम शांति, संयम और मानवता की शिक्षा देता है, न कि हिंसा और नफरत की।
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