Army Man Divorce Case: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से हाल ही में एक ऐसा फैसला सामने आया है, जिसने रिश्तों को एक बार फिर सवालों के घेरे में ला दिया है। यह मामला एक आर्मी जवान और उसकी पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे तलाक विवाद से जुड़ा है। पत्नी ने फैमिली कोर्ट द्वारा बच्चे के DNA टेस्ट के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी।
Army Man Divorce Case: कोर्ट ने क्यों खारिज की पत्नी की याचिका?
इस मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक जैन की एकलपीठ ने की। कोर्ट ने साफ कहा कि DNA टेस्ट का उद्देश्य बच्चे की वैधता पर सवाल उठाना नहीं है। न ही इससे बच्ची की कानूनी पहचान पर कोई असर पड़ेगा। हाईकोर्ट के अनुसार, यह जांच सिर्फ यह जानने के लिए जरूरी है कि पत्नी पर लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है। इसलिए फैमिली कोर्ट का DNA टेस्ट का आदेश सही और कानून के दायरे में है।

4 Day Pregnancy Claim: DNA सैंपल न देने पर क्या होगा असर?
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि अगर पत्नी DNA जांच के लिए सैंपल देने से इनकार करती है, तो फैमिली कोर्ट उसके खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगा सकती है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम और नए कानून BSA 2023 के तहत कोर्ट को यह अधिकार है कि वह सैंपल न देने को संदेह की नजर से देखे। यानी जांच से बचने पर पत्नी को कोई कानूनी फायदा नहीं मिलेगा।
MP High Court DNA Test: ‘चार दिन में प्रेग्नेंसी’ बना विवाद की जड़
इस केस का सबसे अहम और चौंकाने वाला पहलू पति का दावा है। आर्मी जवान ने कोर्ट को बताया कि वह ड्यूटी के चलते घर से दूर रहता था। अक्टूबर 2015 में पत्नी के बुलाने पर वह कुछ समय के लिए घर आया। उसके वापस लौटने के सिर्फ चार दिन बाद पत्नी ने बताया कि वह गर्भवती है। कोर्ट ने माना कि मेडिकल साइंस के अनुसार चार दिन में प्रेग्नेंसी का पता चलना बेहद असामान्य है। इसके अलावा बच्ची का जन्म करीब आठ महीने बाद हुआ, जिससे पति का शक और मजबूत हो गया कि वह उस दौरान पत्नी के साथ मौजूद नहीं था।

10 साल से चल रहा है विवाद
यह मामला कई सालों से कोर्ट में चल रहा है। पहली तलाक याचिका 2019 में दाखिल हुई थी, जिसे आपसी सहमति के भरोसे वापस ले लिया गया। उसी साल दूसरी याचिका भी दायर हुई, लेकिन पत्नी दूसरी सुनवाई में पेश नहीं हुई, जिसके चलते मामला 2021 में बंद हो गया। इसके बाद 2021 में तीसरी बार तलाक की अर्जी दी गई, जो अब भी लंबित है। इसी केस में DNA टेस्ट की मांग की गई थी।
कोर्ट का साफ संदेश
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब तलाक का आधार व्यभिचार जैसे गंभीर आरोप हों और पति खुद यह कह रहा हो कि बच्चे की वैधता या भरण-पोषण पर कोई सवाल नहीं है, तो DNA जांच का आदेश देना गलत नहीं माना जा सकता। कोर्ट के अनुसार, सच सामने लाने के लिए यह जरूरी कदम है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे कई मामलों के लिए मिसाल बन सकता है, जहां पारिवारिक विवादों में सच्चाई जानने के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी हो। इस फैसले से यह भी साफ संदेश गया है कि कोर्ट भावनाओं से नहीं, बल्कि तथ्यों और सबूतों के आधार पर निर्णय लेती है।


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