‘ज्ञान भारतम् मिशन’ में सम्मानित हुए इतिहास के प्रहरीआचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र, दुर्लभ पांडुलिपियों से समृद्ध विरासत का कराया दर्शन

Summary :

Gyan Bharatam to Ramendra Nath Mishra : भारतीय इतिहास, संस्कृति और प्राचीन ज्ञान परंपरा के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान देने वाले सुप्रसिद्ध इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र को ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के अंतर्गत सम्मानित किया गया। यह सम्मान न केवल उनके वर्षों के शोध, तप और समर्पण का प्रतीक है, बल्कि जिले के लिए भी गर्व का विषय रहा। मौजूद रहे वरिष्ठ अधिकारी इस अवसर पर जिला प्रशासन रायपुर के वरिष्ठ अधिकारियों कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह, नगर निगम आयुक्त  विश्वदीप एवं जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी  कुमार बिस्वरंजन ने आचार्य मिश्र के निवास पहुँचकर उन्हें सम्मानित किया। अधिकारियों द्वारा प्रदान…

Gyan Bharatam to Ramendra Nath Mishra : भारतीय इतिहास, संस्कृति और प्राचीन ज्ञान परंपरा के संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान देने वाले सुप्रसिद्ध इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र को ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के अंतर्गत सम्मानित किया गया। यह सम्मान न केवल उनके वर्षों के शोध, तप और समर्पण का प्रतीक है, बल्कि जिले के लिए भी गर्व का विषय रहा।

मौजूद रहे वरिष्ठ अधिकारी

Gyan Bharatam to Ramendra Nath Mishra
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इस अवसर पर जिला प्रशासन रायपुर के वरिष्ठ अधिकारियों कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह, नगर निगम आयुक्त  विश्वदीप एवं जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी  कुमार बिस्वरंजन ने आचार्य मिश्र के निवास पहुँचकर उन्हें सम्मानित किया।

अधिकारियों द्वारा प्रदान किया गया यह सम्मान भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के प्रति उनकी निष्ठा का जीवंत प्रमाण है।

निजी ग्रंथालय का किया अवलोकन

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कार्यक्रम के दौरान अधिकारियों ने आचार्य मिश्र के दुर्लभ संग्रहालय और निजी ग्रंथालय का अवलोकन किया। यहां उन्हें ऐतिहासिक महत्व की अनेक अमूल्य पांडुलिपियों और ताम्रपत्रों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई।

इनमें बाबू रेवाराम ‘पंडित’ द्वारा रचित “तवारीख हैहयवंशी राजाओं की” (1858), पंडित सुंदरलाल शर्मा की देश की एकमात्र हस्तलिखित जेल पत्रिका “श्री कृष्ण जन्म स्थान”, रानी दुर्गावती कालीन दुर्लभ गीता की पांडुलिपि तथा वर्ष 1845 से 1905 तक प्रकाशित “कोलकाता रिव्यू” प्रमुख रूप से शामिल रहे।

पांडुलिपियाँ बनीं आकर्षक का केंद्र

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इसके साथ ही ताड़पत्रों पर लिखी संस्कृत पांडुलिपियाँ और बस्तर भूषण पंडित केदारनाथ ठाकुर, बाबू प्यारेलाल गुप्त एवं यतियतन लाल की हस्तलिखित दैनिक डायरियाँ भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं।

यह आयोजन न केवल आचार्य मिश्र के अद्वितीय योगदान को सम्मानित करने का अवसर बना, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय इतिहास और संस्कृति के संरक्षण के प्रति प्रेरित करने वाला भी साबित हुआ।

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Rohit Singh

रोहित सिंह पिछले 5 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। राजनीति, समाज, अंतर्राष्ट्रीय, अपराध और शैक्षणिक लेख लिखने में दिलचस्पी रखते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से पोलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन और जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में पंजाब केसरी दिल्ली में हिन्दी सब-एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं।