GBU-57 गैर-परमाणु बम से हिला ईरान का न्यूक्लियर साइट! सैटेलाइट तस्वीरों ने दुनिया को चौंकाया

US Strikes Iran Nuclear Facility (image: social media )

US Strikes Iran Nuclear Facility: मिडिल ईस्ट में जंग और भी भीषण रूप लेती जा रही है। दरअसल अमेरिका ने हाल ही में ईरान के एक अहम सैन्य परिसर पर अपने सबसे ताकतवर गैर-परमाणु बम से हमला किया है। यह हमला उस स्थान पर किया गया, जहां ईरान के संभावित परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी गतिविधियां होने का शक जताया जाता रहा है। इस घटना के बाद अब यह लड़ाई केवल तेल या क्षेत्रीय प्रभाव तक सीमित नहीं रही, बल्कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने की दिशा में बढ़ती दिख रही है।

9 और 10 मार्च के बीच ईरान के पारचिन सैन्य परिसर में स्थित टालेगन-2 नाम की जगह को निशाना बनाया गया। यह परिसर तेहरान के पास स्थित एक बड़ा और संवेदनशील सैन्य क्षेत्र माना जाता है। हमले के बाद सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों में जमीन पर बड़े-बड़े गड्ढे दिखाई दे रहे हैं, जिससे भारी तबाही का अंदाजा लगाया जा रहा है।

US Strikes Iran Nuclear Facility: GBU-57 से मेल खाता है गड्ढों का आकार

US Strikes Iran Nuclear Facility
US Strikes Iran Nuclear Facility (source: Social Media)

अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय एक्स्पर्ट्स के मुताबिक, इन गड्ढों का आकार उस खास बम से मेल खाता है जिसे GBU-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर (MOP) कहा जाता है। यह बम जमीन या कंक्रीट के अंदर करीब 200 फीट तक घुसकर विस्फोट करने की क्षमता रखता है। इसे आम लड़ाकू विमान नहीं उठा सकते, बल्कि सिर्फ B-2 स्टेल्थ बॉम्बर ही इसे ले जाने में सक्षम है।बताया जा रहा है कि B-2 बॉम्बर अमेरिका के मिसौरी स्थित व्हाइटमैन एयर फोर्स बेस से उड़ा, लगभग 25,000 किलोमीटर की लंबी उड़ान भरकर ईरान पहुंचा और मिशन पूरा करने के बाद वापस लौट आया।

टालेगन-2 क्यों है अहम?

पारचिन सैन्य परिसर के अंदर मौजूद टालेगन-2 को लंबे समय से एक संवेदनशील और गोपनीय जगह माना जाता रहा है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की रिपोर्टों में भी इस स्थान का उल्लेख किया गया है। IAEA के अनुसार, यहां हाइड्रोडायनामिक प्रयोग किए गए थे। ऐसे प्रयोग परमाणु हथियारों के विकास में महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि इनमें शक्तिशाली विस्फोटकों की मदद से यूरेनियम या प्लूटोनियम को दबाने और नियंत्रित करने की तकनीक का परीक्षण किया जाता है।

साल 2015 में IAEA की जांच के दौरान यहां मानव-निर्मित यूरेनियम के सूक्ष्म कण भी पाए गए थे। हालांकि इसके बाद ईरान ने इस जगह पर आगे की जांच को रोक दिया और इलाके को साफ कर दिया, जिससे एजेंसी के लिए सटीक जानकारी जुटाना मुश्किल हो गया। 2018 में इजरायल ने ईरान के कथित “अमाद प्लान” से जुड़े हजारों दस्तावेज सार्वजनिक किए थे, जिनमें पारचिन का जिक्र भी किया गया था। हालांकि ईरान लगातार यह कहता रहा है कि यह सिर्फ एक सैन्य ठिकाना है और इसका परमाणु कार्यक्रम से कोई संबंध नहीं है।

US Strikes Iran: GBU-57 बम की खासियत

GBU-57 बम को खास तौर पर गहराई में बने बंकर और भूमिगत ठिकानों को नष्ट करने के लिए तैयार किया गया था। इसे अमेरिकी सरकार ने ऐसे परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया था, जो जमीन के काफी अंदर बनाए गए हैं। इसका वजन बहुत ज्यादा होता है और यही वजह है कि केवल B-2 जैसे बड़े स्टेल्थ बॉम्बर ही इसे ले जा सकते हैं। माना जा रहा है कि टालेगन-2 पर इसी बम का इस्तेमाल किया गया है।

US Strikes Iran War: युद्ध का बदलता स्वरूप

अब तक इस संघर्ष का मुख्य केंद्र तेल, क्षेत्रीय प्रभाव और राजनीतिक शक्ति था। लेकिन पारचिन पर हुए इस हमले के बाद स्थिति बदलती नजर आ रही है। अब फोकस सीधे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान को लगे कि उसका परमाणु कार्यक्रम गंभीर खतरे में है, तो उसके सामने दो विकल्प रह जाएंगे। पहला, वह अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुक जाए। दूसरा, वह गुप्त स्थानों पर और तेजी से परमाणु हथियार बनाने की कोशिश शुरू कर दे।

हालात कितने गंभीर

रिपोर्टों के अनुसार, केवल छह दिनों के भीतर इस युद्ध पर करीब 11 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च हो चुका है। साथ ही वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों की संख्या में भारी गिरावट आई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में चिंता बढ़ गई है। हालांकि खुफिया एजेंसियों का कहना है कि अभी ईरान की सरकार स्थिर बनी हुई है और उसके सैन्य ढांचे में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है।

कुल मिलाकर यह घटना संकेत देती है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बेहद गंभीर हैं। आने वाले समय में यह टकराव दुनिया की सुरक्षा और राजनीति दोनों के लिए बड़ा मुद्दा बन सकता है।

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