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घरेलू सहायिकाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए सख्त कानून बनाने की जरूरत : विशेषज्ञ

घरेलू सहायकों के विरुद्ध हिंसा की कई घटनाओं के सामने आने के बीच, कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है ताकि घरेलू सहायकों और उनके अधिकारों की रक्षा की जा सके।

घरेलू सहायकों के विरुद्ध हिंसा की कई घटनाओं के सामने आने के बीच, कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि इसे रोकने के लिए कड़े कानून की जरूरत है ताकि घरेलू सहायकों और उनके अधिकारों की रक्षा की जा सके।
उन्होंने कहा कि ऐसे कानूनों के नहीं होने से घरेलू सहायकों को उत्पीड़न और शोषण झेलने पर बाध्य होना पड़ता है। हाल ही में, भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी माहेश्वर पात्रा की पत्नी सीमा पात्रा को अपनी घरेलू सहायिका पर क्रूरता से हमला करने और परेशान करने के आरोप में रांची पुलिस ने गिरफ्तार किया।
आरोप है कि पात्रा ने अपनी घरेलू सहायिका को कई दिनों तक भोजन और पानी नहीं दिया। वह कथित तौर पर उसे नियमित रूप से पीटती थी और लोहे की छड़ से मारकर उसका दांत तक तोड़ दिया था।
इसी प्रकार के एक मामले में पश्चिमी दिल्ली के राजौरी गार्डन में 48 वर्षीय एक घरेलू सहायिका को कथित तौर पर नियोक्ताओं द्वारा पीटा गया और उसके बाल काट दिए गए थे। घरेलू सहायकों के पुनर्वास के लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने कहा कि व्यवस्था में ऐसी कई कमियां हैं जिनके कारण घरेलू सहायकों को प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है।
ऑक्सफैम इंडिया के जेंडर जस्टिस टीम की कार्यक्रम समन्वयक अनुश्री जयरथ ने कहा कि समाज में घरेलू सहायक समाज में हाशिये पर होते हैं इसलिए उनके साथ उत्पीड़न, जबरन श्रम के लिए बाध्य करना और लिंग आधारित हिंसा का खतरा रहता है।
उन्होंने कहा, “देखभाल के काम को सामाजिक नियमों के अनुसार महिलाओं की जिम्मेदारी समझा जाता है और उसे ‘काम’ के तौर पर नहीं देखा जाता जिसकी वजह से घरेलू सहायकों को और कमतर आंका जाता है। इसके कारण उन्हें न्यूनतम वेतन से भी कम दिया जाता है और शोषण किया जाता है।” उन्होंने कहा कि घरेलू सहायकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून नहीं होने से भी उनका शोषण होता है।
उन्होंने कहा, “वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने मजदूरों के लिए शक्तिशाली नीतियां बनाई हैं लेकिन भारत ने न तो आईएलओ घरेलू सहायक प्रस्ताव 189 (जो कि घरेलू सहायकों को श्रमिक के तौर पर मान्यता देता है और उनके अधिकारों की वकालत करता है) को स्वीकार किया है और न ही आईएलओ फोर्स्ड लेबर प्रोटोकॉल (जिसके अनुसार सदस्य देशों को जबरन मजदूरी करवाने से रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाना होता है) को मंजूरी दी है।
जयरथ ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर घरेलू सहायक असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा कानून के तहत आते हैं। उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र, ओडिशा और कर्नाटक जैसे राज्यों ने कल्याण बोर्ड स्थापित किये हैं और न्यूनतम भत्ते तय किये हैं लेकिन इससे केवल मुट्ठीभर मजदूरों का ही भला हुआ है। घरेलू सहायिकाओं के मामले में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (बचाव, रोकथाम और शिकायत) अधिनियम 2013 को भी लागू किया जा सकता है।”
सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की मानसी मिश्रा ने कहा कि अगर यौन उत्पीड़न हुआ है तो घरेलू सहायिकाएं कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से बचाव (पीओएसएच) के तहत आती हैं क्योंकि वे जिस घर में काम कर रही होती हैं वह कार्यस्थल होता है।
मिश्रा ने कहा, “लेकिन इसका दायरा बढ़ाने के लिए उन्हें स्थानीय शिकायत समिति का सहारा भी मिलना चाहिए जिसका अध्यक्ष जिला आयुक्त या जिले का उपायुक्त हो सकता है।” राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के अनुसार, भारत में लगभग 40 लाख घरेलू सहायक हैं और उनमें से लगभग दो तिहाई महिलाएं हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता रुथ मनोरमा ने कहा कि आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि अमीर लोग जनजातीय इलाकों से बच्चों को उठा लेते हैं जब वे सात या आठ साल के होते हैं और उन्हें कई साल तक घरेलू सहायक के तौर पर रखा जाता है। इस दौरान उन्हें अकसर प्रताड़ित किया जाता है।
उन्होंने कहा, “(किसी घर में रखे गए) महिलाओं और बच्चों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है और उनके लिए कोई कानून नहीं है।” उन्होंने कहा कि घरेलू सहायकों को सुरक्षित करने के लिए सम्पूर्ण प्रावधानों वाले एक अलग कानून की जरूरत है।

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