शंघाई, 10 अगस्त (आईएएनएस)। भारत इस साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। इस मौके पर चीन में भारतीय दूतावास में कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसका नेतृत्व शंघाई में भारत के महावाणिज्यदूत प्रतीक माथुर ने किया। इस मौके पर बिहार के सुप्रसिद्ध मिथिला पेंटिंग की वर्कशॉप का आयोजन भी किया गया।
शंघाई में स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कार्यक्रम की जानकारी देते हुए कहा, “चीन में भारत के स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगांठ के चल रहे समारोहों के हिस्से के रूप में महावाणिज्यदूत प्रतीक माथुर के नेतृत्व वाली टीम सीजीआई, शंघाई ने पारंपरिक भारतीय कला मधुबनी को समर्पित एक इंटरैक्टिव कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में भारतीय प्रवासी समुदाय और चीन में ‘भारत के दोस्त’ के 200 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।”
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए महावाणिज्य दूत ने भारत की लोक और सांस्कृतिक परंपराओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया, जो हमारी अनूठी पहचान को बनाए रखने, हमारे जीवंत समुदाय को एक साथ लाने और हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने में मदद करती हैं।
महावाणिज्य दूत ने इस बात पर जोर दिया कि मधुबनी कला की उत्पत्ति बिहार के मिथिला क्षेत्र से हुई है, जिसका हमारी सभ्यतागत इतिहास और संस्कृति में एक अनोखा स्थान है।
इस अवसर पर महावाणिज्यदूत को प्रतिष्ठित शंघाई जिंसाई इंटरनेशनल स्कूल के युवा छात्रों हान और लियू से मिलकर और उन्हें सम्मानित करके खुशी हुई। ये छात्र हाल ही में छात्र विनिमय कार्यक्रम के तहत भारत आए थे और अब मधुबनी जैसी पारंपरिक भारतीय कला रूपों के बारे में क्षेत्र में अधिक जागरूकता लाने और बेहतर समझ बढ़ाने के लिए एक नवाचारी तकनीकी प्लेटफॉर्म विकसित कर रहे हैं।
हाल के वर्षों में बिहार की मिथिला पेंटिंग को विश्व स्तर पर पहचान मिली है। इस साल अपने विदेश दौरे पर प्रधानमंत्री मोदी ने विक्टोरिया के गवर्नर जनरल को उपहार में ‘मधुबनी पेंटिंग’ और ‘मार्बल इनले वर्क बॉक्स’ भेंट किया था। बिहार के मिथिला क्षेत्र की यह ‘मधुबनी पेंटिंग’ भारत की लोक कला का सुंदर उदाहरण है। इस पेंटिंग में हाथ से बनाई गई शैली में हरे-भरे पेड़ों और पत्तों के बीच एक मोर को दिखाया गया। गहरी रेखाओं, बारीक डिजाइन और प्राकृतिक रंगों से बनी यह पेंटिंग इंसान और प्रकृति के बीच संबंध को दर्शाती है।
मोर सुंदरता, खुशहाली और संतुलन का प्रतीक है जबकि पेड़ जीवन, विकास और प्रकृति को बचाने का संदेश देता है। पीढ़ियों से चली आ रही मधुबनी कला भारत की सांस्कृतिक विविधता और प्रकृति के प्रति सम्मान को दिखाती है। साथ ही यह कलाकारों और उनके समुदायों की आजीविका को भी सहारा देती है।
–आईएएनएस
केके/पीएम
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