युद्धग्रस्त ईरान से लौटने पर नाविकों ने कहा; ‘घर लौटने की उम्मीद छोड़ दी थी’

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मुंबई, 1 मई (आईएएनएस)। युद्धग्रस्त ईरान से भारत लौटे नाविकों ने बताया कि उनके आस-पास ही मिसाइलें दागी जा रही थीं और उन्हें अपने जहाज के कप्तान से ‘साइन-ऑफ’ (जहाज छोड़ने की अनुमति) भी नहीं मिल रहा था, जिसके चलते उन्होंने घर लौटने की सारी उम्मीदें खो दी थीं। उत्तर प्रदेश के मनन सिंह चौहान पिछले साल अक्टूबर में तेहरान गए थे और एक जहाज पर ट्रेनी वाइपर के तौर पर काम कर रहे थे। उन्होंने अपनी और अपने साथियों की वापसी का श्रेय फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया (एफएसयूआई) के महासचिव मनोज कुमार यादव को दिया और कहा, “हम…

मुंबई, 1 मई (आईएएनएस)। युद्धग्रस्त ईरान से भारत लौटे नाविकों ने बताया कि उनके आस-पास ही मिसाइलें दागी जा रही थीं और उन्हें अपने जहाज के कप्तान से ‘साइन-ऑफ’ (जहाज छोड़ने की अनुमति) भी नहीं मिल रहा था, जिसके चलते उन्होंने घर लौटने की सारी उम्मीदें खो दी थीं।

उत्तर प्रदेश के मनन सिंह चौहान पिछले साल अक्टूबर में तेहरान गए थे और एक जहाज पर ट्रेनी वाइपर के तौर पर काम कर रहे थे। उन्होंने अपनी और अपने साथियों की वापसी का श्रेय फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया (एफएसयूआई) के महासचिव मनोज कुमार यादव को दिया और कहा, “हम ऐसी स्थिति में फंस गए थे जहाँ हमें कैप्टन से साइन-ऑफ नहीं मिल रहा था।”

आईएएनएस से ​​बात करते हुए उन्होंने कहा, “जब भी मिसाइलें गिरती थीं, तो ऐसा लगता था कि हम बच नहीं पाएंगे, लेकिन शायद हम अपने माता-पिता के आशीर्वाद की वजह से बच पाए। ईद के दिन, लगभग 70-80 मिसाइलें गिरीं। मैं अपने केबिन में जमीन को हिलते हुए महसूस कर सकता था।”

उन्होंने बताया कि सभी ईरानी लोग जहाज छोड़कर चले गए थे और वह और दो अन्य भारतीय अकेले रह गए थे।

उन्होंने कहा, “हमारा जहाज खुर्रमशहर में फंसा हुआ था, जहां कई मिसाइलों को निशाना बनाया जा रहा था। 12 अप्रैल, 2026 को, जहाज वहां से बंदर अब्बास के लिए रवाना हुआ, जहां एक नए कैप्टन ने हमें साइन-ऑफ दिया। वहां से, हम टैक्सी से बुशेहर पहुंचे और फिर जोल्फा गए।”

आगे चौहान ने कहा, “वहां से, हम आर्मेनिया पहुंचे। दिबाकर यादव नाम का एक लड़का युद्ध में फंसा हुआ था। मैंने उससे मनोज सर का नंबर लिया और उनसे संपर्क किया।”

उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें वेतन के तौर पर मिले 600 डॉलर में से 300 डॉलर घर लौटने में ही खर्च हो गए।

उन्होंने कहा, “हमने घर लौटने की उम्मीद लगभग खो दी थी, लेकिन मनोज सर (यादव) का शुक्रिया, हम वापस आ पाए।”

चौहान ने आरोप लगाया कि जो नाविक पश्चिम एशिया के युद्ध में फंसे हुए हैं, उन्हें घर लौटने के लिए सरकार से कोई मदद नहीं मिली है।

उन्होंने कहा, “अभी भी, लगभग 80-90 लोग वहाँ फँसे हुए हैं।”

इसके अलावा, उन्होंने शिकायत की कि कई ऐसे एजेंट हैं जो नाविकों के साथ ‘धोखाधड़ी’ करते हैं।

उन्होंने बताया, “हमें बताया गया था कि हमें दुबई ले जाया जा रहा है, लेकिन इसके बजाय हमें ईरान भेज दिया गया।”

हरियाणा के एक अन्य नाविक, रवि ने कहा, “आर्मेनिया की सीमा पार करने के बाद ही, हमारे मन में भारत पहुंचने की उम्मीद फिर से जगी।”

ईरान में अपनी स्थिति के बारे में उन्होंने कहा, “सोते समय जमीन इतनी जोर से हिलती थी कि ऐसा लगता था जैसे मिसाइलें हमारे पास ही गिर रही हैं। कभी-कभी तो डर के मारे हम सो भी नहीं पाते थे।”

रवि ने आगे कहा, “मैंने अपने परिवार को अपनी स्थिति के बारे में कुछ नहीं बताया, क्योंकि मेरी मां बहुत जल्दी परेशान हो जाती हैं।”

आंध्र प्रदेश के रहने वाले चिरंजीवी ने कहा, “ईरानियों ने हमसे कहा था कि या तो यहां से भाग जाओ, या फिर लाइफजैकेट पहनकर समुद्र में कूद जाओ।”

एफएसयूआई के महासचिव मनोज कुमार यादव ने बताया कि हवाई क्षेत्र बंद होने की वजह से नाविकों को सड़क के रास्ते से लंबा और ज्यादा मुश्किल सफर तय करना पड़ा।

उनकी आर्थिक तंगी का जिक्र करते हुए यादव ने कहा, “उनके पास न तो किराया देने के पैसे थे, और न ही दिन में दो बार खाना खाने के लिए। दूसरों के लिए यह भले ही ‘सीजफायर’ (युद्धविराम) हो, लेकिन नाविकों को इससे अब तक कोई फ़ायदा नहीं हुआ है। उनमें से 20,000 से ज्यादा लोग अभी भी वहीं फंसे हुए हैं।”

–आईएएनएस

एससीएच

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