Delhi News : लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विधायी समितियों के कामकाज में प्रौद्योगिकी के अधिकाधिक इस्तेमाल पर जोर देते हुए राज्य विधानमंडलों के लिए डिजिटल ऑडिट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म विकसित करने का प्रस्ताव रखा है। उन्होंने कहा कि इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से लेखापरीक्षा संबंधी टिप्पणियों की व्यवस्थित निगरानी, उन पर अनुवर्ती कार्रवाई और लेखापरीक्षा रिपोर्टों की समयबद्ध जांच एवं निस्तारण सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
ओम बिरला संसद तथा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के विधानमंडलों की लोक लेखा समितियों के सभापतियों के दो दिवसीय सम्मेलन के समापन अवसर पर संबोधित कर रहे थे। तिरुवनंतपुरम में आयोजित इस सम्मेलन में उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी को संस्थागत बदलाव का प्रभावी माध्यम बनाया जाना चाहिए। डिजिटल नवाचारों को अपनाने से विधायी निगरानी की दक्षता, पारदर्शिता और प्रभावशीलता में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।
तकनीक मानवीय विवेक और निर्णय क्षमता का विकल्प नहीं : बिरला
हालांकि, उन्होंने तकनीक पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता को लेकर आगाह भी किया। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति हमेशा मानवीय मूल्यों, विवेक और संवेदनशीलता पर आधारित होनी चाहिए। प्रौद्योगिकी संस्थागत जवाबदेही मजबूत करने और निर्णय लेने की गुणवत्ता बेहतर बनाने में सहायक हो सकती है, लेकिन यह कभी भी मानवीय विवेक और निर्णय क्षमता का विकल्प नहीं बन सकती। उन्होंने डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए जुटाए जाने वाले आंकड़ों की सटीकता, प्रामाणिकता और निष्पक्षता बनाए रखने को भी जरूरी बताया।
लोक लेखा समितियों के बीच बेहतर समन्वय पर दिया जोर
लोकसभा अध्यक्ष ने सम्मेलन में लोकसभा की लोक लेखा समिति के सभापति के.सी. वेणुगोपाल की ओर से दिए गए सुझावों का उल्लेख करते हुए संसद और राज्य विधानमंडलों की समितियों से मिलकर काम करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों की निरंतर जांच और उनके समयबद्ध निस्तारण से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करने के लिए लेखापरीक्षा एवं मूल्यांकन की एक व्यापक व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। इससे विभिन्न समितियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा, अनुभवों का आदान-प्रदान बढ़ेगा और देशभर की लोक लेखा समितियों की सामूहिक क्षमता मजबूत होगी।
सार्वजनिक धन के इस्तेमाल में जवाबदेही तय करती हैं लोक लेखा समितियां
सार्वजनिक धन के इस्तेमाल में जवाबदेही सुनिश्चित करने में लोक लेखा समितियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए बिरला ने कहा कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) स्वतंत्र और निष्पक्ष लेखापरीक्षा करते हैं, जबकि लोक लेखा समितियों की जिम्मेदारी लेखापरीक्षा निष्कर्षों की जांच, तथ्यों का विस्तृत परीक्षण और अपनी सिफारिशों पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि लेखापरीक्षा संबंधी टिप्पणियां केवल सरकारी रिपोर्टों और अभिलेखों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उनके आधार पर जरूरी सुधारात्मक कदम भी उठाए जाने चाहिए। प्रशासनिक व्यवस्था में इनका असर ठोस रूप से दिखाई देना चाहिए। इसके लिए कार्यपालिका को लोक लेखा समितियों की सिफारिशों को गंभीरता से लेते हुए उनका समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा।


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