Who is Ranjeet Singh Rathore: भारतीयों ने दुनिया के कई देशों में अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पहचान बनाई है। राजनीति के क्षेत्र में भी भारतीय मूल के लोगों ने कई देशों में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किए हैं। ब्रिटेन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां भारतीय समुदाय लगातार अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है। हाल ही में राजस्थान के पाली जिले से जुड़े रणजीत सिंह राठौर ने ब्रिटेन की स्थानीय राजनीति में एक नई उपलब्धि हासिल की है। उनका पार्षद चुना जाना न केवल उनके लिए बल्कि भारतीय समुदाय के लिए भी गर्व की बात है।
ब्रिटेन की राजनीति में भारतीयों की भागीदारी कोई नई बात नहीं है। इसकी शुरुआत 19वीं शताब्दी में हुई थी। वर्ष 1892 में दादाभाई नौरोजी ब्रिटेन की संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स के लिए चुने जाने वाले पहले भारतीय और एशियाई बने थे। उन्होंने लंदन की सेंट्रल (London Council Elections) फिन्सबरी सीट का प्रतिनिधित्व किया और ब्रिटिश संसद में भारत और अन्य उपनिवेशों से जुड़े मुद्दों को मजबूती से उठाया। इसके बाद समय के साथ ब्रिटेन में भारतीय मूल के नेताओं की संख्या बढ़ती गई। वर्ष 2022 में ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने और 10 डाउनिंग स्ट्रीट पहुंचने वाले पहले भारतीय मूल के ब्रिटिश एशियाई नेता बने। यह भारतीय समुदाय के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
Ranjeet singh Rathore Journey: राजस्थान से लंदन तक का सफर

अब इसी कड़ी में राजस्थान के रणजीत सिंह राठौर का नाम भी जुड़ गया है। उन्होंने पश्चिमी लंदन के हिलिंगडन बरो की नॉर्थ हिलिंगडन सीट से चुनाव जीतकर पार्षद का पद हासिल किया है। उनके सामने सामने जोनाथन बियान्को थे, जो 40सालों से इस पद पर थे। रणजीत सिंह ने कंज़र्वेटिव पार्टी के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। नॉर्थ हिलिंगडन एक शांत और विकसित आवासीय क्षेत्र माना जाता है। यहां उनके साथ लंबे समय से राजनीति में सक्रिय जोनाथन बियान्को भी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इस तरह क्षेत्र का नेतृत्व अब एक अनुभवी ब्रिटिश नेता और एक युवा भारतीय मूल के नेता मिलकर कर रहे हैं।
Who is Ranjeet Singh Rathore: पढ़ाई के लिए पहुंचे थे ब्रिटेन

रणजीत राठौर वर्ष 2014 में कानून की पढ़ाई करने के लिए ब्रिटेन आए थे। उन्होंने ब्रुनेल यूनिवर्सिटी लंदन में दाखिला लिया। पढ़ाई के दौरान उन्होंने न केवल शैक्षणिक सफलता हासिल की बल्कि छात्र राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वे लगातार दो वर्षों तक छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। इस दौरान उन्होंने 15 हजार से अधिक छात्रों का प्रतिनिधित्व किया। उनका कहना है कि इस अनुभव ने उन्हें नेतृत्व, जनसेवा और समुदाय के साथ जुड़कर काम करने की प्रेरणा दी। राठौर के अनुसार छात्र संघ में काम करने से उन्हें विभिन्न देशों और संस्कृतियों के लोगों के साथ काम करने का अवसर मिला, जिसने उनके व्यक्तित्व को और मजबूत बनाया।
परिवार में विदेश जाकर पढ़ने वाले पहले सदस्य
रणजीत राठौर अपने परिवार में विदेश जाकर पढ़ाई करने वाले पहले व्यक्ति हैं। उनका कहना है कि कम उम्र में अपने देश से दूर जाकर रहना आसान नहीं था। लेकिन इस अनुभव ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया और नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता दी। उन्होंने बताया कि विदेश में पढ़ाई ने उन्हें जिम्मेदार बनना सिखाया और जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण भी व्यापक हुआ। यही अनुभव आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन में भी काम आया।
राजनीति में कैसे हुई शुरुआत
राठौर की राजनीति में रुचि छात्र जीवन के दौरान ही विकसित हो गई थी। छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में काम करने के दौरान उनका संपर्क कई राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं से हुआ। बाद में कंज़र्वेटिव पार्टी के कुछ सदस्यों ने उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने चुनावी अभियानों में काम करना शुरू किया। वे पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और वर्तमान प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के चुनाव अभियानों से भी जुड़े रहे। धीरे-धीरे उनकी सक्रियता और कार्यशैली को देखते हुए पार्टी ने उन्हें आधिकारिक रूप से अपना उम्मीदवार बनाया। इसके बाद उन्होंने स्थानीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
चुनौतियों का भी करना पड़ा सामना
एक अंतरराष्ट्रीय छात्र के रूप में ब्रिटेन पहुंचने के बाद राजनीति में पहचान बनाना आसान नहीं था। राठौर बताते हैं कि कई बार उन्हें खुद को साबित करने के लिए दूसरों की तुलना में अधिक मेहनत करनी पड़ी। उन्हें लोगों का विश्वास जीतने में समय लगा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनका मानना है कि इन चुनौतियों ने उन्हें और मजबूत बनाया। उन्होंने सीखा कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए धैर्य और निरंतर प्रयास जरूरी हैं। उनका लक्ष्य युवाओं और विभिन्न समुदायों को राजनीति और सामाजिक कार्यों में अधिक भागीदारी के लिए प्रेरित करना है।
आज ब्रिटेन भारतीय छात्रों के लिए सबसे पसंदीदा देशों में से एक बन चुका है। हाल के वर्षों में वहां पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2023-24 में एक लाख से अधिक भारतीय छात्र ब्रिटेन पढ़ाई के लिए पहुंचे। यह संख्या कुछ वर्ष पहले की तुलना में कई गुना अधिक है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय युवा वैश्विक शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय अवसरों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
भारत और ब्रिटेन की राजनीति में अंतर
रणजीत राठौर का मानना है कि भारत और ब्रिटेन दोनों मजबूत लोकतंत्र हैं, लेकिन दोनों देशों की राजनीतिक कार्यप्रणाली में कुछ अंतर हैं। उनके अनुसार ब्रिटेन में स्थानीय शासन को काफी महत्व दिया जाता है। यहां पार्षद और स्थानीय प्रतिनिधि सीधे जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं पर काम करते हैं। लोगों और उनके प्रतिनिधियों के बीच दूरी अपेक्षाकृत कम होती है। राठौर का कहना है कि यही व्यवस्था उन्हें सबसे अधिक आकर्षित करती है क्योंकि इससे जनता की समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।
ब्रिटेन के विकास में भारतीयों का योगदान
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन के पुनर्निर्माण में भारतीय समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 1950 और 1960 के दशक में बड़ी संख्या में भारतीय, विशेष रूप से सिख समुदाय के लोग, रोजगार की तलाश में ब्रिटेन पहुंचे। उन्होंने उद्योग, व्यापार, परिवहन, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज भारतीय मूल के लोग ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा और राजनीति सहित लगभग हर क्षेत्र में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। भारतीय समुदाय को वहां की सबसे सफल और आर्थिक रूप से मजबूत प्रवासी आबादियों में गिना जाता है। यही कारण है कि ब्रिटेन की राजनीति और समाज में उनकी भागीदारी लगातार बढ़ रही है।
रणजीत सिंह राठौर की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो विदेशों में पढ़ाई या करियर बनाने का सपना देखते हैं। राजस्थान के एक साधारण शहर से निकलकर ब्रिटेन की राजनीति में जगह बनाना उनकी मेहनत, लगन और नेतृत्व क्षमता का प्रमाण है। उनकी सफलता यह दिखाती है कि यदि व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे तो वह दुनिया के किसी भी कोने में पहचान बना सकता है। साथ ही यह भी साबित होता है कि भारतीय समुदाय आज वैश्विक स्तर पर केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा रहा है।
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