दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में दाखिले के लिए दो सफल उम्मीदवारों को आपस में अपने चुने हुए पाठ्यक्रम और सीट की अदला-बदली करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, लेकिन अधिकारियों से कहा कि वे उनकी शिकायत पर एक अलग मामले के रूप में गौर करें। न्यायमूर्ति विभु बखरू ने उनके इस दावे को भी खारिज कर दिया कि इस वर्ष की सामान्य सीट आवंटन प्रणाली (सीएसएएस) असंवैधानिक थी और कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा सीट में बदलाव का अनुरोध आवंटन प्रणाली के संदर्भ में स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने एक आदेश में कहा, ‘‘इस अदालत को सीएसएएस के साथ हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिला, और पहले ही कहा जा चुका है कि याचिकाकर्ताओं को राहत के संबंध में अनुरोध करने का कोई अधिकार नहीं है। किसी भी छात्र के साथ कोई पक्षपात नहीं हुआ है। यह अदालत प्रतिवादियों (दिल्ली विश्वविद्यालय और सेंट स्टीफंस कॉलेज) को इसे एक अलग मामले के रूप में मानकर विचार करने का निर्देश देती है।’’ अदालत ने कहा कि सीएसएएस को याचिकाकर्ताओं द्वारा दी गई चुनौती निराधार है और यह मानने का कोई उचित आधार नहीं है कि यह मनमाना, अनुचित और संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) या अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता छात्रों ने साझा विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी) में काफी अच्छा प्रदर्शन किया था। उन्होंने दाखिला स्वीकार करते समय अपनी ‘‘पहली वरीयता’’ को गलत महसूस करने के बाद इसे बदलने की मांग की, लेकिन अधिकारियों ने किसी भी बदलाव की अनुमति देने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने अदालत का रुख किया। डीयू ने कहा कि लागू नीति के अनुसार, किसी उम्मीदवार को अपनी ‘‘पहली वरीयता’’ के पाठ्यक्रम और कॉलेज में प्रवेश प्राप्त करने के बाद सीट बदलने की अनुमति नहीं दी। न्यायमूर्ति ने कहा कि अदालत का यह भी मानना है कि अगर प्रतिवादी (डीयू और सेंट स्टीफेंस कॉलेज) याचिकाकर्ताओं के अनुरोधों पर विचार करते हैं तो इससे अन्य छात्रों के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ताओं के अनुरोधों पर विचार किया जाता है, तो यह एक मिसाल नहीं बनेगा।


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