Delhi News: दिल्ली में सालों से चल रही प्रीपेड टैक्सी योजना से जुड़े 112 कर्मचारियों को हटाए जाने के फैसले ने राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने इस मुद्दे पर केंद्र की भाजपा सरकार और दिल्ली पुलिस की कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि चार दशक तक सेवा देने वाले कर्मचारियों को अचानक नौकरी से निकालना अन्यायपूर्ण और अमानवीय है।
Delhi News: 40 साल पुरानी योजना, हजारों यात्रियों की सुरक्षा

प्रेस वार्ता के दौरान संजय सिंह ने बताया कि प्रीपेड टैक्सी योजना की शुरुआत वर्ष 1986 में दिल्ली पुलिस ने की थी। इसका उद्देश्य यात्रियों को सुरक्षित और भरोसेमंद परिवहन उपलब्ध कराना था। एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन और प्रमुख बस अड्डों पर प्रीपेड टैक्सी बूथ बनाए गए थे, जहां से यात्री निर्धारित किराए पर टैक्सी ले सकते थे।
इस व्यवस्था की खास बात यह थी कि पूरी प्रणाली पुलिस की निगरानी में संचालित होती थी। यात्रियों से एक निर्धारित सर्विस चार्ज लिया जाता था, जिससे कर्मचारियों का वेतन और रखरखाव का खर्च निकल जाता था। यानी यह योजना न केवल सुरक्षा के लिहाज से सफल रही, बल्कि आर्थिक रूप से भी संतुलित थी।
Sanjay Singh News: कर्मचारियों की मेहनत से बना मजबूत ढांचा

संजय सिंह ने कहा कि इस योजना को खड़ा करने और सफल बनाने में करीब 150 कर्मचारियों की अहम भूमिका रही है। ये कर्मचारी दिन-रात काम करके व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाते रहे। उन्हें लगभग 850 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान किया जाता था। उनके अनुसार, कर्मचारियों की मेहनत की बदौलत योजना के पास लगभग 10 करोड़ रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट राशि भी जमा थी। इससे स्पष्ट है कि यह घाटे की योजना नहीं थी, बल्कि लाभकारी और आत्मनिर्भर व्यवस्था थी।
नई ऐप आधारित प्रणाली और छंटनी का आरोप
संजय सिंह ने आरोप लगाया कि अब दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय इस योजना को एक नई ऐप आधारित प्रणाली में बदलना चाहते हैं। हजारों टैक्सियों को डिजिटल माध्यम से संचालित करने की तैयारी की जा रही है। लेकिन इस बदलाव के दौरान उन कर्मचारियों को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, जिन्होंने वर्षों तक इस व्यवस्था को संभाला। उन्होंने बताया कि लगभग 112 कर्मचारियों को टर्मिनेशन लेटर देकर हटा दिया गया है, जबकि करीब 38 कर्मचारी अभी बचे हुए हैं। आशंका जताई जा रही है कि उन्हें भी जल्द बाहर किया जा सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि 50 से 60 वर्ष की आयु में ये कर्मचारी नई नौकरी कहां से पाएंगे?
सरकार से पुनर्विचार की मांग
संजय सिंह ने केंद्रीय गृह मंत्री और दिल्ली पुलिस आयुक्त से अपील की कि इस फैसले पर पुनर्विचार किया जाए। उन्होंने मांग की कि सभी कर्मचारियों को फिर से सेवा में लिया जाए और यदि नई योजना लागू करनी है तो उसमें इन कर्मचारियों को समायोजित किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि 1993 से 1996 के बीच कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने इन कर्मचारियों को नियमित करने का निर्देश दिया था। बावजूद इसके, उन्हें स्थायी दर्जा नहीं दिया गया।
वर्षों की सेवा, पर कोई सुरक्षा नहीं
प्रेस वार्ता में मौजूद कर्मचारियों ने भी अपनी बात रखी। एक कर्मचारी ने बताया कि वे कई वर्षों से अलग-अलग अधिकारियों को पत्र लिखते रहे, लेकिन उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया। उनका कहना है कि एक तरफ पुलिस यह कहती है कि योजना ‘न हानि न लाभ’ के आधार पर चल रही है, वहीं दूसरी ओर सहकारी टैक्सी व्यवस्था का हवाला देकर कर्मचारियों को हटाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि उन्हें पिछले कई सालों से 25,000 से 26,000 रुपये मासिक वेतन मिलता रहा है। उनका कहना है कि अचानक नौकरी खत्म कर देने से उनके परिवारों की आजीविका संकट में आ गई है।
महिला कर्मचारी का आरोप: वादे टूटे
एक महिला कर्मचारी शहनाज, जो प्रीपेड काउंटर पर क्लर्क के रूप में काम करती थीं, ने कहा कि डिजिटल ट्रेनिंग के दौरान आश्वासन दिया गया था कि किसी को नहीं हटाया जाएगा। उन्हें टैबलेट और वाई-फाई की सुविधा देकर नई प्रणाली में साथ काम करने का भरोसा दिया गया था। लेकिन अचानक बिना पूर्व सूचना के उन्हें सेवा से हटा दिया गया। उन्होंने कहा कि वे दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी हैं, उन्हें पेंशन या अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं मिलते। कोरोना महामारी के दौरान भी वे लगातार काम करती रहीं। उस समय उनके दो सहकर्मियों की संक्रमण से मृत्यु हो गई, लेकिन उनके परिवारों को कोई सहायता या नौकरी नहीं दी गई।
कानूनी लड़ाई और समान वेतन का मुद्दा
एक अन्य कर्मचारी ने बताया कि उनकी लड़ाई 1986 से ही जारी है। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय से भी दो बार निर्देश मिले थे कि कर्मचारियों का वर्गीकरण कर ‘समान काम के लिए समान वेतन’ का सिद्धांत लागू किया जाए। बावजूद इसके, उन्हें नियमित वेतनमान और अन्य सुविधाएं नहीं दी गईं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब पहले बजट की कमी का हवाला दिया जाता था, तब भी उनकी आय से सभी खर्च निकल जाते थे। अब 300 करोड़ रुपये के बजट की बात किस आधार पर की जा रही है?
भविष्य पर मंडराता संकट
कर्मचारियों का कहना है कि चार दशक की सेवा के बाद उन्हें असुरक्षा और अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। वे मांग कर रहे हैं कि सरकार उन्हें नई व्यवस्था में शामिल करे और उनके अनुभव का सम्मान करे। इस पूरे मामले ने दिल्ली की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ सरकार डिजिटल और आधुनिक व्यवस्था की बात कर रही है, तो दूसरी ओर कर्मचारी अपने हक और सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस विवाद का समाधान किस तरह निकालता है और क्या कर्मचारियों को राहत मिल पाती है या नहीं।
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