Made in India Reality: देश में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने के दावों के बीच इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की एक परियोजना पर सवाल खड़े हो गए हैं। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण से जुड़ी विभागीय संसदीय स्थायी समिति ने टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तहत उपयोग में लाई जा रही हैंडहेल्ड एक्स-रे मशीन को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई हैं। समिति ने कहा है कि मेड इन इंडिया के दावे के बावजूद इस डिवाइस के कई अहम पुर्जे विदेशों, खासकर चीन से आयात किए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इस एआई-आधारित पोर्टेबल एक्स-रे मशीन को सरकारी ई-मार्केटप्लेस के जरिए मेक इन इंडिया कैटेगरी में खरीदा गया था। हालांकि, सप्लायर कंपनी लिपोमिक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने खुलासा किया कि मशीन के मुख्य घटक जैसे एक्स-रे ट्यूब और डिटेक्टर विदेश से मंगाए गए हैं। समिति ने स्पष्ट किया कि ये दोनों हिस्से किसी भी एक्स-रे डिवाइस के सबसे महत्वपूर्ण भाग होते हैं, क्योंकि यही रेडिएशन उत्पन्न करने और इमेज कैप्चर करने का काम करते हैं।
डिवाइस के मूल तकनीकी हिस्से आयातित
समिति ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि डिवाइस के मूल तकनीकी हिस्से आयातित हैं, तो उसे पूरी तरह स्वदेशी बताना भ्रामक है। केवल असेंबली, सॉफ्टवेयर इंटरफेस या ब्रांडिंग के आधार पर किसी उत्पाद को मेड इन इंडिया नहीं कहा जा सकता। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस मुद्दे ने हाल ही में सामने आए एक अन्य विवाद की भी याद दिलाई, जिसमें गलगोटियाज यूनिवर्सिटी की एक प्रोफेसर ने एक विदेशी रोबोटिक डॉग को भारतीय आविष्कार बताकर पेश किया था। बाद में यह सामने आया कि वह उत्पाद चीन में बना था, जिसके बाद व्यापक आलोचना हुई थी।
डीप सीएक्सआर’ नामक एआई टूल की सराहना की
हालांकि, समिति ने आईसीएमआर के सभी प्रयासों को खारिज नहीं किया। उसने ‘डीप सीएक्सआर’ नामक एआई टूल की सराहना की, जिसे इंस्टिट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च के सहयोग से विकसित किया गया है। यह सॉफ्टवेयर चेस्ट एक्स-रे की जांच कर उन्हें सामान्य या असामान्य के रूप में वर्गीकृत करता है और टीबी स्क्रीनिंग में उपयोगी साबित हो सकता है। समिति ने सुझाव दिया कि इस तरह की वास्तविक स्वदेशी तकनीक को देशभर में मुफ्त उपलब्ध कराया जाए।
मेडिकल तकनीकों के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत अब भी एमआरआई, सीटी स्कैन, पेट-सीटी और लाइनैक जैसी उन्नत मेडिकल तकनीकों के लिए विदेशी कंपनियों पर काफी निर्भर है। यह स्थिति न केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता में बाधा है, बल्कि “मेड इन इंडिया” जैसे अभियानों की विश्वसनीयता पर भी असर डालती है। समिति ने स्पष्ट रूप से मांग की है कि मेड इन इंडिया की एक ठोस और पारदर्शी परिभाषा तय की जाए। साथ ही, ऐसे प्रोटोकॉल विकसित किए जाएं जिनमें उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले आयातित और स्वदेशी घटकों की पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए। समिति का मानना है कि पारदर्शिता और वास्तविक स्वदेशी विकास ही जनता का भरोसा मजबूत कर सकते हैं।
रिपोर्ट: मनोज कुमार मनु


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