किसी भी देश के विकास में वहां के व्यापारी वर्ग की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है इसका उल्लेख भारत के दार्शनिक व आर्थिक-राजनीतिक विचारक आचार्य चाणक्य ने अपनी कालजयी पुस्तक ‘कौटिल्य का अर्थ शास्त्र’ में विशद रूप में किया है और शासक राजा के उसके प्रति कर्त्तव्यों का भी बखूबी बखान किया है। आचार्य चाणक्य लिखते हैं कि किसी भी राजा को अपने राज्य में व्यापार के फलने-फूलने के लिए एेसी नीतियों का निर्माण करना चाहिए जिससे वाणिज्य करना सुगम हो सके और व्यापारी वर्ग पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ अपने कारोबार को बढ़ाते हुए राज्य की सुख-समृद्धि में योगदान कर सके क्योंकि तभी कोई राज्य धन-सम्पदा से परिपूर्ण हो सकता है जबकि उसके व्यापारी वर्ग को सदाचार के साथ अपने कारोबार को आगे बढ़ाने की छूट मिले। इसके लिए राजा को अपने राजकोष को भरने के लिए अनावश्यक शुल्क प्रणाली से बचना चाहिए और राज-भय का अवांछित प्रयोग नहीं करना चाहिए। राजा को अपनी प्रजा से उसी प्रकार शुल्क वसूलना चाहिए जिस प्रकार ‘मधुमक्खियां’ विभिन्न पुष्पों या फूलों से पराग या रस चूस कर अपना ‘शहद’ का छत्ता बनाती हैं परन्तु राजा को कभी भी स्वयं व्यापारी नहीं बनना चाहिए। यह कार्य उसे व्यापारी वर्ग पर ही छोड़ना चाहिए। इससे स्पष्ट है कि भारतीय संस्कृति में व्यापार को सर्वांगीण विकास हेतु विशिष्ट महत्ता दी गई है और बताया गया है कि प्रजा में सर्वत्र सुख-शान्ति के लिए व्यापारी वर्ग का कितना महत्व होता है परन्तु भारत में अंग्रेजों के शासन के दौरान व्यापारी वर्ग को लांछित करने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया जिसका प्रमुख कारण यह था कि अंग्रेज अपना शासन चलाने के लिए और भारत की पूंजी को अपने कब्जे में रखने के लिए एेसी व्यवस्था विकसित करना चाहते थे जिससे देश के व्यापारी वर्ग को खलनायक के रूप में दिखाया जा सके। इसके पीछे उनका उद्देश्य पूरी तरह आर्थिक था। वह अपने देश में बने तैयार माल से भारत के बाजारों को पाट कर यहां के व्यापारी वर्ग की छवि को अपने एजेंट के रूप में विकसित करना चाहते थे, जिसमें वे एक सीमा तक सफल भी रहे क्योंकि उन्होंने इसी व्यापारी वर्ग को सामन्तवाद व राजशाही के चलते ब्याज पर पूंजी उपलब्ध कराने वाले वर्ग के रूप में विकसित कर दिया।
हालांकि एेसा नहीं है कि उससे पहले जमीदारी प्रथा के चलते भारत में सूद या ब्याज पर धन उपलब्ध कराने का धंधा नहीं होता था परन्तु यह कार्य जमींदार केवल कुछ व्यापारियों के साथ गठजोड़ बनाकर ही करते थे। अतः 21वीं सदी के स्वतन्त्र भारत में यह बहुत आवश्यक हो जाता है कि हम पुरानी रूढि़यों को तोड़ते हुए अपने व्यापारी वर्ग के साथ बदलते जमाने के अनुरूप व्यवहार करें और राजसत्ता तद्नुरूप अपनी नीतियों में परिवर्तन लाये। इसी दृष्टिकोण को सामने रखते हुए मोदी सरकार के युवा वाणिज्य व उद्योग राज्यमन्त्री श्री जितिन प्रसाद बीते कल (शुक्रवार) को लोकसभा में ‘जन विश्वास विधेयक’ की दूसरी खेप लाये जिसमें व्यापार व उद्योग से जुड़े 79 केन्द्रीय कानूनों को परिमार्जित किया गया है। ये 79 केन्द्रीय कानून भारत सरकार के 23 मन्त्रालयों के अधीन आते हैं जिनमें कोयले से लेकर उपभोक्ता मामले, रक्षा, वित्त, स्वास्थ्य, खान, भारी उद्योग व गृह मन्त्रालय तक शामिल हैं। इससे यह आभास लगाया जा सकता है कि भारत के व्यापारियों को कितने मन्त्रालयों की जांच-परख से गुजर कर अपना कारोबार करना होता है। श्री जितिन प्रसाद ने यह संशोधन विधेयक पेश करते हुए बताया कि इन 79 कानूनों के 784 दंड प्रावधानों को इस प्रकार संशोधित किया गया है कि कारोबारियों को छोटी सी गलती के लिए बड़े दंड का भागी न बनना पड़े और अनावश्यक रूप से जेल की हवा न खानी पड़े। इसके साथ ही विधेयक में आम नागरिकों द्वारा सामान्य जीवन शैली के चलते कानून का उल्लंघन करने पर कठोर दंड से बचाने के लिए भी उपाय किये गये हैं और साधारण अपराध के लिए जेल की सजा काटने के बजाय आर्थिक दंड भुगतने के उपाय किये गये हैं।
यह विधेयक सदन की प्रवर समिति के परीक्षण के बाद ही कल पेश किया गया परन्तु कांग्रेस के दो सांसदों ने इस पर आपत्ति करते हुए पुनः प्रवर समिति की समीक्षार्थ भेजने की मांग की जिसे अस्वीकृत कर दिया गया क्योंकि अभी तक एेसी कोई परंपरा नहीं रही है। यह समझने में हमें गलती नहीं करनी चाहिए कि भारत एक गणराज्य है जिसमें प्रत्येक नागरिक पर विश्वास किया जाना भी जरूरी शर्त होती है। इसी क्रम में मोदी सरकार ने नागरिकों के अपने निजी प्रमाणपत्र स्वयं द्वारा ही सत्यापित किये जाने का कानून बनाया था वरना इससे पहले सत्यापन के लिए किसी राजपत्रित अधिकारी के दस्तखत जरूरी होते थे। इसकी मूल वजह यही है कि भारत के प्रजातन्त्र में आम लोग ही अपने एक वोट की ताकत से सरकारों का गठन करते हैं। हमारा लोकतन्त्र सहभागिता का लोकतन्त्र कहलाता है अतः हम अंग्रेजों द्वारा स्थापित उन परंपराओं की लकीर पर नहीं चल सकते जो उन्होंने शासक और शासित वर्ग के बीच की दूरी को लगातार चौड़ा बनाये रखने की गरज से खींची थीं। श्री जितिन प्रसाद के अनुसार संगीन व्यापारिक अपराधों की सजाओं में इन संशोधनों के आने के बाद किसी प्रकार की ढिलाई नहीं होगी बल्कि केवल उन मामलों में ही ढिलाई की गई है जिनका सम्बन्ध व्यावहारिक तौर पर अनदेखी करने से होता है।
जहां तक राष्ट्रीय सुरक्षा, श्रमिक संरक्षण व सेना तथा अन्तर्राष्ट्रीय जिम्मेदारियों का सवाल है, उनमें किसी प्रकार की छूट नहीं दी गई है। इन 23 कानूनों के 784 प्रावधानों में जो संशोधन किये जा रहे हैं उनसे केवल छोटी-मोटी अनदेखी के लिए ही कड़ी सजा से छूट मिलेगी जिससे व्यापारी व नागरिक आर्थिक दंड व कम सजा भुगत कर स्वयं को सुधार सकें। अतः दंड व्यवस्था जुर्म के स्वरूप के अनुसार ही तय की जा रही है। इस संशोधन विधेयक द्वारा नई दिल्ली नगर निगम के 1994 के कानून को भी परिमार्जित किया जा रहा है और 1988 के मोटर वाहन कानूनों में भी कुछ संशोधन किये गये हैं जिससे आम नागरिकों को भी राहत मिल सके और वे कानूनी पचड़ों से बच सके। कुल मिलाकर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि युवा मन्त्री श्री जितिन प्रसाद नये जमाने की रफ्तार को पहचानते हुए जनता की उस नब्ज पर हाथ रख रहे हैं जिसमें उसकी सुगम जीवन जीने की इच्छा बसती है।























