‘मुझको लगे खंजर पर मिले
हैं उन्हीं हाथों के निशां
जिनकी थपकियों में मीठी
नींद सो जाते थे हम
प्यार से इक बार मांग तो लिया होता
यह जान अपनी हथेलियों पर
लिए कहां किधर जाते हम
‘दर्द भी तुम देते हो और दवा भी’ देश की सियासी नब्ज की जिस अनुभवी डॉक्टर को सबसे ज्यादा बूझ है, वह गौतम अदानी के सिवा और कौन दूजा हो सकता है। वे केंद्रनीत भाजपा सरकार का हर बड़े काम बस यूं चुटकियां बजाते ही कर देते हैं। इसी रविवार को बारामती के जिस ‘शरदचंद्र पवार सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन एआई’ के उद्घाटन के मौके पर शरद पवार को उन्होंने भरे मंच और भरे कंठ से अपना ‘मेंटॉर’ घोषित कर दिया, लोग भूले नहीं हैं कि अपने इसी ‘मेंटॉर’ के पांवों के नीचे की जमीन उन्होंने भाजपा के एक इशारे से खींच ली थी, चाचा-भतीजा (अजित) की राहें तब अलग हो गई थीं, समय की घड़ी भी भतीजा तब अपने साथ ले गया था (घड़ी चुनाव चिन्ह) और चाचा बस तुरही (नया चुनाव चिन्ह) बजाते रह गए थे, अब जबकि महाराष्ट्र में 25 शहरी निकायों के चुनाव 15 जनवरी को आहूत हैं तो भाजपा को ऐसा लगा कि भगवा हित में अब चाचा-भतीजा को एक हो जाना चाहिए तो गौतम अदानी ने चंद रोज पहले ही अजित पवार को मिलने का न्यौता भेजा, अजित दादा इस मुलाकात के लिए गौतम भाई के घर पहुंचे, जहां दोनों के दरम्यान लंबी गुफ्तगू चली, अजित को यह भी बताया गया कि दिल्ली आखिर चाहती क्या है? सो, भतीजा पवार अपने चाचा पवार से फिर से हाथ मिलाने को तैयार हो गए। इसके चंद रोज बाद ही गौतम अदानी शरद पवार से मिलने उनके घर जा पहुंचे, जहां उन्होंने अपने कथित मेंटॉर को भविष्य की राजनीति की रूपरेखा समझायी और बड़े पवार को यह समझाने में कामयाब रहे कि उनके न रहने की सूरत में उनकी बेटी सुप्रिया का भविष्य भाजपा के साथ ज्यादा सुरक्षित है। कहते हैं इन्होंने वह संदेशा भी पवार तक पहुंचा दिया कि अगर दोनों पवार एक होकर एनडीए व महायुति का हिस्सा बनते हैं तो सुप्रिया को केंद्र सरकार में राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार से नवाजा जा सकता है, उन्हें मंत्रालय भी मलाईदार मिलेगा और बतौर मंत्री अगर उनका परफॉरमेंस अच्छा रहा तो डेढ़-दो साल बाद उन्हें पदोन्नत कर कैबिनेट मंत्री बना दिया जाएगा। कहते हैं चाचा-भतीजा संग बात कर एक सुलह फार्मूला भी तैयार किया गया है जिसके अंतर्गत अगर दोनों एनसीपी एक हो जाती हैं तो शरद पवार ‘मेंटॉर’ की भूमिका में पार्टी का मार्गदर्शन करेंगे, अजित पवार इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष हो जाएंगे, सुप्रिया सूले पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष होने के साथ-साथ महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभालेंगी। सो, बारामती में गौतम अदानी, उनकी पत्नी प्रीति अदानी के साथ शरद पवार व अजित पवार ने एक मंच शेयर किया, सुप्रिया सूले ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की, पार्टी कैडर को एकजुटता का संदेश देते हुए तभी वहां ऐलान भी किया गया कि पुणे की पिंपरी चिंचवाड़ नगर निगम का चुनाव दोनों पार्टियां मिल कर लड़ेंगी, पर सुप्रिया को बस पूरे सुलह फार्मूले में एक ही आपत्ति है कि उनके पिता के जीवित रहते कोई और कैसे एनसीपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष हो सकता है? बस पेंच यहीं फंसा है।
शरद पवार में भाजपा की इतनी दिलचस्पी क्यों?
वैसे तो हर किसी को इस बात का इल्म होगा कि शरद पवार के अंदर ही अंदर भाजपा से निजी िरश्ते बेहद प्रगाढ़ हैं। पिछले कुछ समय में शरद राहुल गांधी के सबसे बड़े सलाहकार के तौर पर भी अवतरित हुए हैं, वे गाहे-बगाहे राहुल को राजनीतिक टिप्स देते रहते हैं, यह बात भाजपा को नागवार गुजर रही है। मिसाल के तौर पर जब राहुल व ममता बनर्जी के रिश्तों में खटास यानी तल्खी आ गई तो पवार ने राहुल को समझाया, फिर स्वयं ममता से बात कर उनकी बात राहुल संग करवाई ताकि रिश्तों के दरम्यान की बर्फ पिघले। इस तरह शरद पवार इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं के साथ एक संवाद सेतु का काम करते आए हैं, वे समय-समय पर राहुल की ‘पॉलिटिकल मेनटॉरिंग’ भी करते रहे हैं। भाजपा को अब भी राहुल की राजनीतिक परिपक्वता पर संदेह है, वह जानता है कि पवार के हटने से कांग्रेस भी मुख्यधारा की राजनीति में किंचित अलग-थलग पड़ सकती है। सूत्रों की मानें तो बड़े पवार को यह भी यकीन दिलाया गया है कि अगर एक बार वे भाजपा के संग कदमताल करने लगें तो उनके परिवार को तमाम तरह के मुकदमों से निज़ात मिल सकती है, जांच एजेंसियां उनकी तरफ पलट कर देखेंगी भी नहीं, वहीं शरद की पार्टी के पास 8 लोकसभा सांसद हैं, काम चलाऊ बहुमत से काम चला रही मोदी सरकार के लिए यह संख्या बल एक बड़ी संजीवनी की तरह काम करेगा। शरद पवार की राज्यसभा की सदस्यता की मियाद आने वाले अप्रैल माह में ही समाप्त हो रही है, पवार की अपनी पार्टी के मात्र 10 विधायक ही जीत कर महाराष्ट्र विधानसभा में पहुंचे हैं, वहीं उद्धव के पास 20 और कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं। राज्यसभा में जीत पक्की करने के लिए कम से कम 35 विधायकों का समर्थन चाहिए होगा, फिलहाल उद्धव यह सीट अपनी पार्टी के लिए चाहते हैं। अजित पवार की एनसीपी के पास 41 विधायक हैं, सो वे आसानी से बड़े पवार को ऊपरी सदन में भेज सकते हैं। फिलहाल चाचा पवार को भी अपने भतीजे का साथ देना ही ज्यादा मुनासिब लग रहा है।
अखिलेश की साइकिल चलेगी टन-टन-टन : लंदन में परिवार के साथ नए साल की छुट्टियां मना कर सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव स्वदेश लौटकर आ गए हैं। लंदन से दिल्ली में कदम रखते ही इस 2 जनवरी को नई दिल्ली स्थित अपने आवास पर उन्होंने अपने 35-40 लोगों के कोर ग्रुप की एक अहम बैठक बुलाई, बैठक का एजेंडा था 2027 का आने वाला यूपी चुनाव। बैठक में मौजूद अधिकांश सपा नेताओं की राय थी कि भाजपा की तैयारियों के मुकाबले फिलहाल सपा कहीं ठहर नहीं रही है। ‘हम सिर्फ इसी भ्रम में जी रहे हैं कि 24 के लोकसभा चुनाव में हमने यूपी की 37 सीटें जीत लीं, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हरियाणा, दिल्ली व महाराष्ट्र के चुनावों में भी भाजपा ने वहां कोई इतना अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था, पर जब विधानसभा चुनाव की बारी आई तो उसने इन राज्यों में सारा खेल ही पलट दिया।’ अखिलेश चाहते थे कि इस साल के आखिर में यानी सितंबर-अक्तूबर माह से अपनी साइकिल यात्रा फिर से शुरू करें, पर ज्यादातर नेताओं की राय थी कि तब तक बुहत देर हो जाएगी। भाजपा बंगाल चुनाव से निबटने के बाद अपनी पूरी ताकत यूपी में झोंक देगी। सो, ये नेता चाहते थे कि अखिलेश राज्यभर में अपनी साइकिल यात्रा अभी यानी आने वाले कुछ महीनों में ही शुरू कर दें। इन सपा नेताओं की असली चिंता इस बात को लेकर थी कि सपा के साथ नए वोटर नहीं जुड़ पा रहे, वहीं भाजपा राज्य के पिछड़े व दलित वोटरों को लुभाने की कवायद में अभी से जुट गई है। मौके की नज़ाकत को भांपते हुए अखिलेश ने अपनी ओर से तीन त्वरित सुझाव दिए, पहला, जिलेवार सर्वेक्षण का काम शुरू हो ताकि हर जिले की अलग से रणनीति बनाई जा सके, नंबर दो वे अपनी साइकिल यात्रा का रूट भी जल्द से जल्द फाइनल करेंगे और सबसे आखिर में यह कि आने वाले 17 या 18 जनवरी को लखनऊ में हम एक बार फिर से बैठेंगे ताकि हमारी रणनीतियों को अमलीजामा पहनाने का काम शुरू हो सके।
…और अंत में : उत्तराखंड के कांग्रेसी नेताओं का एक दल पिछले दिनों प्रियंका व सोनिया गांधी से मिलने 10 जनपथ पहुंचा। किसी कारणवश इस शिष्टमंडल से सोनिया नहीं मिल पाईं तो मोर्चा प्रियंका ने संभाला। प्रियंका ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि एक ऐसे वक्त में जब पूरे उत्तराखंड में असंताेष की धारा बह रही है, प्रदेश के युवा व सिविल सोसाइटी सड़कों पर है। अंकिता भंडारी हत्याकांड का मामला इतना तूल पकड़ रहा है, इसकी जद में भाजपा के बड़े नेता आ रहे हैं तो राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस कहां है? क्यों नहीं वह पूरी ताकत से सड़कों पर उतर रही है? किसी के पास कोई जवाब नहीं था। मीटिंग खत्म हुई तो एक नेता ने रुक कर प्रियंका से दो मिनट का वक्त अकेले में मांगा, फिर उन्होंने प्रियंका को बताया-‘ मैडम, मीटिंग में ये तीन-चार बड़े चेहरे जो आपको दिख रहे थे, ये कभी कुछ नहीं बोलते, क्योंकि ये खुद भाजपा के संपर्क में हैं, अगली बार कमल छाप पर चुनाव लड़ेंगे।’
प्रियंका सन्न थीं, मामले को संभालते हुए उन्होंने कहा-‘आप नए लोगों को पार्टी में लेकर आएं, हम उन्हें मौका देंगे।’ ‘पर नए लोगों को भी हमारे साथ जीत की संभावना दिखनी चाहिए न। ऐसा विश्वास दिलाने वाला कोई नेता चाहिए हमें।’ प्रियंका ने फिर मिलने के वादे के साथ उस नेता जी को विदा किया। कुछ तो बात है कि कांग्रेस की किस्मत संवरती नहीं।
पवार परिवार की एकजुटता में अदानी पावर
Summary :
‘मुझको लगे खंजर पर मिले हैं उन्हीं हाथों के निशां जिनकी थपकियों में मीठी नींद सो जाते थे हम प्यार से इक बार मांग तो लिया होता यह जान अपनी हथेलियों पर लिए कहां किधर जाते हम ‘दर्द भी तुम देते हो और दवा भी’ देश की सियासी नब्ज की जिस अनुभवी डॉक्टर को सबसे ज्यादा बूझ है, वह गौतम अदानी के सिवा और कौन दूजा हो सकता है। वे केंद्रनीत भाजपा सरकार का हर बड़े काम बस यूं चुटकियां बजाते ही कर देते हैं। इसी रविवार को बारामती के जिस ‘शरदचंद्र पवार सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन एआई’ के उद्घाटन…


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