पश्चिम एशिया संकट जारी रहने और अनिश्चितता बने रहने से तेल और गैस की कीमतों में लगातार इजाफे से पूरी दुनिया में मुश्किलें खड़ी हो चुकी हैं और भारत भी इससे अछूता नहीं है। काफी इंतजार करने के बाद भारत की तेल कम्पनियों को पैट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ौतरी करनी पड़ी है। कच्चे तेल की कीमतों में जब-जब भी बढ़ौतरी होती है तो सरकार को हमेशा इस दुविधा का सामना करना पड़ता है कि वह बढ़ी हुई कीमत का भारत कब तक झेले और उपभोक्ताओं पर इसका कितना बोझ डाले। कुल मिलाकर स्थिति को सम्भालने के लिए कोई ज्यादा विकल्प न बचने पर सरकार को कीमतें बढ़ाने की अनुमति देनी ही पड़ती है।
आने वाले हफ्तों में कीमतें और भी बढ़ सकती हैं। स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए 5 देशों के दौरे से लौटते ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक्शन में आ गए और उन्होंने मंत्री परिषद की बैठक में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तत्काल खोज का आग्रह किया। उदाहरण के तौर पर खाना पकाने वाली एलपीजी के विकल्प के रूप में बायो गैस को बढ़ावा देने की बात की गई। साथ ही प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार से सुधारों को पूरी शक्ति के साथ लागू करने का आह्वान भी किया। जब भी कोई देश भुगतान संतुलन संकट का सामना करता है और विदेशी मुद्रा की कमी से जूझ रहा होता है तो आयात पर पाबंदियां लगाना आम बात है।
तेल का मामला बिल्कुल अलग है। यह उत्पादन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होने वाला इनपुट है। इसलिए यदि इसकी कमी होती है तो रोजगार में गिरावट आती है। एलपीजी आपूर्ति मामले में भी यह बात लागू होती है। आगे आने वाली कठिनाइयों से इंकार नहीं किया जा सकता। इन कठिनाइयों से बचने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत खोजने का आग्रह समय की जरूरत को देखते हुए उचित है। तेल विपणन कंपनियां प्रतिदिन लगभग 1,000 करोड़ रुपये की अंडररिकवरी का सामना कर रही थीं। पैट्रोल और डीजल की कीमतों में दो बार मामूली बढ़ौतरी किए जाने के बाद यह अंडररिकवरी कुछ कम हुई है लेकिन अभी और कदम उठाने की जरूरत है क्योंकि अंततः तेल कंपनियों का घाटा सरकार की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करेगा।
कमजोर परिवारों को सहारा देने के सुझाव को भारतीय संदर्भ में लागू करना कठिन है क्योंकि लक्षित करने में मुश्किल आएगी। यह आंकना कठिन होगा कि किसी परिवार पर कितना असर पड़ा है और यह आसानी से राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। उदाहरण के लिए सरकार 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त खाद्यान्न देती है जिसे उचित ठहराना मुश्किल है। इसके अलावा सरकार किसानों की रक्षा कर रही है और तर्कसंगत रूप से उपभोक्ताओं की भी क्योंकि उसने उर्वरक कीमतों को समायोजित करने की अनुमति नहीं दी है।
जहां तक ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का सवाल है पैट्रोल में 30 प्रतिशत एथनोल मिलाने की अधिसूचना जारी की जा चुकी है। हमें ईंधन की बचत तो करनी ही होगी, साथ ही तेल और गैस की जगह घरेलू स्तर पर उत्पादित बिजली के उपयोग को बढ़ावा देना होगा। खाना पकाने के लिए बायो गैस का इस्तेमाल एक अच्छा विकल्प हो सकता है। भारतीय आटो मोबाइल इंडस्ट्री ने इलैक्ट्रिक कारों की ओर रुख किया है लेकिन अभी तक इनकी कीमतें काफी महंगी हैं। चीन और अन्य देशों के मुकाबले भारत में अभी बड़े पैमाने पर इनका उत्पादन करने की क्षमता नहीं है। इलैक्ट्रिक वाहनों की चार्जिंग के लिए हमारे पास अभी बुनियादी ढांचा भी नहीं है। खाना पकाने के लिए बिजली का उपयोग करना पूरी तरह से सम्भव तो हो सकता है लेकिन बिजली का उत्पादन राज्य स्तर पर होता है।
वोट बैंक की राजनीति के चलते लोगों को 200 या 300 यूनिट फ्री में देने की रेवड़ियों के चलते राज्य बिजली बोर्डों की आर्थिक हालत काफी खस्ता है। कुछ राज्यों के पास तो बिजली उत्पादन संयंत्रों से बिजली को संग्रहित करने के लिए आवश्यक उपकरणों में निवेश के लिए धन भी नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत को वर्ष 2030 तक 60 गीगावाट से भी ज्यादा ऊर्जा भंडार की जरूरत होगी। जिस तरह से जलवायु परिवर्तन के चलते देश में गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है, उसकी वजह से देश में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। यद्यपि नवीकरण ऊर्जा का इस्तेमाल भी बढ़ा है। बैट्री एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बैस) के इस्तेमाल को भी बढ़ावा देना होगा। ऊर्जा भंडारण को सिर्फ एक तकनीकी सुधार मानना गलत होगा।
यह बेहद जरूरी है कि हमें सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्रोतों की ओर भी बढ़ना होगा। दिल्ली, मुम्बई जैसे घनी आबादी वाले शहरों में भीषण गर्मी के मौसम में बिजली की पीक डिमांड को मैैनेज करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। ऊर्जा सुरक्षा के महत्व को समझते हुए हमें बड़ी धनराशि तो जुटानी ही होगी। साथ ही ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत पैदा करने के लिए लम्बे समय तक संघर्ष भी करना होगा। हमें घरेलू स्तर पर ऐसे उत्पाद बनाने होंगे जिनसे ऊर्जा की बचत हो। यद्यपि केन्द्र सरकार पैट्रोल-डीजल के भंडारों को पर्याप्त बनाए रखने के हर सम्भव प्रयास कर रही है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा के दौरान भारत और यूएई ने पैट्रोलियम भंडार पर एक महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत यूएई की आबूधाबी नैशनल ऑयल कम्पनी भारत के पैट्रोलियम भंडार को बढ़ाएगी। इसके अलावा एलपीजी आपूर्ति पर भी एक समझौता हुआ है। भारत के नीति निर्माताओं को ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के संबंध में स्पष्ट नीतियां अपनानी होंगी। वैकल्पिक स्रोतों के इस्तेमाल के लिए नियामक निकाय भी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। परन्तु इन सब सरकारी गतिविधियों के समानान्तर यह भी कहना उचित होगा कि भारत ने अमेरिका के साथ अपने व्यापार समझौते की शर्तों के दबाव में आकर जिस तरह अपने परखे हुए मित्र देश रूस से कच्चा तेल आयात करने के मोर्चे पर ढिलाई दिखाई उससे भी भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर विपरीत असर पड़ा।
रूस पिछले काफी लम्बे अर्से से भारत को बहुत किफायती दरों पर तेल की सप्लाई कर रहा था। हालांकि सरकार का दावा है कि वह रूस से अब भी तेल का आयात कर रही है मगर इसके लिए उसे अब अमेरिका की सहमति लेनी पड़ती है। इसके साथ ही भारत ने 2019 से ईरान से कच्चा तेल लेना बन्द कर दिया है। ईरान से भारत अपनी मुद्रा रुपये में ही तेल आयात करता था और बदले में ईरान को आवश्यक खाद्य वस्तुओं का निर्यात भी करता था। इससे उसे दोहरा लाभ होता था। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को ढूंढने के साथ- साथ हमे अपनी विदेश व कूटनीति के इस पहलू पर भी विचार करना चाहिए।


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