मोदी-जिनपिंग-पुतिन मुलाकात करा सकती है सुखद अहसास

Summary :

ईरान-अमेरिकी युद्ध और यूक्रेन-रूस वार के जबरदस्त तनाव के बीच पीएम मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन, दोनों के 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में होने वाले BRICS नेताओं के शिखर सम्मेलन में शामिल होने की उम्मीद है। इस साल इस सम्मेलन की अध्यक्षता भारत कर रहा है, इस पर दुनिया की नजर है। यहां बताया गया है कि यह क्यों मायने रखता है:शी की लगभग 7 सालों में भारत की पहली यात्रा। अक्टूबर 2019 (मोदी के साथ मामल्लपुरम में हुई अनौपचारिक शिखर वार्ता) के बाद से शी जिनपिंग की भारत की यह पहली यात्रा होगी। 2020 में गलवान…

ईरान-अमेरिकी युद्ध और यूक्रेन-रूस वार के जबरदस्त तनाव के बीच पीएम मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन, दोनों के 12-13 सितंबर, 2026 को नई दिल्ली में होने वाले BRICS नेताओं के शिखर सम्मेलन में शामिल होने की उम्मीद है। इस साल इस सम्मेलन की अध्यक्षता भारत कर रहा है, इस पर दुनिया की नजर है। यहां बताया गया है कि यह क्यों मायने रखता है:शी की लगभग 7 सालों में भारत की पहली यात्रा। अक्टूबर 2019 (मोदी के साथ मामल्लपुरम में हुई अनौपचारिक शिखर वार्ता) के बाद से शी जिनपिंग की भारत की यह पहली यात्रा होगी।

2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद दोनों देशों के रिश्तों में जो ठहराव आ गया था, उसके बाद दिल्ली में उनकी मौजूदगी इस बात का सबसे स्पष्ट संकेत है कि चीन-भारत संबंधों में जो सुधार पिछले साल कज़ान शिखर सम्मेलन में शुरू हुआ था और 2025 में जिसने गति पकड़ी थी, वह अब सचमुच हो रहा है। सीधी उड़ानें, वीज़ा नियमों में ढील और सीमा पर गश्त से जुड़े समझौते पहले ही फिर से शुरू हो चुके हैं; यह यात्रा इसी सुधार की प्रक्रिया को पूरा करती है। लंबे अंतराल के बाद पुतिन की वापसी। पुतिन आखिरी बार दिसंबर 2021 में भारत आए थे।

मॉस्को के लिए, दिल्ली की यह यात्रा भारत को तेल और हथियारों के खरीदार के तौर पर पक्का करने का एक मौका है, खासकर ऐसे समय में जब पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और यूक्रेन युद्ध के कारण रूस के विकल्प सीमित हो गए हैं। रक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में नई घोषणाओं की उम्मीद है; साथ ही एस-400 मिसाइलों की आपूर्ति, परमाणु सहयोग और रुपया-रूबल में व्यापार के निपटारे पर भी प्रगति हो सकती है। ट्रंप के टैरिफ (आयात शुल्क) बड़ा मुद्दा हो सकता है। गिरता रुपया और डॉलर का वर्चस्व भी अहम मुद्दा होगा। यह सबसे बड़ा कारण है कि इस शिखर सम्मेलन का इतना अधिक महत्व है। ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में लागू की गई टैरिफ व्यवस्था ने भारत, चीन और ब्रिक्स के अधिकांश सदस्य देशों को बुरी तरह प्रभावित किया है।

दिल्ली में मोदी, शी और पुतिन का एक साथ खड़े होना — और “समावेशी विकास,” बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार, तथा डॉलर-रहित व्यापार निपटारे की वकालत करना — अपने आप में एक संदेश है: यह तीन सबसे बड़ी गैर-पश्चिमी शक्तियों का संकेत है कि यदि वाशिंगटन उन पर दबाव बनाना जारी रखता है, तो उनके पास एक वैकल्पिक गठबंधन मौजूद है। मोदी-​जिनपिंग व पुतिन वार्ता ब्रिक्स के भी महत्व को और बड़ी भूमिका दे सकती है। यह विस्तारित ब्रिक्स समूह (जिसमें अब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और इंडोनेशिया भी शामिल हैं) का दिल्ली में होने वाला पहला शिखर सम्मेलन है।

सर्वविदित है कि यह समूह वैश्विक जीडीपी का लगभग 40 प्रतिशत और दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। भारत को एक ओर ईरान और यूएई के बीच के तनाव को संभालना होगा, तो दूसरी ओर रूस और चीन के वर्चस्व को भी संतुलित करना होगा। इन सबके बीच अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को भी अक्षुण्ण बनाए रखना होगा। मोदी के लिए व्यक्तिगत तौर पर, शी और पुतिन दोनों की मेज़बानी करना और साथ ही वॉशिंगटन के साथ भी बातचीत के रास्ते खुले रखना, भारत के “मल्टी-अलाइनमेंट” सिद्धांत का सबसे बड़ा उदाहरण सिद्ध होगा। यह इस बात का सबूत है कि दिल्ली किसी भी गुट को चुने बिना हर मंच पर अपनी जगह बना सकता है। सितंबर में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में मोदी और पुतिन अपनी पुरानी दोस्ती को फिर से ताज़ा करेंगे ।

इसके साथ रूस की भारत के साथ दोस्ती ऐसी है जिसे हम परखा हुआ कह सकते हैं, लेकिन चीन के केस में सावधानी बहुत जरूरी है। यह सच है कि अब दुनिया बदल रही है फिर भी ड्रैगन क्या चाल चल ले भारत को सतर्क रहना होगा क्योंकि यह भी सच है कि ब्रिक्स के नए सदस्य देशों के जुड़ने से भारत के सामने अवसर और चुनौतियां दोनों बढ़ी हैं। पहले ब्रिक्स में केवल ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका थे, लेकिन अब इसमें मिस्र, ईरान, यूएई, इथियोपिया और अन्य देशों की भागीदारी से इसका वैश्विक प्रभाव बढ़ा है। इससे भारत को ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, डिजिटल भुगतान को मजबूत करने का अवसर मिलेगा।

खासकर खाड़ी देशों के जुड़ने से भारत के लिए तेल, निवेश और लॉजिस्टिक सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं लेकिन दूसरी ओर, चीन का प्रभाव भी ब्रिक्स में लगातार बढ़ रहा है चिंतनीय बात यह है कि हाल के समय में चीनी मीडिया और अधिकारियों ने यह स्वीकार किया कि चीन ने “ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान पाकिस्तान को तकनीकी सहायता दी थी। इससे भारत की सुरक्षा चिंताएं और बढ़ी हैं क्योंकि चीन-पाकिस्तान रणनीतिक साझेदारी पहले से ही मजबूत मानी जाती है।

यहां भारत को चीन को शीशे में उतारना होगा। मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि BRICS के नए सदस्य भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक अवसर लेकर आए हैं, लेकिन चीन-पाकिस्तान समीकरण भारत के लिए चुनौती भी बना रहेगा। ऐसे समय में भारत को संतुलित, व्यावहारिक और आत्मनिर्भर विदेश नीति अपनानी होगी, ताकि वह एशिया और विश्व राजनीति में अपनी स्थिति और मजबूत कर सके।

Arjun Chopra