‘काॅकरोच’ जनता पार्टी

Summary :

मेरा यह निश्चित मत है कि भारत हमेशा से गांधी व बुद्ध का देश था, है और रहेगा। जहां तक राजनीतिक उठा-पटक व राष्ट्रीय संवेदनाओं का सम्बन्ध है तो इनका संकट खड़ा होने पर हमें केवल और केवल गांधी की शरण में ही जाना पड़ेगा। इस सन्दर्भ में हाल ही में विदेश में बैठे एक युवक ‘अभिजीत दिपके’ ने डिजिटल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जिस ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ का गठन किया और उसके समर्थन में लाखों युवक इस मंच पर आ गये, उससे यही पता चलता है कि भारत की संवैधानिक राजनीतिक प्रणाली को चुनौती देने का षड्यन्त्र रचा जा…

मेरा यह निश्चित मत है कि भारत हमेशा से गांधी व बुद्ध का देश था, है और रहेगा। जहां तक राजनीतिक उठा-पटक व राष्ट्रीय संवेदनाओं का सम्बन्ध है तो इनका संकट खड़ा होने पर हमें केवल और केवल गांधी की शरण में ही जाना पड़ेगा। इस सन्दर्भ में हाल ही में विदेश में बैठे एक युवक ‘अभिजीत दिपके’ ने डिजिटल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जिस ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ का गठन किया और उसके समर्थन में लाखों युवक इस मंच पर आ गये, उससे यही पता चलता है कि भारत की संवैधानिक राजनीतिक प्रणाली को चुनौती देने का षड्यन्त्र रचा जा रहा है क्योंकि भारतीय युवा वर्ग कभी भी अराजकता का समर्थक नहीं रहा है।

अतः यह पता लगाया जाना बहुत जरूरी है कि दिपके के समर्थक कौन लोग हैं और इन्हें वित्तीय मदद कहां से मिल रही है। इसके साथ ही मैं देश के मोदी विरोधी वैकल्पिक मीडिया कर्मियों को भी चेतावनी देना चाहता हूं कि वे सरकार विरोध में अन्धे होकर काॅकरोच जनता पार्टी के एजेंडे को बढ़ावा न दें क्योंकि ऐसा करके वे केवल भारत में संविधान द्वारा स्थापित व्यवस्था का विरोध ही करेंगे। हम दिपके जैसे युवकों को भटके हुए युवक भी नहीं कह सकते हैं क्योंकि ये बहुत सोच-समझकर रणनीतिक तरीके से देश की युवा पीढ़ी को तात्कालिक आवेश में लाकर भारत से कानून का राज खत्म करना चाहते हैं।

कानून का राज भारतीय राजनीतिक प्रशासनिक व्यवस्था की ‘आत्मा’ है जिसके समाप्त होने पर अराजकता की शुरूआत होती है। बेशक भारत में फिलहाल बेरोजगार वृद्धि दर औसत से बहुत ज्यादा है और बदलती भू-राजनीति की वजह से विश्व के विकसित देशों में कुशाग्र भारतीय युवकों के रोजगार पाने के साधनों में कमी हो रही है, मगर इसका मतलब यह नहीं है कि विदेशों में बैठे चन्द लोग भारत की पूरी युवा पीढ़ी को सड़कों पर उतर कर पूरे निजाम को ही बदलने की भूमिका बांधने लगें। हमने जिस लोकतन्त्र को अपनाया है और महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतन्त्रता आन्दोलन लड़ने वाली पूरी पीढ़ी जिस व्यवस्था को हमें सौंप कर गई है उसमें कुछ खामियों का उभर आना भारत की बहुदलीय राजनीतिक प्रणाली के तहत आश्चर्य नहीं है परन्तु इसे पूरी तरह उलट देने का सपना पालना केवल राष्ट्रद्रोह ही कहलायेगा।

काॅकरोच जनता पार्टी ने जो अपना पांच सूत्री कार्यक्रम जारी किया है उसके अनुसार यदि किसी मतदाता का वोट काटना गलत पाया जाता है तो मुख्य चुनाव आयुक्त को गैरकानूनी कार्रवाई अधिनियम (यूएपीए) के तहत सजा दी जानी चाहिए और उस पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। आजकल मतदाता सूची पुनरीक्षण का मुद्दा गर्म है और दिपके के साथी लोगों ने आम जनता की इस प्रक्रिया के विरुद्ध उपजी भावनाओं को भुनाने की गरज से ही इसे गंभीर आपराधिक श्रेणी में डाला है, जिससे युवा वर्ग का जोशीला खून खौलने लगे और वह संविधान की प्रक्रिया के विरुद्ध ही सड़कों पर उतर आये।

यह माना जा सकता है कि भारत के विभिन्न प्रान्तों की सरकारों में से कुछ ने न्याय देने के मामले में जनता की तात्कालिक भावनाओं को अपने पक्ष में भुनाने की गलती की हो मगर इसका मतलब यह नहीं निकलता कि हम पूरी संवैधानिक व्यवस्था के ही परखचे उड़ाने की तरकीबें बांधने लगें। राज्य सरकारों की ऐसी कथित लोकप्रिय न्यायिक कार्रवाइयों के खिलाफ न्यायालय में जाने के दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं और कई मामलों में न्यायालयों ने राज्य सरकारों को फैसलों का बदला भी है और कड़ी फटकार भी लगाई है। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में बदले या प्रतिशोध के लिए सरकारों के काम करने पर प्रतिबन्ध इसीलिए है क्योंकि हर मामले को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

इस बारे में हमें गांधी जी का यह कथन हमेशा याद रखना चाहिए कि ‘लोकतन्त्र में न्याय पाने व अधिकार मिलने में देरी तो हो सकती है मगर संघर्ष के बाद जो भी मिलता है वह कानूनी रूप से स्थायी होता है’। देश की नई पीढ़ी को मालूम होना चाहिए कि जिस तमिलनाडु राज्य में हाल ही में फिल्म अभिनेता विजय की चुनावों के बाद सरकार गठित हुई है, उसी में पचास के दशक तक स्व. रामस्वामी नायकर ‘पेरियार’ की ‘द्रविड़ कषगम’ पार्टी बहुत लोकप्रिय थी मगर यह पृथक ‘द्रविड़नाडु’ की मांग करती थी। उस समय मद्रास प्रान्त कहे जाने वाले इस राज्य में पेरियार अपनी राजनीतिक व सामाजिक विचारधारा की वजह से बहुत लोकप्रिय भी थे।

मगर पृथक द्रविड़नाडु की उनकी मांग से अधिसंख्य तमिल जनता असहमत थी। भारतीय संविधान के अनुसार जो पार्टी राष्ट्रीय अखंडता को स्वीकार न करती हो, वह चुनाव नहीं लड़ सकती थी। 1956 में भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू इस सन्दर्भ में एक संविधान संशोधन भी लाये थे। अतः तमिलनाडु के पेरियार के चेले कहे जाने वाले नेता स्व. सी.एन. अन्नादरै ने तब द्रविड़ कषगम से अलग होकर 1956 में अपनी ‘द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम’ पार्टी बनायी थी और 1962 के आम चुनावों में हिस्सा लिया था। अतः बहुत स्पष्ट है कि भारत में कोई भी राजनीतिक दल केवल तभी राजनीतिक प्रक्रिया में दाखिल हो सकता है जब वह संविधान को मानने की शपथ ले।

इसलिए काॅकरोच पार्टी खुलेआम नक्सलियों की तरह संविधान को हाशिये पर डाल कर यदि जनभावनाएं भड़काने का काम करती है तो यह सरासर राष्ट्रद्रोह है जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को भारी खतरा हो सकता है। भारत के संविधान में जब यह निर्दिष्ट है कि किन्ही भी दो समुदायों को आपस में भिड़ाने व लड़ाने की कार्रवाई भी राष्ट्र के खिलाफ ही देखी जायेगी तो पूरी युवा पीढ़ी को निजाम बदलने की ताकीद करने वाली कार्रवाई को भी इसी नजर से देखना होगा। इसी वजह से भारत के गुप्तचर विभाग ने सरकार को आगाह किया है कि काकरोच पार्टी की गतिविधियों से देश की सुरक्षा को खतरा हो सकता है जिसकी वजह से एक्स मंच पर दिपके का खाता भारत में प्रतिबन्धित कर दिया गया।

सरकार ने यह कार्रवाई सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम-2000 की धारा 69(ए) के तहत की। मगर दिपके ने अपना खाता कल ही दूसरे डिजिटल में इंस्टाग्राम पर खोल लिया जिस पर लाखों समर्थक एक ही दिन में आ गये जबकि भारत का युवक ऐसी गतिविधियों से अनभिज्ञ ही बना हुआ है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि ऐसे लोगों की जांच हो क्योंकि डिजिटल मंचों पर समर्थक बढ़ाने के लिए वित्तीय फीस भी दी जाती है। इन सब बातों से ऊपर हमें भारत में बहुत सजग रहने की जरूरत है कि कहीं विदेशी षड्यन्त्रकर्ता कोई विनाशकारी ख्वाब तो संजाेये नहीं बैठे हैं।

बेशक कुछ राजनीतिक दलों को प्रधानमन्त्री श्री मोदी की कार्यप्रणाली से शिकायत हो सकती है मगर ये दल केवल संवैधानिक रास्ते से ही तो अपना विरोध प्रकट करते हैं क्योंकि सभी जानते हैं कि भारत न तो श्रीलंका है और न नेपाल या ट्यूनीशिया अथवा बांग्लादेश। हमने हर संकट पर केवल संवैधानिक रास्तों से ही पार पाया है। जहां तक व्यवस्था में विकृतियों का प्रश्न है तो इनका निदान भी हमारा संविधान ही पुख्ता तरीके से करने में सर्वथा सक्षम है।

Aditya Chopra

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