आटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाऊंट रजिस्ट्री यानि अपार योजना केन्द्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय की एक डिजिटल पहल है। जिसके तहत देश के हर छात्र को एक विशिष्ट 12 अंकों वाली डिजिटल आईडी प्रदान की जाती है। इसे वन नेशन- वन स्टूडैंट आईडी का नाम दिया गया है। इस आईडी में छात्र की हर शैक्षणिक जानकारी होती है, जैसे कि मार्कशीट, डिग्री, सर्टिफिकेट, पुरस्कार, छात्रवृत्ति और अन्य क्रेडिट डिजिटल रूप से सम्माहित रहते हैं। अपार योजना के तहत स्कूलों द्वारा बनाए जा रहे आईडी को लेकर कानूनी विवाद शुरू हो गया था और बहस का विषय था कि शिक्षा के डिजिटलीकरण होने पर छात्रों के निजता अधिकार की रक्षा कैसे की जाए।
बच्चों के माता-पिता ने प्रोग्राम की प्राइवेसी और आधार से इसके लिंकिंग को लेकर चिंता जताई है। उन्हें डर है कि उनका आधार डेटा थर्ड पार्टी के साथ शेयर किया जा सकता है या लीक भी हो सकता है। दिए गए कंसेंट फॉर्म के मुताबिक, कंसेंट वापस लेने के बाद प्रोसेसिंग रोक दी जाएगी। हालांकि, एक बार प्रोसेस हो जाने के बाद, कंसेंट वापस लेने के बाद डेटा पर कोई असर नहीं पड़ेगा। कंसेंट फॉर्म में यह नहीं बताया गया है कि इसे डेटाबेस से मिटाया जाएगा या नहीं। डीपीडीपीए-2023, सेक्शन 12 के तहत, डेटा प्रिंसिपल को उस डेटा की प्रोसेसिंग के लिए पर्सनल डेटा को सही करने और मिटाने का अधिकार देता है जिसके लिए पहले कंसेंट दी गई थी। इस मामले की शुरूआत तब हुई जब कुछ अभिभावकों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दावा किया कि व्यवहार में अपार आईडी को अनिवार्य बनाया जा रहा है, जबकि सरकार इसे स्वैच्छिक योजना बताती है।
जब देेश में साइबर सेंधमारी की घटनाएं बढ़ रही हों और बैंकों आैर महत्वपूर्ण संस्थानों से डेटा चोरी होने की घटनाएं आम हों तो ऐसे में सवाल तो उठने स्वाभाविक हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अब सीबीएसई से कहा है कि वह उड़ीसा हाईकोर्ट के उस निर्देश को पूरे देश में लागू करे जिसमें कहा गया था कि माता-पिता को यह विकल्प दिया जाए कि वे अपार आईडी बनाने के लिए अपने बच्चों की आधार डिटेल शेयर करने की मंजूरी देने से मना कर सकते हैं या स्कीम से बाहर निकल सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह भी निर्देश दिया िक अपार योजना के तहत इकट्ठा की गई कोई भी व्यक्तिगत जानकारी कानून के अलावा किसी भी प्राइवेट संस्था या थर्ड पार्टी के साथ शेयर नहीं की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा बच्चों की निजता की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अपार, आधार से जुड़ा होने के कारण बच्चों की निजता के अधिकार पर असर डाल सकता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि योजना किसी विशेष कानून के बजाय प्रशासनिक निर्देशों के माध्यम से लागू की जा रही है। अदालत में यह मुद्दा भी उठा कि यदि कोई अभिभावक सहमति न दे तो बच्चे की शिक्षा या परीक्षा पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। सुनवाई के दौरान डेटा संरक्षण, व्यक्तिगत जानकारी के संग्रहण और प्रसंस्करण को लेकर भी गंभीर प्रश्न उठाए गए। इस विषय से जुड़े ओडिशा हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि यदि अपार योजना वास्तव में स्वैच्छिक है तो सहमति फॉर्म में अभिभावकों को स्पष्ट रूप से सहमति न देने या ऑप्ट-आउट का विकल्प भी उपलब्ध होना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी छात्र को अपार आईडी न बनवाने के कारण शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।
अपार कार्ड स्टूडेंट के आधार से लिंक की जाती है और इसे डिजीलॉकर और एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स के साथ इंटीग्रेट किया जाता है। इसका मकसद एकेडमिक रिकार्ड की एक परमानेंट डिजिटल डिपाजिटरी बनाना है, जिसे स्कूलों, बोर्ड और हायर एजूकेशन संस्थानों में एक्सैस किया जा सके। अपार कार्ड के जरिए छात्रों का एकेडमिक रिकॉर्ड एक जगह रखा जा सकता है। इस कार्ड के होने से आपको अपने एकेडमिक सर्टिफिकेट कहीं लेकर जाने नहीं पड़ेंगे। बस इस कार्ड के होने से आपका सारा रिकॉर्ड ऑनलाइन निकलकर आ जाएगा। जैसे आधार कार्ड के जरिए हमारी पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकती है वैसे ही अपार कार्ड के जरिए किसी स्टूडेंट की एकेडमिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं िक अपार आईडी की पहल तो अच्छी है लेकिन छात्र और उनके अभिभावकों में डेटा सुरक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों की िचंता भी जायज है। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई को डेटा सुरक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों की भी जांच का निर्देश देने से यह चिंता कम हुई है। अब सीबीएसई को अपने सहमति फार्म और प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी पड़ सकती है और संशोधित व्यवस्था में अभिभावकों को यह िवकल्प मिलेगा कि वह योजना में शामिल होना चाहते हैं या नहीं।
अपार आईडी : बच्चों की निजता
Summary :
आटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाऊंट रजिस्ट्री यानि अपार योजना केन्द्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय की एक डिजिटल पहल है। जिसके तहत देश के हर छात्र को एक विशिष्ट 12 अंकों वाली डिजिटल आईडी प्रदान की जाती है। इसे वन नेशन- वन स्टूडैंट आईडी का नाम दिया गया है। इस आईडी में छात्र की हर शैक्षणिक जानकारी होती है, जैसे कि मार्कशीट, डिग्री, सर्टिफिकेट, पुरस्कार, छात्रवृत्ति और अन्य क्रेडिट डिजिटल रूप से सम्माहित रहते हैं। अपार योजना के तहत स्कूलों द्वारा बनाए जा रहे आईडी को लेकर कानूनी विवाद शुरू हो गया था और बहस का विषय था कि शिक्षा के डिजिटलीकरण…


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