भारत के राष्ट्रीय पटल पर तेजी से बदलते राजनीतिक विमर्श के बीच सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) ने जिस तरह अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की घोषणा की है उससे पता चलता है कि पार्टी बदलते वक्त की चुनौतियों का सामना करने के लिए खुद को तैयार करना चाहती है परन्तु यह तैयारी तब तक अधूरी ही समझी जायेगी जब तक कि विमर्श के मोर्चे पर भी पार्टी वैचारिक रूप से खुद को तैयार न करे, क्योंकि देश के युवा वर्ग ने काॅकरोच जनता पार्टी के छाते तले इकट्ठा होकर जिस तरह राजनीति को जनाभिमूलक मुद्दों की तरफ खींचा है उससे भारत का समूचा राजनीतिक चरित्र बदलता दिखाई दे रहा है। लोकतन्त्र में अन्ततः आम जनता के जीवन से जुड़े मुद्दे ही किसी भी देश के जमीनी विकास की गाथा लिखते हैं। युवा वर्ग जिसे जेन-जी कहा जा रहा है उसने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत के लोकतन्त्र में केवल इसके लोग ही सशक्त होकर मजबूत देश का निर्माण कर सकते हैं।
इस सिलसिले में पूरे देश में जिस प्रकार ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान चलाया जा रहा है उससे देश की शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद में आमूलचूल परिवर्तन की संभावनाएं छिपी हुई हैं क्योंकि शिक्षा व स्वास्थ्य एेसे दो क्षेत्र होते हैं जिनमें किया गया सार्वजनिक निवेश किसी भी देश को भविष्य में शक्तिशाली बनाता है। मगर आर्थिक उदारीकरण के बाद इन दोनों क्षेत्रों को जिस तरह निजी कार्पोरेट क्षेत्र के हवाले किया गया उससे भारत जमीनी स्तर पर ही अमीर-गरीब के दो खांचों में बंट गया जिससे आने वाली सन्ततियों में सीधे तौर पर दो वर्ग तैयार होने लगे मगर इस दौर में हम शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर ही आपस में उलझे रहे। अतः युवा वर्ग की पहल पर यदि यह देश अपनी शिक्षा व्यवस्था के बीमार अंगों का उपचार करता है तो आजादी के 80वें साल में यह स्वतन्त्रता सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
दरअसल भारत के आजाद होते ही समाजवादी चिन्तक व विपक्ष के जन नेता डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने इस तरफ तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू का ध्यान आकृष्ट कराया था और नेहरू जी ने तब देश में यह व्यवस्था बनाने की कोशिश की थी कि भारत के सामान्य स्कूलों में पढे़ आमजन के बच्चे भी बड़े होकर उच्च शिक्षा प्राप्त करके बड़े-बड़े प्रशासकीय पदों पर पहुंच सकें और चपरासी का बेटा भी इंजीनियर व डाॅक्टर बन सके। इसके लिए सरकारी क्षेत्र में इंजीनियरिंग संस्थान से लेकर चिकित्सा संस्थान स्थापित किये गये और साधारण फीस या शिक्षा शुल्क प्रणाली लागू की गई । इसके साथ ही अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग तथा गरीब व पिछड़े वर्ग से आने वाले मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति देने का तन्त्र भी स्थापित किया गया परन्तु डाॅ. लोहिया इससे सन्तुष्ट नहीं थे और उन्होंने तब अमीर बच्चों के लिए सीमित संख्या में ही काॅन्वेंट स्कूलों के प्रचलन पर सवाल उठाते हुए कहा कि
राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी की हो सन्तान
टाटा या बिड़ला का छोना सबकी शिक्षा एक समान
अतः वर्तमान राजनीतिक दौर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि भौतिक अर्थ की विकास की दौड़ में हम अपनी नई पीढि़यों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की दिशा में राजनीति के किस औजार का प्रयोग कर रहे हैं। देश का युवा वर्ग इस देश की राजनीति को जिस दिशा में ठेलना चाहता है उससे उस पारंपरिक राजनीति के आख्यानों के परखच्चे उड़ सकते हैं जिस पर चलने के सभी राजनीतिक दल आदी हो चुके हैं। अतः सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करना तब तक कारगर सिद्ध नहीं होगा जब तक कि नये पदाधिकारी लीक छोड़ कर नये विमर्श के विभिन्न आयामों की तह में जाने की कोशिश न करें। बेशक चेहरे बदलने का भी राजनीति में अपना महत्व होता है जिसे भाजपा अपने अतीत से जान सकती है। वैसे यह पार्टी संगठन के मामले में लकीर की फकीर नहीं रही है।
सात महीने पहले इसने एक अनजान से युवा चेहरे नितिन नवीन को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष बना कर सिद्ध किया कि पार्टी बदलाव के प्रति संजीदा है और वह सार्वजनिक जीवन में एक साधारण कार्यकर्ता को भी उच्च महत्व देती है परन्तु आज सवाल जमीन पर चल रहे उस वैचारिक जन-विमर्श का है जिसने आम लोगों के मन को आन्दोलित कर रखा है अतः बौद्धिक स्तर पर पार्टी को इसमें संलग्न होना पड़ेगा। इस सिलसिले में संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत का वह कथन महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने कहा कि जेन- जी भी सच्चे राष्ट्रभक्त हैं और वे तार्किक क्षमता के धनी हैं। यह इसी बात का संकेत है कि बिना युवा वर्ग की सतत् सक्रिय भागीदारी के भारत में कोई भी राजनीतिक दल सफलता की सीढ़ी नहीं चढ़ सकता है। अतः नितिन नवीन की टीम में शामिल श्रीमती बसुन्धरा राजे सिन्धिया से लेकर स्मृति इरानी को यह सिद्ध करना होगा कि वे इस बदलते भारत की राजनीति में नारी शक्ति के नव स्वरूप को पहचानते हुए उसमें नई ऊर्जा भरने की क्षमता रखती हैं। इसी प्रकार संगठन में तेजस्वी सूर्या के स्थान पर जिस युवा को लाया गया है उसमें इस वर्ग की पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझने का सामर्थ्य है कि नहीं। क्योंकि इस राजनीतिक बदलाव में व्यक्तिगत चरित्र हत्या का दौर समाप्त करने की अपार क्षमता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि राजनीति सिद्धान्तों की तरफ मुड़ने की करवट ले रही है। इसलिए मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को भी सावधान की मुद्रा में जाना चाहिए।
इस सिलसिले में पूरे देश में जिस प्रकार ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान चलाया जा रहा है उससे देश की शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद में आमूलचूल परिवर्तन की संभावनाएं छिपी हुई हैं क्योंकि शिक्षा व स्वास्थ्य एेसे दो क्षेत्र होते हैं जिनमें किया गया सार्वजनिक निवेश किसी भी देश को भविष्य में शक्तिशाली बनाता है। मगर आर्थिक उदारीकरण के बाद इन दोनों क्षेत्रों को जिस तरह निजी कार्पोरेट क्षेत्र के हवाले किया गया उससे भारत जमीनी स्तर पर ही अमीर-गरीब के दो खांचों में बंट गया जिससे आने वाली सन्ततियों में सीधे तौर पर दो वर्ग तैयार होने लगे मगर इस दौर में हम शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर ही आपस में उलझे रहे। अतः युवा वर्ग की पहल पर यदि यह देश अपनी शिक्षा व्यवस्था के बीमार अंगों का उपचार करता है तो आजादी के 80वें साल में यह स्वतन्त्रता सेनानियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
दरअसल भारत के आजाद होते ही समाजवादी चिन्तक व विपक्ष के जन नेता डाॅ. राम मनोहर लोहिया ने इस तरफ तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू का ध्यान आकृष्ट कराया था और नेहरू जी ने तब देश में यह व्यवस्था बनाने की कोशिश की थी कि भारत के सामान्य स्कूलों में पढे़ आमजन के बच्चे भी बड़े होकर उच्च शिक्षा प्राप्त करके बड़े-बड़े प्रशासकीय पदों पर पहुंच सकें और चपरासी का बेटा भी इंजीनियर व डाॅक्टर बन सके। इसके लिए सरकारी क्षेत्र में इंजीनियरिंग संस्थान से लेकर चिकित्सा संस्थान स्थापित किये गये और साधारण फीस या शिक्षा शुल्क प्रणाली लागू की गई । इसके साथ ही अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग तथा गरीब व पिछड़े वर्ग से आने वाले मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति देने का तन्त्र भी स्थापित किया गया परन्तु डाॅ. लोहिया इससे सन्तुष्ट नहीं थे और उन्होंने तब अमीर बच्चों के लिए सीमित संख्या में ही काॅन्वेंट स्कूलों के प्रचलन पर सवाल उठाते हुए कहा कि
राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी की हो सन्तान
टाटा या बिड़ला का छोना सबकी शिक्षा एक समान
अतः वर्तमान राजनीतिक दौर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि भौतिक अर्थ की विकास की दौड़ में हम अपनी नई पीढि़यों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की दिशा में राजनीति के किस औजार का प्रयोग कर रहे हैं। देश का युवा वर्ग इस देश की राजनीति को जिस दिशा में ठेलना चाहता है उससे उस पारंपरिक राजनीति के आख्यानों के परखच्चे उड़ सकते हैं जिस पर चलने के सभी राजनीतिक दल आदी हो चुके हैं। अतः सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का अपने संगठनात्मक ढांचे में बदलाव करना तब तक कारगर सिद्ध नहीं होगा जब तक कि नये पदाधिकारी लीक छोड़ कर नये विमर्श के विभिन्न आयामों की तह में जाने की कोशिश न करें। बेशक चेहरे बदलने का भी राजनीति में अपना महत्व होता है जिसे भाजपा अपने अतीत से जान सकती है। वैसे यह पार्टी संगठन के मामले में लकीर की फकीर नहीं रही है।
सात महीने पहले इसने एक अनजान से युवा चेहरे नितिन नवीन को अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष बना कर सिद्ध किया कि पार्टी बदलाव के प्रति संजीदा है और वह सार्वजनिक जीवन में एक साधारण कार्यकर्ता को भी उच्च महत्व देती है परन्तु आज सवाल जमीन पर चल रहे उस वैचारिक जन-विमर्श का है जिसने आम लोगों के मन को आन्दोलित कर रखा है अतः बौद्धिक स्तर पर पार्टी को इसमें संलग्न होना पड़ेगा। इस सिलसिले में संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत का वह कथन महत्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने कहा कि जेन- जी भी सच्चे राष्ट्रभक्त हैं और वे तार्किक क्षमता के धनी हैं। यह इसी बात का संकेत है कि बिना युवा वर्ग की सतत् सक्रिय भागीदारी के भारत में कोई भी राजनीतिक दल सफलता की सीढ़ी नहीं चढ़ सकता है। अतः नितिन नवीन की टीम में शामिल श्रीमती बसुन्धरा राजे सिन्धिया से लेकर स्मृति इरानी को यह सिद्ध करना होगा कि वे इस बदलते भारत की राजनीति में नारी शक्ति के नव स्वरूप को पहचानते हुए उसमें नई ऊर्जा भरने की क्षमता रखती हैं। इसी प्रकार संगठन में तेजस्वी सूर्या के स्थान पर जिस युवा को लाया गया है उसमें इस वर्ग की पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझने का सामर्थ्य है कि नहीं। क्योंकि इस राजनीतिक बदलाव में व्यक्तिगत चरित्र हत्या का दौर समाप्त करने की अपार क्षमता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि राजनीति सिद्धान्तों की तरफ मुड़ने की करवट ले रही है। इसलिए मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को भी सावधान की मुद्रा में जाना चाहिए।



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