भारत और समान नागरिक संहिता

Summary :

समान नागरिक संहिता को लागू करने को लेकर विचारोत्तेजक बहस आजादी के बाद से ही होती रही है। देश का अधिकांश वर्ग समान नागरिक संहिता को राजनीति नहीं राष्ट्रनीति का विषय मानता है। आम धारणा है कि जब एक घर में दो कानून नहीं हो सकते, एक देश में दो कानून कैसे चल सकते है लेकिन मुस्लिम संगठन और गैर भाजपा दल इसका विरोध करते आए हैं। जनसंघ काल से ही भारतीय जनता पार्टी के तीन मुद्दे रहे। पहला राम मंदिर निर्माण, दूसरा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति और तीसरा समान नागरिक संहिता। अब जबकि अयोध्या में भव्य राम…

समान नागरिक संहिता को लागू करने को लेकर विचारोत्तेजक बहस आजादी के बाद से ही होती रही है। देश का अधिकांश वर्ग समान नागरिक संहिता को राजनीति नहीं राष्ट्रनीति का विषय मानता है। आम धारणा है कि जब एक घर में दो कानून नहीं हो सकते, एक देश में दो कानून कैसे चल सकते है लेकिन मुस्लिम संगठन और गैर भाजपा दल इसका विरोध करते आए हैं। जनसंघ काल से ही भारतीय जनता पार्टी के तीन मुद्दे रहे। पहला राम मंदिर निर्माण, दूसरा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 की समाप्ति और तीसरा समान नागरिक संहिता। अब जबकि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो चुका और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त किया जा चुका है तो भारतीय जनता पार्टी ने वर्ष 2029 से पहले समान नागरिक संहिता का दांव खेल दिया। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने समान नागरिक संहिता को लेकर बड़ा दावा किया है कि भाजपा और एनडीए शासित सभी 21 राज्यों मेें समान नागरिक संहिता लागू कर दी जाएगी। 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए गृहमंत्री ने गोल सैट कर दिया है। भाजपा शासित उत्तराखंड यूसीसी (यूनिवर्सल सिविल कोड) लागू करने वाला देश का पहला राज्य बन चुका है। गुजरात, मध्यप्रदेश राज्यों की विधानसभा में यूसीसी से जुड़े विधेयक पारित किए जा चुके हैं, जबकि अन्य राज्य इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। गोवा भारत का ऐसा राज्य है जहां पुर्तगाली शासन के दौरान लागू किया गया पुर्तगीस सिविल कोड 1867 आज भी संशोधित रूप प्रभावी है। इसी कारण गोवा को भारत में समान नागरकि संहिता के सबसे पुराने उदाहरण के तौर पर देखा जाता है।
समान नागरिक संहिता का अर्थ भारत में सभी धर्मों, जातियों और समुदायों के नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, बच्चा गोद लेने और सम्पत्ति के उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून लागू करना है। इसके लागू होने पर अलग-अलग धर्मों के पर्सनल कानून खत्म हो जाते हैं। अमेरिका, आयरलैंड, पाकिस्तान,” बांग्लादेश, मलेशिया, इंडोनेशिया सूडान, मिस्र और तुर्किय जैसे कई देश हैं जिन्होंने समान नागरिक संहिता को लागू किया लो​िक​न भारत में इसको लेकर जमकर राजनीति हुई और इसे वोट बैंक की राजनीति का साधन बनाया गया है, जिसके चलते एक समान नागरिक संहिता पर चर्चा कानूनी की बजाय राजनीतिक बनती रही और इसे सुधार के एजेंडा की बजाय अक्सर ध्रुवीकरण का साधन बनाया गया। संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है और एक समान नागरिक संहिता को राज्य का हस्तक्षेप और अपनी पसंद के धर्म को मानने की स्वतंत्रता के अतिक्रमण के रूप में देखा गया, जिसके अंतर्गत विभिन्न समुदायों को अपने पर्सनल कानूनों को मानने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही अनुच्छेद 29 में उन्हें अपनी अलग संस्कृति का संरक्षण करने का अधिकार दिया गया है। अनेक अल्पसंख्यक समुदायों का मानना है कि एक समान नागरिक संहिता बहुसंख्यक हिन्दुओं के मानदंडों को परिलक्षित करेगी और यह वास्तविक अर्थों में तटस्थ नहीं होगी जिससे विशेषकर मुसलमानों और ईसाइयों में विश्वास का अभाव पैदा होगा। कुछ इस बात से चिंतित हैं कि एक समान नागरिक संहिता के माध्यम से सभी पर हिन्दू कोड थोपा जाएगा क्योंकि इसमें विवाह, विवाह विच्छेद, संपत्ति अधिकार आदि के बारे में व्यक्तिगत मुद्दों को शामिल किया जाएगा और वे हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुरूप बनाए जाएंगे।
1985 के शाहबानो केस को लेकर जमकर ​सियासत हुई और तुष्टिकरण की नीतियों के चलते सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू ही नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता पर समय-समय पर न सिर्फ टिप्पणियां की हैं, बल्कि सरकार को इस दिशा में बढ़ने के निर्देश भी दिए हैं। फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रकरण की सुनवाई करते हुए कहा था कि यह बहुत ही आवश्यक है कि सिविल कानूनों से धर्म को बाहर किया जाए। 11 मई, 1995 को एक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता को अनिवार्य रूप से लागू किए जाने पर जोर दिया था। कोर्ट का कहना था कि इससे एक ओर जहां पीड़ित महिलाओं की सुरक्षा हो सकेगी वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता बढ़ाने के लिए भी यह आवश्यक है। कोर्ट ने उस वक्त यहां तक कहा, ‘इस तरह के किसी समुदाय के निजी कानून स्वायत्तता नहीं, बल्कि अत्याचार के प्रतीक हैं। भारतीय नेताओं ने द्विराष्ट्र अथवा तीन राष्ट्रों के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया। भारत एक राष्ट्र है और कोई समुदाय मजहब के आधार पर स्वतंत्र अस्तित्व का दावा नहीं कर सकता’। कोर्ट ने इस संबंध में कानून मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह जिम्मेदार अधिकारी द्वारा शपथ पत्र प्रस्तुत करके बताए कि समान नागरिक संहिता के लिए न्यायालय के आदेश के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने क्या प्रयास किए।
महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर समान नागरिक संहिता की देश ​को जरूरत क्यों पड़ी। मुस्लिम माहिलाओं के लिए तीन तलाक प्र​था को मोदी सर​कार पहले ही समाप्त कर चुकी है। अलग-अलग धर्मों के अलग कानून से न्यायपालिका पर बोझ पड़ता है। समान नागरिक संहिता लागू होने से इस परेशानी से निजात मिलेगी और अदालतों में वर्षों से लंबित पड़े मामलों के फैसले जल्द होंगे। शादी, तलाक, गोद लेना और जायदाद के बंटवारे में सबके लिए एक जैसा कानून होगा फिर चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो। वर्तमान में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ यानी निजी कानूनों के तहत करते हैं। समान नागरिक संहिता की अवधारणा है कि इससे सभी के लिए कानून में एक समानता से राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी। देश में हर भारतीय पर एक समान कानून लागू होने से देश की राजनीति में भी सुधार की उम्मीद है। मुझे लगता है अब समय आ गया है कि देशभर में इस कानून को लागू किया जाए इससे महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित संवेदनशील वर्गों को सामाजिक सुरक्षा मिलेगी। जबकि एकरूपता से देश में राष्ट्रवादी भावना को भी बल मिलेगा। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द शामिल है और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य को धार्मिक प्रथाओं के आधार पर विभेदित नियमों की बजाय सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून बनना ही चाहिए।

Aditya Chopra

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