स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 के आंकड़े बताते हैं कि देशभर में प्रदूषण की रोकथाम के लिए किए जा रहे प्रयास अपना असर दिखाने लगे हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के अंतर्गत देश के 130 शहरों में से 108 की वायु गुणवत्ता में सुधार दर्ज होना बताता है कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। राजधानी दिल्ली का 11 पायदान ऊपर आकर 21वें स्थान पर पहुंचना और दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में लखनऊ का शीर्ष पर रहना उल्लेखनीय है। वहीं आठ वर्ष तक शीर्ष पर रहे इंदौर का दूसरे स्थान पर आना बताता है कि स्वच्छ हवा की दौड़ में शहरों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। मगर इन उपलब्धियों के बीच यह सवाल भी उतना ही अहम है कि क्या शहरों की हवा वास्तव में सांस लेने लायक हो गई है?
असल में, स्वच्छ वायु सर्वेक्षण मुख्य रूप से इस बात का मूल्यांकन करता है कि शहरों ने वायु प्रदूषण को कम करने के लिए क्या कदम उठाए हैं जैसे, सड़कों की सफाई के लिए मशीनें खरीदना, पेड़ लगाना, या निर्माण कार्यों पर नियम लगाना। यह सीधे तौर पर हर दिन की हवा की शुद्धता का रियल-टाइम डेटा नहीं होता। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत वर्ष 2026 तक पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 10 को 40 फीसदी तक घटाने का जो लक्ष्य था, उसे देश के 130 शहरों में से केवल 26 शहर (20 फीसदी) ही पूरा कर पाए हैं। आंकड़ों के मुताबिक, 108 शहरों में प्रदूषण के स्तर में कुछ सुधार जरूर देखा गया है लेकिन हकीकत यह है कि भारत के कड़े वार्षिक पीएम 10 मानकों को केवल 14 शहर ही पूरी तरह पूरा कर पाए हैं। बाकी शहर अभी भी प्रदूषित श्रेणी में ही सांस ले रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार, भारत में हर साल वायु प्रदूषण से 16 लाख से ज्यादा मौतें होती हैं।
भारत में पीएम 10 के लिए वार्षिक औसत मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इसलिए किसी शहर में प्रदूषण में 40 प्रतिशत कमी आना तभी पर्याप्त माना जा सकता है, जब वह हवा की गुणवत्ता को सुरक्षित स्तर तक पहुंचाने में भी सफल हो। सबसे बड़ी चुनौती मौसम बदलने के साथ सामने आएगी। सर्दियों में दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के अनेक शहरों में प्रदूषण का स्तर अचानक बढ़ जाता है। तापमान में गिरावट, हवा की धीमी गति, पराली जलाने की घटनाएं और स्थानीय उत्सर्जन मिलकर हवा को जहरीला बना देते हैं। इसलिए अनुकूल मौसम की सफलता को पूरे साल की उपलब्धि मान लेना उचित नहीं होगा। दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई सर्दियों में अक्सर 400 के पार चला जाता है। यह स्तर ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है और कभी-कभी एक्यूआई 450 से भी ऊपर पहुंच जाता है।
निसंदेह, पिछले कुछ दशकों में शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और बढ़ती आबादी जैसे विभिन्न कारणों से भारत में वायु की गुणवत्ता तेज़ी से बिगड़ी है। लगातार बढ़ रहा वायु प्रदूषण कुछ सालों से भारत की गंभीर समस्याओं में से एक बन गया है। जहरीली हवा न सिर्फ़ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और पर्यावरण के लिए चिंता का सबब है बल्कि अर्थव्यवस्था पर भी इसका बड़ा असर पड़ता है इससे विकास में बाधा उत्पन्न होती है और लोक कल्याण भी प्रभावित होता है। इंपीरियल कॉलेज लंदन के रिसर्चरों ने पाया है कि वायु प्रदूषण जीवन के सभी चरणों में लोगों को नुक्सान पहुंचाता है। ग्रेटर लंदन अथॉरिटी की ओर से तैयार की गई रिपोर्ट में पाया गया कि कुछ कणों के संपर्क में आने से गर्भपात हो सकता है, पुरुषों में शुक्राणुओं की संख्या कम हो सकती है तथा बच्चों के फेफड़ों का विकास रुक सकता है। वयस्क होने पर ये क्रॉनिक बीमारियों, कैंसर और स्ट्रोक का कारण भी बन सकता है।
हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट के अनुसार, साल 2015 में, भारत में 10 लाख से ज्यादा असमय मौतों का कारण वायु प्रदूषण था। 2019 में देश में वायु-प्रदूषण से 18 प्रतिशत मृत्यु हुई। इसी साल अर्थव्यवस्था को जीडीपी का करीब 1.4 प्रतिशत नुक्सान उठाना पड़ा। अध्ययन में यह बात सामने आयी है कि वायु-प्रदूषण का गंभीर नकारात्मक प्रभाव विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ा है जिसमें श्रम उत्पादकता और कृषि उत्पाद भी शामिल है। इसके अलावा, वायु प्रदूषण से संबंधित स्वास्थ्य समस्याएं उत्पादकता को कम करती हैं। शहरों में वायु प्रदूषण श्रमिकों को प्रभावित करता है जिससे उनकी उत्पादकता कम हो जाती है। इससे नियोक्ताओं और परिवारों दोनों के लिए स्वास्थ्य लागत बढ़ जाती है। यह निवेश को भी प्रभावित करता है क्योंकि निवेशक प्रदूषित शहर में उद्योग स्थापित करने की अतिरिक्त आर्थिक लागत वहन करने में हिचकिचा सकते हैं।
पीएम 2.5 जीवाश्म ईंधन, बायोमास और फसल अवशेषों को जलाने के साथ-साथ निर्माण और उद्योग से निकलने वाली धूल से उत्पन्न होता है। भारत में पीएम 2.5 का आधे से अधिक भाग अमोनिया, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी गैसों के वायुमंडल में परस्पर क्रिया करने से बनता है जो सैकड़ों किलोमीटर तक राज्य की सीमाओं को पार कर जाती हैं। इससे वायु प्रदूषण स्वाभाविक रूप से बहुक्षेत्रीय हो जाता है, जिसमें घर, परिवहन, उद्योग, कृषि और बिजली शामिल हैं और शहरों, जिलों, राज्यों और क्षेत्रों में बहुक्षेत्रीय हो जाता है। सरकार ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
सरकार ने वायु प्रदूषण से निपटने के लिए नई नीतियां बनाई हैं और नियामक एजेंसियां और अन्य संस्थानों का गठन किया है लेकिन यह नाकाफी है। वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए देश में वायु गुणवत्ता को सुधारने के लिए बेहतर और ज्यादा प्रभावी तरीके अपनाने होंगे। ख़ासकर घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में। इसके लिए टेक्नोलॉजी की सहायता अनिवार्य रूप से लेनी होगी। वायु प्रदूषण की समस्या को खत्म करने के लिए निजी क्षेत्रों को आपस में और सरकार के साथ साझेदारी करने के लिए प्रेरित करना होगा, साथ ही सबसे कमजोर तबके के लोगों को समुदाय आधारित पहल के माध्यम से इसमें शामिल करना भी उतना ही जरूरी है। हालांकि हरेक प्रयास, वायु प्रदूषण की सटीक और सामयिक जानकारी के साथ शुरू किये जाने चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा की इस संकट की व्यापकता और विभिन्न दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़े।
सड़कों पर बढ़ते वाहन, निर्माण स्थलों से उड़ती धूल, औद्योगिक गतिविधियां और खुले में कचरा जलाने जैसी समस्याएं किसी एक मौसम की देन नहीं हैं। इन पर पूरे वर्ष लगातार काम करना होगा। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, इलेक्ट्रिक और स्वच्छ ईंधन आधारित वाहनों को बढ़ावा देना और कचरा प्रबंधन की व्यवस्था को भी प्रभावी बनाना जरूरी है। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण की बेहतर रैंकिंग निश्चित रूप से स्वागत योग्य है लेकिन इसे मंजिल नहीं, दिशा का संकेत माना जाना चाहिए। इस हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता कि आंकड़ों से वायुमंडल रातों-रात साफ नहीं हो जाता। प्रदूषण से निपटने के लिए अभी भी बहुत लंबी लड़ाई बाकी है।
स्वच्छ वायु से जुड़े अहम सवाल
Summary :
स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 के आंकड़े बताते हैं कि देशभर में प्रदूषण की रोकथाम के लिए किए जा रहे प्रयास अपना असर दिखाने लगे हैं। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के अंतर्गत देश के 130 शहरों में से 108 की वायु गुणवत्ता में सुधार दर्ज होना बताता है कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। राजधानी दिल्ली का 11 पायदान ऊपर आकर 21वें स्थान पर पहुंचना और दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में लखनऊ का शीर्ष पर रहना उल्लेखनीय है। वहीं आठ वर्ष तक शीर्ष पर रहे इंदौर का दूसरे स्थान पर आना बताता है कि स्वच्छ हवा…


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